Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

उचित दाम और गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए

बीज संशोधन बिल 2025

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

कुछ दशकों से सार्वजनिक क्षेत्र, विश्वविद्यालय और बीज विकास संस्थानों को हाशिये पर रखकर नियमों को उदार करके निजी क्षेत्र के प्रवेश को सुगम बना दिया गया।

कृषि मंत्रालय ने बीज संशोधन बिल 2025 का मसौदा जारी किया है, जिस पर 11 दिसंबर तक सार्वजनिक सुझाव मांगे गए थे। हमारे आसपास आज जो बीज हैं, उनकी विशेषताएं लाखों सालों के विकास से समुदायों ने अर्जित की हैं। बीज विज्ञान के प्रारंभ से पहले भी किसान अपनी निगाह से उन्नत किस्म के बीज तैयार करते थे, जिससे पैदावार अधिक होती थी। हालांकि, कृषि विज्ञान के विकास के बाद आधुनिक शोध ने बीज और उत्पादकता में महत्वपूर्ण प्रगति की है, फिर भी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं।

नि:संदेह, बीज के भीतर भी एक बीज होता है उसमें ‘जीन कोड’ होते हैं जो पौधे के गुणों और उसकी विशेषताओं को अगली पीढ़ी की फसल में ट्रांसफर करने का काम करते हैं। विभिन्न किस्मों के पौधों के मिश्रण से नई शंकर-हाइब्रिड किस्म निकाली जाती है। यह काम वैज्ञानिक लोग आधुनिक यंत्रों और तकनीक से करने लगे हैं जिसे ‘जेनेटिक इंजीनियरिंग’ कहते हैं। इससे पौधों की ऊंचाई, दाने या फल का आकार व रंग और भीतर के प्रोटीन आदि तत्व भी डाले जा सकते हैं। इस तकनीक से अगर खिलवाड़ की जाए तो उसके बहुत ही ख़तरनाक परिणाम भी निकल सकते हैं।

Advertisement

वर्ष 1960-65 की ‘हरित क्रांति’ उत्पादन के मामले में भारत ने जो आत्मनिर्भरता हासिल की, उसमें अधिक उपज देने वाली गेहूं, चावल की नई किस्में तैयार करने का अहम योगदान था। उस समय बीज, दवाई, उर्वरक आदि पर निजी कंपनियों का विशेष नियंत्रण नहीं था और ये तमाम प्रबंध सरकारी विभागों और कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा ही किये गए थे। कृषि क्षेत्र में निजी पूंजी के प्रवेश के चलते और कृषि उपकरणों समेत बीज, दवाई आदि के मामले में देशी-विदेशी कंपनियों ने पैठ बना ली। सरकार किसानों के नाम पर जो सब्सिडी देती थी, उसका बड़ा हिस्सा इन्हीं कंपनियों के खाते में जाने लगा है।

Advertisement

हरित क्रांति के उपरांत बीज के क्षेत्र में निजी कंपनियों ने अपना वर्चस्व बनाना शुरू किया। अंधाधुंध मुनाफे के लिए ज्यादा उत्पादन के दावे किए गए। लेकिन कीट व बीमारी के प्रकोप बढ़ गए क्योंकि पुराने बीजों में जो कुदरती तौर पर प्रतिरोधी गुण बीजों ने ग्रहण किए थे उनका क्षरण होने लगा। प्राइवेट कंपनियों ने कीटनाशक दवाइयां बेचने के लिए इसे भी एक अवसर की तरह देखा। यहां बीटी कॉटन का उदाहरण सामने है। गुलाबी सुंडी की प्रतिरोधक क्षमता के दावे करके महंगे बीज बेचे गए और गुलाबी सुंडी से कपास उत्पादक किसानों की व्यापक बर्बादी हुई।

नि:संदेह, बहुस्तरीय और कई साल की ट्रायल के बाद ही बीज की नई किस्मों को स्वीकृति मिलती है। उसके बाद ही बीज को बेचे जाने की अनुमति मिल सकती है। बिक्री करने वाली कंपनी को विधिवत रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी है। लेकिन किसान अपने बचे हुए बीज को बेचने, बदलने, विकसित करने और उसे स्टाक करने के अधिकार भी रखता है। बीज नियमों के संचालन और निगरानी को लेकर बीज अधिनियम-1966 बना था, जिसके तहत ये आवश्यक प्रावधान हैं। क्वालिटी के बीज के दावे किए गए मापदंड, कंपनियां यदि पूरे न करें या उगने का प्रतिशत कम हो तो दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

बहरहाल, कुछ दशकों से सार्वजनिक क्षेत्र, विश्वविद्यालय और बीज विकास संस्थानों को हाशिये पर रखकर नियमों को उदार करके निजी क्षेत्र के प्रवेश को सुगम बना दिया गया। अाज 70 प्रतिशत देशी-विदेशी बीज कंपनियां निजी क्षेत्र की बीज मार्केट पर काबिज हो चुकी हैं। 56 प्रतिशत बीज की मार्केट पर मात्र 4 बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नियंत्रण है। किसानों को अब इन्हीं कंपनियों के रहमो-करम पर निर्भर रहना पड़ता है। होना तो यह चाहिए था है कि क्वालिटी बीज का शोध, उत्पादन, वितरण सस्ते दामों पर सुलभता से सार्वजनिक व सहकारिता क्षेत्र के माध्यम से ही किसान को सुनिश्चित किया जाता। लेकिन बीज बिल 2025 लाकर केंद्र सरकार बीज के विषय का अति केंद्रीयकरण करना चाहती है। इस मसौदे में एक राष्ट्रीय कमेटी बनाने का प्रावधान है, जिसमें 5-7 राज्यों के ही प्रतिनिधि होंगे और कोई भी मामला नीतिगत है या नहीं, इस पर केंद्र का निर्णय अंतिम होगा।

बिल के प्रस्तावित मसौदे में यदि कोई विदेशी बीज कंपनी अपने देश में ही बीज परीक्षण के ट्रायल करके यदि गुणवत्ता संबंधी स्वयं सत्यापन कर देगी तो वह भी मान्य होगा। ये बहुत घातक प्रावधान है। बीज संबंधी कानूनों का उद्देश्य गुणवत्ता का बीज सस्ते दामों पर किसान को मुहैया करवाने का होता है। इस आशय का आश्वासन ड्राफ्ट में नहीं है। संसद में बताया गया कि 2022 से 2025 के बीच 43001 बीज के नमूने विफल पाए गए। आज जरूरी है कि केंद्र व राज्यों की बीज कमेटियों में कम से कम तीन किसान प्रतिनिधि भी शामिल किये जाएं। बिल मसौदे के चैप्टर 5 के भाग 27 में विदेश के बीजों की वहीं पर दी गई प्रामाणिकता को मंजूरी प्रदान किए जाने के प्रावधान को हटाया जाए। इसमें मूल्य निर्धारण के किसान हितैषी प्रावधान किए जाएं, और जमाखोरी, ब्लैक मार्केटिंग या इजारेदारी पर कड़ी रोक लगाई जाए। स्थानीय स्तर के स्वयं सहायता समूहों और बीज सहकारी समितियों को प्रोत्साहन दिया जाए।

लेखक किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।

Advertisement
×