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माता-पिता की देखभाल हेतु जवाबदेही सुनिश्चित हो

प्रवासी संतानों की बेरुखी

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विदेशों में बसी संतानों द्वारा भारत में रह रहे मां-बाप की उपेक्षा व अनदेखी का मामला संसद में उठना केवल कानूनी सवाल ही नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक मुद्दा भी है। कानून द्वारा प्रवासी बच्चों के माता-पिता का जीवन सुरक्षित करना वक्त की जरूरत है।

भारतीय समाज में परिवार की संरचना और मूल्यों का आधार माता-पिता की सेवा और सम्मान रहा है, लेकिन आधुनिक समय में बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसरों के कारण लाखों युवा विदेशों में बस रहे हैं। यह प्रवास अक्सर परिवारों के लिए आर्थिक उन्नति लाता तो है, लेकिन कई मामलों में बुजुर्ग माता-पिता भारत में अकेले पड़ जाते हैं। उनकी देखभाल, भावनात्मक समर्थन और नियमित संपर्क की कमी से बुजुर्गों की मानसिक और शारीरिक स्थिति दयनीय हो जाती है।

हाल ही में राज्यसभा में भाजपा सांसद डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने विदेश जाने वाले युवाओं द्वारा माता-पिता की देखभाल सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने सुझाव दिया कि विदेश जाने से पहले बच्चों से एक हलफनामा लिया जाए, जिसमें वे अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा माता-पिता की देखभाल के लिए देने का वादा करें। इसके साथ ही, हर छह महीने में माता-पिता से ‘संतुष्टि प्रमाण पत्र’ प्राप्त करना अनिवार्य हो। ऐसा प्रमाण पत्र न मिलने या शिकायत आने पर बच्चों का पासपोर्ट रद्द किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि कम से कम सप्ताह में एक बार फोन पर माता-पिता का हालचाल पूछना भी बाध्यकारी होना चाहिए। इस संदर्भ में पिछले वर्ष 500 से अधिक ऐसे मामले सामने आए, जहां विदेश में बसे बच्चों की उपेक्षा के कारण माता-पिता की हालत बहुत खराब हो गई या उनकी मृत्यु हो गई। विडंबना है कि बच्चे अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं लौटे।

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यह मुद्दा केवल भावनात्मक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और कानूनी दृष्टि से भी गंभीर है। भारत में पहले से ही ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007’ लागू है, जो बच्चों को माता-पिता की आर्थिक और भावनात्मक देखभाल के लिए जिम्मेदार बनाता है। इस कानून के तहत बुजुर्ग ट्रिब्यूनल में शिकायत कर सकते हैं और बच्चों से मासिक भरण-पोषण प्राप्त कर सकते हैं, जिसमें संपत्ति हस्तांतरण रद्द करने की शक्ति भी शामिल है।

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हालांकि, यह कानून विदेश में बसे बच्चों (एनआरआई) पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाता, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार, प्रवर्तन की कमी और संपर्क की दूरी जैसी समस्याएं आड़े आती हैं। कई एनआरआई बच्चे भारत में संपत्ति या बैंक खाते रखते हैं, लेकिन देखभाल की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं। सांसद का प्रस्ताव इसी कमी को दूर करने का प्रयास है। यदि पासपोर्ट आवेदन या वीजा प्रक्रिया में माता-पिता की सहमति अनिवार्य हो सकती है, तो यह उनके भविष्य को सुरक्षित बनाएगा।

इस तरह के कानून की आवश्यकता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि भारत में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है। प्रवास के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं, जहां स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा और भावनात्मक समर्थन की कमी होती है। कई मामलों में माता-पिता ने बच्चों को विदेश भेजने के लिए अपनी ज़मीन-जायदाद बेच दी, कर्ज लिया या अपनी सारी बचत लगा दी, लेकिन बदले में उन्हें अकेलापन और उपेक्षा मिली।

भारतीय संस्कृति में ‘मातृ-पितृ भक्ति’ को सर्वोच्च माना जाता है, लेकिन आर्थिक महत्वाकांक्षा और पश्चिमी जीवनशैली के प्रभाव से यह मूल्य कमजोर पड़ रहे हैं। यह मुद्दा सांस्कृतिक संकट पर भी ध्यान आकर्षित करता है। नि:संदेह, सफलता के पीछे माता-पिता का बहुत बड़ा त्याग होता है।

हालांकि, इस प्रस्ताव पर बहस भी छिड़ी हुई है। कुछ लोग इसे सकारात्मक मानते हैं, क्योंकि यह बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा करेगा और बच्चों में जिम्मेदारी की भावना जाग्रत करेगा। दूसरी ओर, आलोचक इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अतिक्रमण बताते हैं। वे कहते हैं कि पासपोर्ट रद्द करना या प्रमाण पत्र की बाध्यता जैसे कदम बहुत कठोर हैं, जो प्रवास की स्वतंत्रता को प्रभावित करेंगे। अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में पासपोर्ट रद्द करने के लिए केवल गंभीर अपराध या राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार होते हैं, न कि पारिवारिक मामले। एनआरआई समुदाय का एक हिस्सा इसे भेदभावपूर्ण मानता है, क्योंकि भारत में रहने वाले बच्चे जो माता-पिता की उपेक्षा करते हैं, उनके खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई नहीं होती। क्या केवल विदेश जाने वालों पर ही यह नियम लागू होगा?

इसके बावजूद, प्रस्ताव की व्यावहारिकता पर विचार करना जरूरी है। यदि सरकार इसे लागू करना चाहती है, तो विदेश मंत्रालय को एनआरआई से जुड़े डेटाबेस को मजबूत करना होगा, भारतीय दूतावासों के माध्यम से प्रमाण पत्र सत्यापन की व्यवस्था करनी होगी और शिकायतों के लिए एक तंत्र बनाना होगा। यह प्रक्रिया जटिल हो सकती है, लेकिन डिजिटल इंडिया और आधार जैसी सुविधाओं से इसे संभव बनाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, माता-पिता एक ऑनलाइन पोर्टल पर प्रमाण पत्र अपलोड कर सकते हैं या दूतावास में जमा कर सकते हैं। यदि प्रमाण पत्र नहीं मिलता, तो पासपोर्ट नवीनीकरण रुक सकता है या यात्रा प्रतिबंध लग सकता है। यह कदम बच्चों को नियमित संपर्क बनाए रखने के लिए बाध्य करेगा।

संसद में उठाया गया यह सवाल केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक है। यदि ऐसा कानून बनता है, तो यह सुनिश्चित करेगा कि विदेश में सफलता पाने वाले बच्चे अपने माता-पिता को कभी न भूलें। बुजुर्गों का सम्मान और सुरक्षा राष्ट्र की प्रगति का आधार है, और उनकी उपेक्षा समाज के लिए घातक साबित हो सकती है। इसलिए, इस प्रस्ताव को गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि माता-पिता का भविष्य सुरक्षित हो और परिवार की एकता बनी रहे।

लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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