शहरों में कचरा ढुलाई में लगे डीजल-पेट्रोल व सीएनजी वाहनों की जगह विभिन्न चरणों में ई-वाहनों को लाना चाहिये। एक शोध के मुताबिक, इससे कचरा संग्रहण की घटती है। वहीं स्वच्छ भारत मिशन के प्रभाव और व्यापक हो सकते हैं। पीएम ई-ड्राइव जैसी योजनाएं इसमें मददगार होंगी।
बीते कुछ वर्षों में स्वच्छ भारत मिशन से शहरी स्वच्छता में क्रांतिकारी बदलाव आया है। देश के लगभग सभी शहरों में घरों के दरवाजे से कचरे का संग्रहण (डोर-टू-डोर वेस्ट कलेक्शन) अब एक सामान्य और नियमित व्यवस्था बन चुकी है। दूसरी तरफ, ‘फेम’ और हालिया घोषित ‘पीएम ई-ड्राइव’ जैसी योजनाएं भारत के ‘क्लीन मोबिलिटी’ के लक्ष्य को आगे बढ़ा रही हैं। कचरा संग्रहण वाहनों के इलेक्ट्रिफिकेशन (पेट्रोल/ डीजल/ सीएनजी वाहनों की जगह इ-वाहनों का उपयोग) से, ये दोनों प्रमुख राष्ट्रीय प्राथमिकताएं परस्पर जुड़ सकती हैं। इससे कचरा संग्रहण वाहनों की परिचालन लागत घट सकती है व इन प्रदूषण-मुक्त वाहनों से स्वच्छ भारत मिशन के प्रभाव और व्यापक बनाये जा सकते हैं।
भारतीय शहरों में सालाना करीब 1.4 से 1.6 लाख टन शहरी कचरा निकलता है। साल 2016 से 2024 के बीच, शहरी निकायों में कचरा संग्रहण में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। राष्ट्रीय स्तर पर इसका दायरा 44 प्रतिशत वार्डों से बढ़कर अब 97 प्रतिशत वार्डों तक पहुंच गया है, जो लगभग पूर्ण-विस्तार के नजदीक है। इसी वजह से शहरी निकायों के वाहनों का बेड़ा देश में सबसे बड़े संगठित वाहन बेड़े में से एक बन गया है। हालांकि, देश में 70 प्रतिशत से अधिक कचरा ‘जनगणना श्रेणी-1’ के शहरों (1 लाख से अधिक आबादी) से निकलता है, जो सालाना 3-4 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के हालिया शोध के अनुसार, बढ़ती जनसंख्या और कचरे की मात्रा में वृद्धि को देखते हुए इन शहरों को 2030 तक डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण के लिए 80,000 नए वाहन चाहिये।
शहरी कचरा प्रबंधन के लिए आवंटित कुल बजट का करीब आधा हिस्सा कचरा संग्रहण व ढुलाई पर खर्च होता है। इतने अधिक वित्तीय बोझ के अलावा डीजल या सीएनजी वाहनों से कचरा संग्रहण और ढुलाई का पर्यावरण पर असर पड़ता है। अमृतसर के उदाहरण के साथ सीईईडब्ल्यू का अध्ययन बताता है कि कचरा संग्रहण वाहनों का इलेक्ट्रिफिकेशन कितना लाभ दे सकता है।
अभी अमृतसर में कचरा संग्रहण व ढुलाई में 200-220 चौपहिया डीजल वाहन इस्तेमाल होते हैं, जो रोजाना 400 टन से अधिक कचरे का प्रबंधन करते हैं। प्रतिदिन प्रति वाहन औसत उपयोग 15-20 किमी है। इस उपयोग स्तर पर इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहन अपने पूरे जीवनकाल में मौजूदा वाहनों के मुकाबले 25-30 फीसदी किफायती साबित होंगे, जिससे नगर निगम का सालाना ईंधन खर्च 60-80 फीसदी कम होगा।
भारतीय शहरों में आमतौर पर कचरा संग्रहण वाहन प्रतिदिन 15-55 किमी दूरी तय करते हैं, जिनमें तीन व चार पहिया वाहन शामिल हैं। प्रतिदिन प्रति वाहन 50-60 किमी अधिकतम उपयोग स्तर पर इ-तिपहिया वाहन सबसे किफायती विकल्प हैं, जबकि इलेक्ट्रिक चाैपहिया वाहन डीजल व सीएनजी वाहनों के मुकाबले सस्ते पड़ते हैं। प्रत्येक इ-वाहन सालाना लगभग 83 किलोग्राम सूक्ष्म कणों (पीएम 2.5) और आधा टन नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन घटा सकता है।
कचरा संग्रहण वाहनों के इलेक्ट्रिफिकेशन का आधार काफी मजबूत है। चूंकि ये वाहन तय मार्गों पर चलते हैं और लौटकर डिपो में खड़े होते हैं, इसलिए इन्हें रात में चार्ज करना संभव है। इससे वाहनों की दूरी तय करने की चिंता खत्म होती है। लखनऊ, चेन्नई और इंदौर जैसे शहर कचरा संग्रहण के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल शुरू कर चुके हैं। इन सफलताओं को देश के सभी शहरों में लागू करने को एक सुनियोजित रोडमैप की जरूरत है।
सबसे पहले, शहरी स्थानीय निकायों को पायलट प्रोजेक्ट्स के जरिए इ-वाहनों के प्रति भरोसे में लेना चाहिए। कचरा प्रबंधन में विशेष काम शामिल होते हैं, खास तौर पर गीले कचरे के प्रबंधन में। इसलिए, पायलट प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देना चाहिए, दूसरे शहरों के अनुभवों से सीखने के साथ-साथ शहरस्तरीय कार्यशालाएं आयोजित हों। इससे अधिकारियों और वाहन संचालकों को जमीनी स्थितियों में इ-वाहनों की क्षमता, चार्जिंग जरूरतों और रखरखाव को समझने में मदद मिल सकती है।
दूसरा, शहरों को कचरा संग्रहण वाहनों की जगह इलेक्ट्रिक वाहन लाने की चरणबद्ध योजनाएं बनानी चाहिए। शहरी निकाय अपने मौजूदा वाहनों की आयु, ईंधन के प्रकार और दैनिक उपयोग के आधार पर विवरण तैयार करें और पुराने वाहनों को हटाने के क्रम में इ-वाहन लाने का लक्ष्य तय करें। चरणबद्ध योजनाएं वाहन खरीद को राष्ट्रीय - राज्यों के इलेक्ट्रिक-मोबिलिटी लक्ष्यों के साथ तालमेल लाने में मदद करेंगी।
तीसरा, नीतिगत प्रोत्साहनों का लक्ष्य बहुत सटीक होना चाहिए। राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय ईवी नीतियां कचरा-संग्रहण वाहनों को विशेष सब्सिडी देकर शुरुआती लागत घटा सकती हैं। थोक खरीद के लिए संयुक्त निविदाओं के जरिए विभिन्न शहरों की मांगों को आपस में जोड़कर इनकी कीमत को और कम किया जा सकता है। कचरा संग्रहण वाहनों के इलेक्ट्रिफिकेशन के लिए राज्यों के स्तर पर विशेष आवंटन किया जा सकता है। केंद्रीय बजट 2026-27 ने 16वें वित्त आयोग के ‘बिना शर्त अनुदान’ के जरिए शहरों को वित्तीय स्वायत्तता दी है। यह अनुदान कचरा संग्रहण वाहन इलेक्ट्रिफिकेशन के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। ‘स्वच्छ सर्वेक्षण’ में ऐसे रैंकिंग मापदंड जोड़े जा सकते हैं, जो कचरा संग्रहण में इ-वाहनों को प्रोत्साहित करें।
अभी से 50 प्रतिशत ईवी और 2027 से सिर्फ ईवी खरीदने की अनिवार्यता के साथ, भारत इस दशक के अंत तक कचरा संग्रहण के लिए 65 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहन को लाने का लक्ष्य पा सकता है। स्वच्छ भारत मिशन की अगली बड़ी छलांग इन्हीं इलेक्ट्रिक वाहनों से आएगी।
लेखक प्रोग्राम एसो., काउंसिल ऑन एनर्जी, एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर से जुड़े हैं।

