नीतीश कुमार की अग्निपरीक्षा से कम नहीं चुनाव

नीतीश कुमार की अग्निपरीक्षा से कम नहीं चुनाव

राजकुमार सिंह

राजकुमार सिंह

देश के दूसरे बड़े राज्य बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। अभी तक अपराजेय नजर आ रहे क्रूर कोरोना के बीच ही 28 अक्तूबर से 07 नवंबर तक तीन चरणों में मतदान होगा। फिर 10 नवंबर को मतगणना में साफ हो जायेगा कि इस बार दीवाली किसकी धूमधाम से मनेगी यानि सुशासन बाबू नीतीश कुमार ही पुन: बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे या फिर विकल्पहीनता के शून्य को भरने के लिए मतदाता नौसिखिया तेजस्वी यादव को भी विकल्प के रूप में स्वीकार कर लेंगे। हालांकि मार्च से ही गहराने लगे कोरोना संकट के बीच देश-समाज में बहुत कुछ थमा हुआ था लॉकडाउन के दौरान, पर राजनीति तो राजनीति है। सत्ता का खेल कहां कभी थमता है? लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों-छात्रों से ले कर फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत तक हरसंभव मुद्दे पर हुई राजनीति दरअसल बिहार में चुनावी बिसात से भी प्रेरित रही। बेशक इस बीच सत्तापक्ष और विपक्ष ने अपनी-अपनी रणनीति और साझीदारों को भी अंतिम रूप देने का काम किया। हालांकि राजनीति में ही जीने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की बाबत निर्णायक रूप से कुछ कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन ऐसा माना जा सकता है कि सत्ता के दोनों प्रबल दावेदार खेमों की तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है।

भाजपानीत राजग, जिसके राष्ट्रीय स्तर पर नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, बिहार में नीतीश कुमार के नाम और चेहरे पर चुनाव लड़ेगा। यह स्वाभाविक भी है। आखिर कोई भी चुनाव सत्तारूढ़ दल और सरकार की कारगुजारियों को दरकिनार कर कैसे लड़ा जा सकता है? यह भी सच है कि अभी तक तो बिहार में जनता दल यूनाइटेड ही राजग का सबसे बड़ा घटक दल है, जिसके नेता नीतीश हैं, जो मुख्यमंत्री भी हैं। यह दिलचस्प है कि पिछले विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे पर प्रहार-कटाक्ष करते हुए वोट मांगने वाले मोदी और नीतीश इस बार साथ-साथ और एक ही गठबंधन के लिए वोट मांगेंगे। ध्यान रहे कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी की पृष्ठभूमि और छवि का विरोध करते हुए नीतीश ने भाजपा से 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ कर उन्हीं लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला लिया था, जिनका विरोध करते हुए कभी न सिर्फ जनता दल तोड़ा था, बल्कि समता पार्टी के रास्ते भाजपा से दोस्ती कर बिहार में अंतत: वैकल्पिक सरकार भी बनायी। हालांकि लालू शालीनता और सदाशयता के लिए नहीं जाने जाते, पर एक बार लोकसभा चुनाव हार चुके अपने धुर विरोधी रामविलास पासवान को राज्यसभा भेज कर तथा पिछले विधानसभा चुनाव में अपने राजद से कम सीटें जीतने वाले जद यू के नेता नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बना कर उन्होंने संकेत दिया कि प्रतिकूल हालात के थपेड़ों ने उन्हें बदल दिया है। ऐसा लगा था कि क्षत्रपों के अंतर्कलह से उबर कर ज्यादातर जनता दल परिवार कम से कम बिहार में तो एक हो ही जायेगा, लेकिन राजनीति सीधी चाल कहां चलती है? आधा कार्यकाल बीतते-बीतते नीतीश ने राजद को धता बता कर फिर उन्हीं मोदी से मित्रता कर ली, जिन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में उनके डीएनए तक पर सवाल उठाया था और जवाब में उन्होंने उसे चुनावी मुद्दा भी बनाया था।

पर जैसा कि कहा जाता है, राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता। सो, मोदी-नीतीश फिर से एक-दूसरे का गुणगान करते हुए पिछले साल लोकसभा चुनाव साथ लड़े। हालांकि सीटों के बंटवारे पर तकरार में, पिछली बार संकटकाल में साथ आयी उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी नाराज हो कर राजद-कांग्रेस वाले महागठबंधन में चली गयी, पर जद यू के वापस आ जाने के बाद शायद भाजपा को उसकी जरूरत भी नहीं रह गयी थी। अब सत्ताकेंद्रित वर्तमान राजनीति में तो जरूरत या उपयोगिता ही संबंधों की एकमात्र कसौटी रह गयी है। इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि पिछले कार्यकाल में अचानक जागी नैतिकता के चलते इस्तीफा दे कर नीतीश ने जिन जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था, उन्होंने ही बाद में पद छोड़ने से इनकार कर दिया और अंतत: अलग मोर्चा बना कर राजद-कांग्रेस महागठबंधन में भी शामिल हो गये, पर अब चुनाव से पहले वह भी राजग में आ गये हैं। बेशक सीटों के बंटवारे पर रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी कुछ तेवर दिखा रही है, पर वे कितने वास्तविक हैं और कितने प्रेरित—कह पाना मुश्किल है। कभी विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा दलित प्रधानमंत्री का सपना दिखाये जाने से उत्साहित पासवान चुनावी मौसम विज्ञानी की अपनी छवि और उसके अनुरूप जोड़तोड़ में महारत के बावजूद बिहार का मुख्यमंत्री भी नहीं बन पाये। अब उनका एकसूत्रीय एजेंडा बेटे चिराग पासवान को राजनीति में स्थापित करना ही है। संकेत हैं कि इस मामले में पासवान को शायद नीतीश से ज्यादा भाजपा पर भरोसा है, जिसके पास जातीयता में जकड़ी बिहार की राजनीति के लिए प्रभावी चेहरा आज भी नहीं है।

बेशक इस तरह की चर्चा भी असंवेदनशील लग सकती है, पर फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच के नाम पर बिहार-महाराष्ट्र सरकार में तनातनी के बाद अब जिस तरह ड्रग्स पर विभाजित बॉलीवुड की बयानबाजी के जरिये मुद्दा गरमाये रखने की कवायद हो रही है,उसके निहितार्थ न समझना राजनीतिक नादानी होगी। बिहार के बड़बोले डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे द्वारा वीआरएस लेने से भी पूरे प्रकरण में राजनीतिक मंसूबों की आशंकाओं की पुष्टि होती है। बाकी कलई पांडे के विधानसभा चुनाव मैदान में उतरने से खुल जायेगी। भाजपा के सहयोग से नीतीश की बार-बार ताजपोशी इस बात का प्रमाण है कि लालू ने जो एम-वाई (मुस्लिम-यादव) का विजयी चुनावी समीकरण बनाया था, वह दरक चुका है। फिर भी पिछले विधानसभा चुनाव में लालू की अनुपस्थिति के बावजूद राजद का सबसे बड़े दल के रूप में उभरना बताता है कि भाजपा की हैसियत अब भी तीसरे नंबर की पार्टी की ही है। बिहार की जाति आधारित राजनीति में यह हैसियत बदलना तब तक संभव नहीं है, जब तक कि भाजपा अपने साथ असरदार वोट बैंक वाली जातियों और उनके बड़े चेहरों को नहीं जोड़ लेती।

लालू के बेटों तेजस्वी-तेज प्रताप की बचकानी राजनीति से निराश रघुवंश प्रसाद सिंह, भलेमानुष की छवि के बावजूद, ताकतवर राजपूत समुदाय का ऐसा ही चेहरा थे। दिल्ली के एम्स में जीवन की जंग लड़ रहे रघुवंश बाबू ने सादा कागज पर राजद से इस्तीफा तो लालू को भेज दिया, पर भाजपा ज्वाइन करने से पहले ही चल बसे। बाहुबली रामा सिंह को पाले में ला कर राजद खांटी समाजवादी रघुवंश की कमी की कितनी भरपाई कर पायेगा, चुनाव परिणाम ही बतायेगा, लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव दरअसल नीतीश कुमार की ही अग्निपरीक्षा साबित होंगे। नीतीश के पक्ष में सबसे सकारात्मक बात यह है कि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा साथ है और मुकाबले में कोई असरदार नेता नहीं है। बेशक राजद-जद यू गठबंधन में तेजस्वी, नीतीश के साथ उप मुख्यमंत्री रह चुके हैं, पर वह लालू का बेटा होने के नाते था, और उस दौरान भी वह अपनी कोई खास छाप नहीं छोड़ पाये,लेकिन इसके अलावा सारे मुद्दे नीतीश के विरुद्ध ही हैं। बिहार की शाश्वत बदहाली के अलावा कोरोनाकाल में प्रवासी मजदूरों की पीड़ा से ले कर बाढ़ की मार तक जितने भी मुद्दे चुनाव में विपक्ष उठायेगा, उनके निशाने पर नीतीश ही होंगे। संसद के हालिया मानसून सत्र में केंद्र सरकार द्वारा आपाधापी में पारित कराये गये कृषि और श्रम विधेयक भी अगर मुद्दा बनेंगे, तो उसका खमियाजा भाजपा के साथ-साथ जद यू को भी भुगतना पड़ेगा ही।

journalistrksingh@gmail.com

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