ट्रंप और शी की शिखर बैठक में व्यापार, तकनीक और वैश्विक संघर्षों से जुड़े कठिन मुद्दों पर बातचीत होगी। इसका महत्व शायद किसी एक समझौते में नहीं, बल्कि इसमें होगा कि दोनों देश अपनी प्रतिद्वंद्विता को किस सीमा तक नियंत्रित कर पाते हैं। हर मोर्चे पर खुला टकराव अमेरिका और चीन, दोनों के हित में नहीं।
आज जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ज्वाइंट बेस एंड्रयूज पहुंचेंगे, तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्वयं हवाई पट्टी पर उनका स्वागत कर सकते हैं। यह इसलिए भी अहम है कि मई में बीजिंग पहुंचने पर ट्रंप की अगवानी शी ने स्वयं नहीं की थी। ऐसे में एंड्रयूज पर ट्रंप की ओर से व्यक्तिगत स्वागत महज औपचारिकता नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक संकेत होगा।
अमेरिका और चीन रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन दोनों नेता यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि यह प्रतिस्पर्धा अनियंत्रित टकराव में न बदले। 24 सितंबर की बैठक में व्यापार, तकनीक और वैश्विक संघर्षों से जुड़े कठिन मुद्दों पर बातचीत होगी। लगभग चार वर्ष बाद दोनों नेता ऐसे समय में मिल रहे हैं, जब व्यापार शुल्क, दुर्लभ खनिज, एआई, ताइवान, तथा यूक्रेन और ईरान जैसे संघर्ष एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं। यह मुलाकात रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को संवाद के जरिए नियंत्रित करने की परीक्षा भी है। भारत के लिए यह शिखर बैठक विशेष महत्व रखती है। नई दिल्ली वाशिंगटन, मॉस्को और बीजिंग के साथ संतुलन बनाए हुए है। ट्रंप व शी के बीच किसी भी समझ से भारत की रणनीतिक स्थिति सीधे नहीं बदलेगी, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय माहौल प्रभावित हो सकता है।
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में व्यक्तिगत कूटनीति का महत्व बढ़ा है। उन्होंने लंबे संघर्षों में अमेरिकी भागीदारी कम करने की बात कही थी, लेकिन ईरान और यूक्रेन के मोर्चे अभी समाप्त नहीं हुए। इस परिस्थिति ने उन्हें सक्रिय बातचीत और समझौतों की ओर बढ़ाया है। ट्रंप का तरीका लेन-देन पर आधारित है। टैरिफ बातचीत का हथियार हैं, प्रतिबंध दबाव का साधन और आर्थिक संबंध रणनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा। चीन इस नीति की सबसे बड़ी परीक्षा है, क्योंकि वह व्यापारिक शक्ति होने के साथ तकनीकी व सैन्य प्रतिद्वंद्वी तथा रूस और ईरान का महत्वपूर्ण साझेदार भी है।
चीन के साथ हर मोर्चे पर अनिश्चितकालीन टकराव अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए भी महंगा पड़ सकता है। नवंबर की व्यापार समय-सीमा करीब है और दुर्लभ खनिजों तथा तकनीकी प्रतिबंधों पर तनाव है। संबंधों के कुछ हिस्सों को स्थिर करने से ट्रंप को अन्य संकटों पर ध्यान केंद्रित करने की गुंजाइश मिल सकती है। वैसे बैठक का तत्काल मुद्दा व्यापार रहेगा। अमेरिका चीनी बाजार में अपने सामान के लिए अधिक पहुंच चाहता है, जबकि बीजिंग को अमेरिकी शुल्क व तकनीकी प्रतिबंधों में अधिक निश्चितता चाहिए। इसलिए दोनों पक्ष मौजूदा व्यापार संघर्ष-विराम को नवंबर के बाद भी बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं।
इस समय दुर्लभ खनिज अधिक रणनीतिक विषय हैं। इनके प्रसंस्करण में चीन की प्रमुख स्थिति इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, रक्षा और एआई जैसे क्षेत्रों को प्रभावित करती है। अमेरिका विश्वसनीय आपूर्ति चाहता है, जबकि चीन को उन्नत तकनीक पर अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील चाहिए।
अमेरिका ने चीनी कंपनियों पर अत्याधुनिक एआई तकनीक से संबंधित जानकारी हासिल करने के आरोप लगाए हैं, वहीं बीजिंग ने ये आरोप खारिज किये। अब एआई मॉडल, उन्नत सेमीकंडक्टर, कंप्यूटिंग क्षमता और आंकड़ों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा जा रहा है। शिखर बैठक में शुल्क में बदलाव जल्दी हो सकता है, लेकिन तकनीकी बढ़त आने वाले दशकों तक आर्थिक और सैन्य शक्ति को प्रभावित कर सकती है। वहीं, ताइवान वह मुद्दा है, जिसमें व्यापक समझ की संभावना सबसे कठिन हो सकती है। बीजिंग चाहता है कि वाशिंगटन ताइवान की आजादी का स्पष्ट विरोध करे, जबकि अमेरिका के सहयोगी यह देखेंगे कि क्या सुरक्षा प्रतिबद्धताएं आर्थिक सौदेबाजी का हिस्सा बन रही हैं। इस समय चीन के लिए ताइवान संप्रभुता का मूल प्रश्न है, तो अमेरिका के लिए यह हिंद-प्रशांत रणनीति और क्षेत्रीय सहयोगियों से जुड़ा है। इसलिए ट्रंप और शी यदि टकराव से बच जाएं, तो उनके बयानों का पूरे एशिया में बारीक विश्लेषण होगा।
जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान खासतौर पर वाशिंगटन की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं पर नजर रखेंगे। अमेरिका-चीन संवाद क्षेत्रीय तनाव को कम कर सकता है। यदि किसी समझौते को अमेरिकी प्रतिरोध क्षमता को कमजोर करने वाला माना गया, तो सहयोगी देशों में नई चिंताएं पैदा हो सकती हैं। यूरोप भी इस बैठक पर कड़ी नजर रखेगा, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अमेरिका चीन के साथ ऐसा कोई बड़ा समझौता न करे, जिसका यूरोप की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
ईरान और यूक्रेन भी बातचीत से पूरी तरह बाहर नहीं रहेंगे। चीन के ईरान के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक संबंध हैं, और रूस के साथ मजबूत रिश्ते हैं। वाशिंगटन चाहता है कि बीजिंग इन संबंधों का इस्तेमाल तेहरान और मॉस्को पर प्रभाव डालने के लिए करे, लेकिन चीन के अपने आर्थिक और रणनीतिक हित भी हैं।
ट्रंप और शी की बैठक का सबसे बड़ा महत्व शायद किसी एक समझौते में नहीं, बल्कि इस बात में होगा कि दोनों देश अपनी प्रतिद्वंद्विता को किस सीमा तक नियंत्रित कर पाते हैं। फिर भी संवाद का महत्व कम नहीं है। अमेरिका और चीन दोनों जानते हैं कि हर मोर्चे पर खुला टकराव उनके हित में नहीं है।
इस बैठक का आकलन इस आधार पर होगा कि वे किन मुद्दों को अनसुलझा छोड़ते हैं। आज की विभाजित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में प्रतिद्वंद्विता को खुले टकराव में बदलने से रोक पाना भी एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक लक्ष्य है।
लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।

