आय व संपत्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण के चलते अधिकांश लोगों के पास बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। हाशिए पर पड़े वर्ग आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, नौकरियों आदि तक अपेक्षित पहुंच नहीं बना पाते।
भारत का नाम भले ही विश्व की सर्वाधिक तीव्रगति से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है किंतु समानता के दृष्टिगत आज भी समाज में बृहद अंतर देखने को मिलता है। नवीनतम ‘विश्व असमानता रिपोर्ट, 2026’ की मानें तो, भारत की कुल संपत्ति का 65 प्रतिशत (लगभग दो-तिहाई) हिस्सा शीर्ष 10 फ़ीसदी अमीरों के पास केंद्रित है, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों के पास मात्र 6.4 प्रतिशत संपत्ति है। महिला श्रम भागीदारी दर सिर्फ 15.7 प्रतिशत है।
देश के टॉप 1 प्रतिशत लोगों के पास देश की 40 प्रतिशत से अधिक संपत्ति है, जोकि 1961 के पश्चात सबसे ज्यादा आंकी गई। शीर्ष 10 प्रतिशत जहां राष्ट्रीय आय का 58 प्रतिशत कमाते हैं, वहीं निम्न 50 प्रतिशत लोगों को केवल 15 प्रतिशत आय मिलती है। 2014 से 2024 के बीच टॉप 10 प्रतिशत तथा नीचे के 50 प्रतिशत के बीच आय का अंतर थोड़ा बढ़कर, 38 प्रतिशत से 38.2 प्रतिशत हो गया।
आंकड़ों के तहत, भारत में औसत प्रति व्यक्ति वार्षिक आय लगभग 6,200 यूरो तथा औसत संपत्ति लगभग 28,000 यूरो है। रिपोर्ट भारत को विश्व के सबसे असमान देशों में सम्मिलित करती है। असमानता दर, आर्थिक उदारीकरण के बाद तेज़ी से बढ़ी।
भारत सरकार के आंकड़े खंगालें तो अभी तक 41.32 प्रतिशत लोगों को आवास उपलब्ध नहीं। 31.52 प्रतिशत आबादी संतुलित पोषण से वंचित है हालांकि यही रिपोर्ट 24.82 करोड़ लोगों के ग़रीबी रेखा से ऊपर आने का दावा करती है। उपभोक्ता बाजार के अनुसार, प्रीमियम उत्पादों की मांग बढ़ना तथा अफोर्डेबल रियल एस्टेट सेगमेंट में गिरावट आना भी असमानता का सूचक है। आय व संपत्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण के चलते अधिकांश लोगों के पास बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। हाशिए पर पड़े वर्ग आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, नौकरियों आदि तक अपेक्षित पहुंच नहीं बना पाते।
उन्नत व पिछड़े राज्यों के बीच विकास का अंतर भी असमानता बढ़ाता है। विस्थापन के चलते लोगों को अपनी आजीविका तथा अधिकारों से वंचित होना पड़ता है। भूमि स्वामित्व में असमानता तथा कृषि में अक्षमताएं ग्रामीण आय पर प्रभाव डालती हैं। पिछड़े क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुंच न होने से स्थानीय निवासियों की कमाई की क्षमता सिमटती है। देश की आबादी का एक बड़ा अंश कम मजदूरी तथा अस्थिर रोजगार वाले असंगठित क्षेत्र में कार्य करता है। कुशल व अकुशल श्रमिकों के बीच वेतन का भारी अंतर देखा गया। कई लोग अपनी योग्यता से कम काम करते हैं, जिसका उत्पादकता व आय, दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
वैश्वीकरण से वास्तव में असमानता को भी बढ़ावा मिला। विनिर्माण क्षेत्र में बाधाओं तथा सेवा क्षेत्र के लाभ कुछेक वर्गों तक सीमित होने की वज़ह से लाखों लोगों को रोज़ग़ार नहीं मिल पाता। अप्रत्यक्ष करों पर अधिक निर्भरता जहां गरीबों पर अतिरिक्त बोझ डालती है, वहीं असंगठित क्षेत्रों को भी नुकसान उठाना पड़ता है। ख़ासकर आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतें निम्न वर्ग की आय और भी कम कर देती हैं।
भारत में आय असमानता के मुख्य कारकों में शिक्षा-स्वास्थ्य तक असमान पहुंच, रोज़ग़ार के अवसरों में अंतर, कौशल तथा वेतन में खाई, क्षेत्रीय असंतुलन, जाति-लिंग आधारित भेदभाव एवं धन का संकेंद्रण शामिल हैं। मुद्रास्फीति, अप्रभावी सरकारी नीतियों, सामाजिक न्याय के सिद्धांत लागू करने की विफलता, संसाधनों के वितरण व आर्थिक अवसरों में असमानता से अंतर और गहरा हो जाता है।
भारत में असमानता एक जटिल तथा व्यापक समस्या बनी हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक़, इस असंतुलन का आर्थिक व सामाजिक ढांचे, दोनों पर ही गहरा प्रभाव पड़ सकता है। ज़ाहिर है, अमीर-गरीब के मध्य बढ़ती खाई न केवल देश के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करती है बल्कि समाज में अशांति, असंतोष, पारस्परिक द्वेष तथा संघर्ष को भी जन्म देती है। रिपोर्ट के तथ्य हमारे राजनीतिज्ञों के आर्थिक-सामाजिक समता संबंधी वे तमाम दावे ख़ारिज करते प्रतीत होते हैं, जिनके आधार पर वे चुनावी वोट बैंक भुनाते दिखाई पड़ते हैं।
दरअसल, राष्ट्र के सर्वांगीण विकास की अवधारणा ‘समतापरक समाज’ के निर्माण पर ही टिकी है। समतावादी समाज का मुख्य उद्देश्य यही सुनिश्चित करना रहा कि समाज के सभी सदस्यों को बिना किसी भेदभाव समान अधिकार, अवसर तथा संसाधन प्राप्त हों। विशेषज्ञ भारत में धन के पुनर्वितरण, टैक्स न्याय के लिए व्यापक संपत्ति कर तथा सुपर टैक्स जैसे उपायों की वकालत करते हैं। सुनियोजन द्वारा समाज में मौज़ूद व्यापक अंतर निश्चय ही पाटा जा सकता है।

