नशे के अधिकांश मामले तनाव, चिंता या भावनात्मक अस्थिरता से जुड़े होते हैं। ऐसे में योग और प्राणायाम को केवल व्यायाम समझना भूल होगी। ये मन को स्थिर करने वाले वैज्ञानिक अभ्यास हैं, जो तनाव को कम करते हैं और आत्म-नियंत्रण को बढ़ाते हैं।
आज के समय में, नशा सबसे खतरनाक चुनौतियों में से एक बन गया है। ऐसी चुनौती जिसे केवल स्वास्थ्य समस्या मानकर हल नहीं किया जा सकता। नशा व्यक्ति की इच्छा शक्ति को खोखला करता है, परिवारों को अस्थिर करता है और समाज के भविष्य को कमजोर बनाता है। यह समस्या जिस गति से फैल रही है, उसे रोकने के लिए पारंपरिक उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। आवश्यक है कि हम इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को गहराई से समझें और सामूहिक स्तर पर हस्तक्षेप करें।
नशा मुक्ति की राह दवाइयों और पुनर्वास केंद्रों से होकर जरूर गुजरती है, लेकिन इसकी शुरुआत कहीं गहरी—परिवार, समाज और शिक्षा के त्रिभुज में होती है। यही त्रिकोण तय करता है कि नई पीढ़ी किस दिशा में जाएगी, निर्माण की ओर या विनाश की ओर। हर समाज की पहली पाठशाला परिवार ही होता है। बच्चों में जो आदतें, स्वभाव और भावनात्मक धारणा विकसित होती है, उसकी नींव घर में ही रखी जाती है। इसलिए नशे के खिलाफ सबसे प्रभावी हस्तक्षेप परिवार में ही संभव है।
घर में मौजूद कलह, निरंतर दबाव या अभिभावकों की भावनात्मक दूरी, ये तीनों बच्चे को मानसिक तौर पर कमजोर बनाते हैं। यह कमजोरी ही उन्हें गलत संगत की ओर धकेल सकती है। इसके विपरीत, ऐसा परिवार जो संवाद को महत्व देता हो, अनुशासन को सहजता से लागू करता हो और जहां बच्चों को समझने की कोशिश हो, वहां बच्चों का मनोबल मजबूत होता है। इसलिए नीतियों और योजनाओं में परिवार-केंद्रित हस्तक्षेप, जैसे पैरेंटिंग वर्कशॉप, पारिवारिक परामर्श, तनाव प्रबंधन को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
यह सच है कि आज का बच्चा अभूतपूर्व दबावों के बीच बढ़ रहा है। प्रतिस्पर्धा का दायरा बढ़ गया है, सोशल मीडिया ने तुलना की संस्कृति को और गहरा कर दिया है और उपलब्धि को ही मूल्यांकन का मानक बना दिया है। जब एक किशोर यह महसूस करता है कि वह ‘पीछे छूट रहा है’, तब उसके भीतर अधूरापन और बेचैनी जन्म लेती है। यही मानसिक असुरक्षा उसे गलत आदतों की तरफ खींच सकती है। बच्चों को वह वातावरण देना होगा, जहां वे सुरक्षित महसूस करें, अपनी अभिव्यक्ति के लिए जगह पाएं और रचनात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेकर ऊर्जा को सकारात्मक दिशा दें। सामुदायिक खेल मैदान, कला-संगीत केंद्र, वाद-विवाद और विज्ञान मंच—ये केवल गतिविधियां नहीं, बल्कि एक स्वस्थ समाज की सुरक्षा दीवारें हैं। वे बच्चों को व्यस्त रखते हैं, उनकी रुचियों को पहचानते हैं और उन्हें अर्थपूर्ण गतिविधियों से जोड़ते हैं।
नशे के अधिकांश मामले तनाव, चिंता या भावनात्मक अस्थिरता से जुड़े होते हैं। ऐसे में योग और प्राणायाम को केवल व्यायाम समझना भूल होगी। ये मन को स्थिर करने वाले वैज्ञानिक अभ्यास हैं, जो तनाव को कम करते हैं और आत्म-नियंत्रण को बढ़ाते हैं। स्कूलों और समुदायों में दिन की शुरुआत प्राणायाम से करना बच्चों में मानसिक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकता है। एक शांत मन न केवल बेहतर निर्णय लेता है, बल्कि गलत आकर्षणों के प्रभाव से भी बचा रहता है। मानसिक स्वास्थ्य को हमारा समाज अब भी पर्याप्त महत्व नहीं देता। परिणामस्वरूप, बच्चे अपनी भावनाओं को दबाते हैं। अत: मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा और सामाजिक कार्यक्रमों में केंद्रीय स्थान मिलना चाहिए।
शिक्षा का उद्देश्य जब केवल नौकरी तक सीमित हो जाता है, तब बच्चों पर दबाव बढ़ना लाज़िमी है। शिक्षा हमेशा से मानवता, विवेक और चरित्र-निर्माण का आधार रही है। ऐसे विद्यार्थी जिनके भीतर उद्देश्य की स्पष्टता हो, जिनकी शिक्षा रुचि आधारित हो और जिनका आत्मविश्वास मजबूत हो, वे गलत आदतों की ओर कम आकर्षित होते हैं। इसलिए शिक्षा प्रणाली को ऐसे परिवेश पर जोर देना चाहिए जहां प्रतियोगिता की जगह सहयोग हो, अंक की जगह व्यक्तित्व विकास को प्राथमिकता मिले और बच्चों को विकल्पों, रुचियों और कौशलों के अनुरूप आगे बढ़ाया जाए। शिक्षक और अभिभावक को समझना होगा कि दबाव सफलता नहीं, बल्कि यह केवल बेचैनी पैदा करता है।
नशे में फंसा व्यक्ति अपराधी नहीं, एक पीड़ित है। परिवार, शिक्षकों और समाज को चाहिए कि वे ऐसे व्यक्तियों के लिए खुला, सम्मानजनक और सहयोगी वातावरण बनाएं। जब कोई व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसके लिए रास्ता बंद नहीं हुआ है, तभी वह नशा छोड़ने की दिशा में पहला कदम उठा पाता है। नशा केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की परीक्षा भी है। परिवार का वातावरण, समाज का चरित्र, शिक्षा की दिशा, मानसिक स्वास्थ्य और सकारात्मक गतिविधियों का प्रोत्साहन, ये सभी मिलकर ही इस चुनौती को परास्त कर सकते हैं।
नशा मुक्ति एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक सामाजिक संकल्प है। यदि हम सामूहिक रूप से इस दिशा में आगे बढ़ें तो आने वाली पीढ़ी को नशे की गिरफ्त से मुक्त कर एक सशक्त, संवेदनशील और जागरूक समाज की ओर ले जा सकते हैं।

