तिरछी नज़र

शहर का जिक्र न करिये हर पहर

शहर का जिक्र न करिये हर पहर

संतोष उत्सुक

सठियाए, अड़सठयाए, चौहतराए, दांत गंवाते, कमज़ोर आंतों वाले बंदे कहीं बैठ जाएं तो यह बात ज़रूर करते हैं कि अपना शहर तो बेहोश लोगों का शहर हो गया है। यहां अब हर तरह की खामोशियां बढ़ रही हैं। कितनी जगह चुपचाप कूड़ा फेंकने वाले लोग बढ़ते जा रहे हैं। किसी गलत बात पर प्रतिक्रिया देना तो हमारे शहर के लोग कभी सीखे ही नहीं तभी तो इस शहर को कोई पूछता नहीं। आजकल तो यहां भी ज़रा-सी बात पर बुरा मान जाने वाले बंदे बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में क्या बात करें। अड़सठयाए बोले, कुछ लोग तो इस शहर को जागरूक, सभ्य, बुद्धिजीवियों की नगरी भी मानते होंगे।

चौहतराए कहने लगे शहर में पैदल चलना मुश्किल हो गया है। सठियाए ने कहा अब तो हर शहर में ही ऐसा हो चुका है। चौसठाए बोले शहर में पब्लिक टॉयलेट्स की हालत खराब है। सठियाए बोले हर जगह यही हाल है लेकिन किसने कहा वहां पेशाब करो। घर से करके चलो, किसी दफ्तर में करो, ज्यादा दिक्कत है तो एडल्ट डाइपर लगा कर चलो या फिर मौक़ा देखकर चौका मार लो। बच्चे तो क्या, हमने तो कइयों को कहीं भी करते देखा है और लेडीज़, जवाब आया, उनके बारे में तो कोई सोचकर राजी नहीं।

अड़सठयाए ने माहौल बदलने के लिए कहा- पुरानी फिल्मों के गाने कितने मधुर और मीनिंगफुल होते थे। आजकल देखो उनकी नक़ल कर काम चला रखा है। सठियाए बोले, जनाब जब गानों का यह हाल है तो आप अपने शहर में क्यूं पसंद का टॉयलेट ढूंढ़ रहे हो। तिरेसठाए पूछने लगे, आप कुछ बदलाव करवा सकते हो, क्या आपके पास पहुंच, पैसा और ताक़त है। कुछ भी नहीं है न। अपने शहर के बारे में ज्यादा मत सोचो, यहां-वहां की बातें कर टाइम पास करो । डिजिटल देखो, नहीं देखना तो बेहोश रहो, नींद खुल जाए तो बरसात में फले-फूले हरे-भरे वृक्षों के साए में सैर करो, इधर-उधर मत घूमो। बिलकुल मत देखो कि नगरपालिका के ठेकेदार ने कितने लाख में कितने फुट काम निपटाया है।

उनकी उचित सलाह जारी थी, थका हुआ महसूस करो तो मनपसंद पार्क में बेंच पर सुस्ता लो। ज्यादा दुखी महसूस करो तो पूजास्थल जाकर वहां वाले ऊपर वाले से खूब शिकायत करो। ऐसे नैतिक कर्म करने से भड़ास बह जाएगी और सेहत भी ठीक रहेगी जो कि आज की तारीख में सबसे ज़रूरी है। टाइम फिर भी बच जाए तो फेसबुक, यूट्यूब, व्हाट्सएप का स्वादिष्ट चाट-मसाला तो है ही। तिरेसठाए की समझदारी भरी बातें सुनकर सभी वरिष्ठजनों को मीठी-मीठी नींद आने लगी थी। ऐसा लग रहा था पार्श्व में गीत बज रहा है, अपने शहर की बातें किया न करो।

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