चर्चित चेहरा

अपने न बिछुड़ें, तीस साल में खोदी नहर

अपने न बिछुड़ें, तीस साल में खोदी नहर

अरुण नैथानी

अपनी जमीन से अपनों के उखड़ने की टीस कितनी वेदनापूर्ण होती है, ‘गया’ जनपद के कोठिलवा गांव के लौंगी भुइंया से बेहतर कौन जान सकता है। गांव में पानी के संकट से बेजार खेती और ग्रामीणों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी होने वाले पलायन ने गांव को बेनूर बना दिया। लौंगी के चार में से तीन बेटे जब एक-एक कर रोजगार की तलाश में शहर चले गये तो लौंगी ने समस्या के स्थायी समाधान की सोची। समाधान तलाशने में उन्हें तीस साल लगे। अब जब नहर से गांव में पानी आया है और आसपास के कई गांवों में समृद्धि दस्तक देने लगी है तो लौंगी का सपना साकार हुआ है। कल तक जिसे लोग पागल कहते थे, वो आज हीरो है। देश के चोटी के उद्योगपति, नेता, नौकरशाह व मीडिया वाले लौंगी के घर का पता पूछ रहे हैं।

पहाड़ काटकर नहर निकालने वाले सत्तर साल के लौंगी भुइंया हर भारतीय के लिये प्रेरणापुंज हैं। इसके बावजूद कि शासन-प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली, घरवालों ने भी कहा कि ये संभव नहीं है। गांव वाले पिछले तीन दशक तक उन्हें गाहे-बगाहे नहर खोदते देखते तो उन्हें पागल कहते मगर वे अपने इरादों से टस से मस नहीं हुए। फावड़ा, कुदाल के साथ तीखे उनके इरादे थे, आत्मविश्वास था और बदलाव की ललक थी कि गांव में समृद्धि की बयार आए। गांव वाले भी मोटे अनाज की जगह गेहूं-चावल की फसल उगायें। इस साल उनके और आसपास के गांवों में धान की फसल उगी है। ग्रामीणों की आंखों में खुशी के आंसू हैं। वे रात-दिन लौंगी भुइंया का गुणगान करते हैं। लौंगी को विश्वास है कि उनके तीन बेटे भी एक दिन गांव लौट आएंगे। खेतीबाड़ी करके अपनी जड़ों के साथ जुड़कर जीवनयापन कर सकेंगे।

यह सुखद संयोग ही है कि दूसरे माउंटमैन लौंगी भुइंया भी बिहार के ही हैं। आर्थिक विषमता और तंत्र की काहिली ने उनके इरादे इतने बुलंद कर दिये कि पहाड़ का सीना चीर कर नहर निकाल दी। इससे पहले पत्नी के कष्टों को दूर करने के लिये दशरथ मांझी ने पहाड़ काट कर रास्ता बना दिया था, जिसकी चर्चा पूरी दुनिया में हुई थी। अब लौंगी भुइंया नये माउंटमैन बन गये हैं।

वे कहते हैं, ‘जब मैं नहर खोदने का काम शुरू कर चुका था तब मुझे दशरथ मांझी के बारे में पता चला। मेरा तो बस एक ही मकसद था कि गांव में पानी आ जाए, जिससे भरपेट भोजन उपलब्ध होने से बच्चे गांव छोड़कर नहीं जायेंगे। बुलंद इरादों के लौंगी भुइंया को एक बार जानवर चराते वक्त विचार आया कि गांव के निकट स्थित बगेंठा पहाड़ के उस तरफ जलाशय में काफी पानी है। बारिश में भी बहुत पानी आता है, लेकिन यूं ही बह जाता है। यदि इस पानी को गांव के तालाब तक लाया जाये तो तस्वीर बदल सकती है। गेहूं-धान की फसल उगायी जा सकती है। फिर उन्होंने पहाड़ के निकट जमा होने वाले पानी को गांव तक लाने का नक्शा तैयार किया। फिर शुरू हो गया पहाड़ को काटकर नहर बनाने का का काम। घरेलू काम से जब भी वक्त मिलता, वे नहर खोदने में लग जाते। उनकी पत्नी भी अक्सर कहती-क्यों पहाड़ से टकरा रहे हो, तुम यह असाध्य कार्य नहीं कर पाओगे। गांव वाले भी निराश करते थे लेकिन दृढ़ निश्चयी लौंगी पीछे नहीं हटे।

फिर एक दिन ऐसा आया जब लौंगी भुइंया की तीस साल की मेहनत साकार हुई। उन्होंने तीन किलोमीटर लंबी, पांच फीट चौड़ी और तीन फीट गहरी नहर बना डाली। बिना किसी सरकारी मदद के। अगस्त में उनका लक्ष्य पूरा हुआ। साथ में बरसात का पानी आया तो गांव व आसपास के कई गांवों में फसलें लहलहाने लगीं। निस्संदेह, लौंगी भुइंया का यह अनूठा कार्य सदियों तक लोगों को प्रेरणा देता रहेगा कि सब कुछ सरकार के भरोसे रहकर हासिल नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के प्रयास भी तस्वीर बदल सकते हैं। पिछड़े मसहर समाज से आने वाले लौंगी भुइंया आज अगड़े समाज के लिये भी प्रेरणापुंज हैं। व्यक्ति की महानता देखिये कि उनका घर कच्चा है। घर में शौचालय नहीं है। लेकिन वे समाज कल्याण के लिये नहर खोदते रहे। चाहते तो अपना पक्का मकान बना सकते थे। उनकी इच्छा रही कि ट्रैक्टर मिल जाता तो ढंग से खेती कर पाता।

कहते हैं न कि ईमानदारी-मेहनत और निस्वार्थ भाव से काम करने वाले की ईश्वर भी सुनते हैं। आज उनके घर में मदद करने वालों का तांता लगा है। जब एक पत्रकार ने ट्विटर पर उद्योगपति आनंद महिंद्रा को टैग करते हुए लौंगी भुइंया को एक ट्रैक्टर देने की गुजारिश की तो तुरंत कार्रवाई हुई। आनंद महिंद्रा ने लिखा कि लौंगी भुइंया द्वारा खोदी गई नहर ‘ताजमहल’ और ‘पिरामिड’ के बराबर प्रभावशाली है। उन्हें ट्रैक्टर देकर हम गौरवान्वित होंगे। उन्होंने लौंगी भुइंया का पता पूछकर क्षेत्रीय डीलर से उन्हें ट्रैक्टर पहुंचवा दिया। लौंगी भुइंया बोले कि मैं खुश हूं, ऐसा तो मैंने सपना भी नहीं देखा था। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने भी कैनाल मैन कहे जाने वाले लौंगी भुइंया को नकद राशि देकर सम्मानित किया। उन्होंने गांव तक पक्की सड़क लौंगी भुइंया के नाम पर बनवाने और  एक सरकारी स्कूल का नामकरण उनके नाम पर करवाने का भी वायदा किया है। बहरहाल, कैनालमैन लौंगी भुइंया द्वारा नक्सल प्रभावित बांकेबाजार प्रखंड की तस्वीर बदलने की मुहिम कई पीढ़ियों तक याद की जायेगी।

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