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अनसुनी न करें हिमालय की चेतावनियों को

हिमालय

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क्षेत्रीय स्तर पर, हिमालयी क्षेत्र के देशों के बीच सहयोग लगभग न के बराबर है। जबकि इन देशों को साथ मिलकर काम करना चाहिए, क्योंकि जलवायु और पर्यावरण से जुड़ी आपदाएं राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानतीं, जैसा कि नेपाल की त्रासदी से पता चला है। सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेकांग जैसी बड़ी नदियां हिमालय से निकलती हैं और कई देशों से होकर गुजरती हैं।

हिमालय लगातार खतरनाक आपदाओं के रूप में एक के बाद एक चेतावनियां दे रहा है—जैसे अचानक बाढ़, हिमस्खलन, ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़, बादल फटना, भूस्खलन और ज़मीन का बुरी तरह धंसना। हमने केदारनाथ, धौलीगंगा, जोशीमठ, सिक्किम और अब नेपाल में इन्हें होते देखा है, अपने पीछे भारी तबाही छोड़ते हुए।

हर आपदा के बाद, ग्लेशियरों की निगरानी, आरंभिक चेतावनी प्रणालियां विकसित करने, खतरे और जोखिमों की मैपिंग करने और बचाव संबंधी एवं नुकसान कम से कम रखने के उपाय करने की बातें होती हैं। कुछ हफ़्तों या महीनों के बाद, शोर-शराबा थम जाता है और सब कुछ पहले की भांति हो जाता है।

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हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं से निपटने के लिए एक बहुआयामी रणनीति की ज़रूरत है, जिसमें वैज्ञानिक शोध, नीति-निर्माण, क्रियान्वयन तंत्र, जन-जागरूकता और समुदाय की भागीदारी शामिल हो। विज्ञान ने हिमालय के पर्यावरण, खासकर ग्लेशियरों और जल प्रणालियों से जुड़ी स्थिति के खतरों के बारे में स्पष्ट राय दी है—कि क्या करने की ज़रूरत है और समझने में क्या कमियां हैं। वैश्विक स्तर पर, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने कई रिपोर्टें प्रकाशित की हैं, जिनमें विभिन्न देशों से ग्लेशियरों और पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र पर शोध के नतीजों को एक साथ लाया गया है।

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भारत में, नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने रिमोट सेंसिंग तस्वीरों का इस्तेमाल करके भारतीय हिमालयी क्षेत्र में कुल मिलाकर लगभग 28,000 ग्लेशियल झीलों में से ज़्यादा जोखिम वाली 7,500 ग्लेशियल झीलों की मैपिंग की है। साथ ही, खतरनाक हो सकने वाली ग्लेशियल झीलों से बनने वाली बाढ़ की संभावना भी तैयार की है। इसमें बाढ़ का खतरा और अगर ये झीलें कभी टूटती हैं, तो नीचे बसे इलाकों तक बाढ़ की लहरें पहुंचने में लगने वाले संभावित समय का ब्योरा भी दिया गया है।

इस साल मार्च में, काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) ने दो अहम रिपोर्टें प्रकाशित कीं—'1990 से 2020 तक हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों की बदलती गतिशीलता' और 'एचकेएच ग्लेशियर आउटलुक 2026: हिमालयी ग्लेशियरों की 50 साल की निगरानी से मिली जानकारी।'

इन रिपोर्टों के नतीजे चिंताजनक हैं। पहली रिपोर्ट हिंदू कुश क्षेत्र के 63,761 ग्लेशियरों के डेटा पर आधारित थी, जो 55,000 वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा इलाके में फैले हैं और जिनमें अनुमानित 5,700 क्यूबिक किलोमीटर बर्फ का भंडार है। विश्लेषण से पता चला है कि इस इलाके में ग्लेशियर 1990 से लगातार सिकुड़ रहे हैं, जिससे कुल ग्लेशियर क्षेत्र में 12 प्रतिशत की कमी आई है और बर्फ के अनुमानित भंडार में 9 फीसदी की गिरावट हुई है।

ग्लेशियर सिकुड़ने की रफ़्तार सबसे ज़्यादा 2010 और 2020 के बीच बढ़ी, खासकर पूर्वी और मध्य हिस्सों में। सिंधु नदी बेसिन के ग्लेशियर क्षेत्र में 6 फीसदी की कमी आई, जबकि गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में क्रमशः 21 और 16 प्रतिशत की कमी देखी गई। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ग्लेशियर के इस तरह सिकुड़ते जाने का सीधा नतीजा सूखे के मौसम में पानी की कमी और ग्लेशियल झील के टूटने से बनी बाढ़, हिमस्खलन, भूस्खलन और मलबे के बहाव जैसे जोखिम होंगे।

निगरानी किए गए 38 ग्लेशियरों पर आधारित दूसरी रिपोर्ट संकेत देती है कि ‘हिमालय के क्रायोस्फीयर (बर्फ वाले हिस्से) के कुछ हिस्से ऐसे नाजुक मोड़ के करीब हैं, जिसके बाद उनकी सिकुड़न को रोकना संभव नहीं होगा।’ आईसीआईएमओडी के महानिदेशक पेमा ग्यामत्शो का नीति निर्माताओं के लिए सीधा संदेश था—‘यह कोई दूर की समस्या नहीं है, बल्कि एक ऐसा संकट है जो वर्तमान में मुंह बाए खड़ा है, और हर गर्मी और मॉनसून में नई आपदाएं आ रही हैं। इस सदी में बर्फ घटने की दर दोगुनी हो गई है।’

नेपाल में बनी नवीनतम आपदा के बाद ये शब्द लगभग भविष्यवाणी जैसे लगते हैं। ग्यामत्शो के अनुसार, ‘यह अब अनदेखी की जा सकने वाली वह स्थिति नहीं रही कि अचानक से सामना हो; ये हमारा नया यथार्थ हैं।’ ग्लेशियर गतिशीलता विज्ञान और 1974 से इकट्ठा किए गए सैटेलाइट एवं ज़मीनी डेटा के विश्लेषण पर आधारित यह शायद सबसे स्पष्ट चेतावनी थी।

वैज्ञानिक डेटा विश्लेषण से और कार्रवाई न करने के गंभीर नतीजों के बारे में चेतावनी देकर अपना काम कर रहे हैं, लेकिन नीति निर्माता, राजनेता और प्रशासन की प्रतिक्रिया धीमी, बिखरी हुई या उदासीन भी रही है। दुनिया भर में, आईपीसीसी की रिपोर्टों पर प्रतिक्रिया सुस्त रही है, खासकर जब मुख्य मुद्दे को हल करने की बात आए—यानी ग्लोबल वार्मिंग के असर को कम करने के लिए उत्सर्जन में कटौती करना, जो सीधे तौर पर हिमालय को प्रभावित कर रहा है।

क्षेत्रीय स्तर पर, हिमालयी क्षेत्र के देशों के बीच सहयोग लगभग न के बराबर है। जबकि इन देशों को साथ मिलकर काम करना चाहिए, क्योंकि जलवायु और पर्यावरण से जुड़ी आपदाएं राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानतीं, जैसा कि नेपाल की त्रासदी से पता चला है। सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेकांग जैसी बड़ी नदियां हिमालय से निकलती हैं और कई देशों से होकर गुजरती हैं। उदाहरणार्थ, एक देश में भूस्खलन से दूसरे देश में प्रलयंकारी बाढ़ आ सकती है। कम से कम और कुछ नहीं तो डेटा और जानकारी साझा की जानी चाहिए, तत्पश्चात संयुक्त निगरानी और वैज्ञानिक सहयोग किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय स्तर पर भी, नीति-निर्माताओं ने लगातार विज्ञान पर आधारित चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया है। कई आपदाओं के बावजूद, आपदा के जोखिम को कम करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं, और जलविद्युत परियोजनाओं और बड़े बुनियादी ढांचे का निर्माण जारी है। पिछले साल जुलाई में ग्लेशियर झील के फटने से ल्हेन्दे खोला नदी में आई बाढ़ ने नेपाल के रसुवा-नुवाकोट क्षेत्र में कम से कम एक दर्जन जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचाया था, जो इस बार और बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। त्रिशूली बेसिन में कम से कम 36 जलविद्युत परियोजनाओं पर काम चल रहा है या पूरा होने के अलग-अलग चरणों में हैं। बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों ने इन परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों को व्यवस्थित रूप से नज़रअंदाज़ करके या कम आंककर अपना योगदान दिया है। भारत में भी उन घाटियों और बेसिन में जलविद्युत परियोजनाओं पर काम जारी है, जहां ग्लेशियल झील फटने से बनने वाली बाढ़, हिमस्खलन और मलबे के बहाव की आशंका पूरी-पूरी है।

पर्यावरण की दृष्टि से हिमालय के संवेदनशील क्षेत्र भू-राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील हैं, जिनमें भारत, चीन और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र शामिल हैं। इसलिए, सरकारें पर्यावरणीय चिंताओं और चेतावनियों की परवाह किए बिना रणनीतिक उद्देश्यों के लिए बुनियादी ढांचे का विकास करना चाहती हैं। इस क्षेत्र के देश पर्यटन और उससे जुड़े बुनियादी ढांचे पर कोई लगाम नहीं चाहते।

वैज्ञानिक सबूतों और नीति-निर्माण के बीच की खाई को पाटकर, हम पहाड़ों में आपदाओं के प्रभाव को कम कर सकते हैं।

लेखक विज्ञान संबंधी विषयों के टिप्पणीकार हैं।

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