अभिव्यक्ति बनाम राजद्रोह

असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा

असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा

अनूप भटनागर

अनूप भटनागर

सरकार से असहमति रखने वाले पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ दर्ज राजद्रोह का मामला देश की सर्वोच्च अदालत ने रद्द कर दिया है और ऐसा करते समय उसने 1962 के न्यायालय के एक फैसले का हवाला दिया है। इससे पहले भी न्यायालय ने तीन मार्च को जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डा. फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ दायर राजद्रोह का मामला निरस्त करते हुए कहा था कि असहमति वाले विचारों की अभिव्यक्ति को राजद्रोह नहीं कहा जा सकता। भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए में राष्ट्रद्रोह की परिभाषा के अनुसार अगर कोई व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता या बोलता या ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, जिससे असंतोष पैदा हो तो यह राष्ट्रद्रोह है। यह दंडनीय अपराध है।

ब्रिटिश हुकूमत ने अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को कुचलने के लिये भारतीय दंड संहिता में इस तरह का कठोर प्रावधान किया था। लेकिन अब तो हमारे देश में लोकतंत्र है और हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को बोलने और अपनी बात कहने की आजादी प्रदान करता है। ऐसी स्थिति में कानून की किताब में पुराने स्वरूप में ही बरकरार इस प्रावधान का प्रशासन दुरुपयोग भी करता है।

पत्रकार विनोद दुआ के यूट्यूब के एक कार्यक्रम के आधार पर भाजपा नेता ने शिमला में राजद्रोह सहित कई आरोपों में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। इस प्राथमिकी को निरस्त कराने के लिये ही दुआ को उच्चतम न्यायालय जाना पड़ा। इस मामले में न्यायमूर्ति उदय यू ललित और न्यायमूर्ति विनीत सरन की पीठ ने अपने 116 पेज के फैसले में स्पष्ट किया है कि प्रत्येक पत्रकार 1962 की केदार नाथ सिंह प्रकरण की व्यवस्था के अनुरूप संरक्षण का हकदार होगा और भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए और धारा 505 के तहत प्रत्येक अभियोजन इन धाराओं के दायरे के अनुरूप ही होना चाहिए।

हालांकि, न्यायालय ने विनोद दुआ का यह अनुरोध अस्वीकार कर दिया कि एक उच्चस्तरीय समिति की मंजूरी के बगैर 10 साल से ज्यादा के अनुभव वाले पत्रकार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की जानी चाहिए। न्यायालय ने कहा कि ऐसा करना विधायिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण होगा। जहां तक विनोद दुआ के कार्यक्रम का सवाल था तो न्यायालय का मानना था कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों के आधार पर राजद्रोह का कोई मामला नहीं बनता और इसके लिये किसी भी प्रकार का मुकदमा चलाना संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) में याचिकाकर्ता को प्राप्त मौलिक अधिकारों का हनन होगा।

सवाल यह है कि 1962 की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले के बावजूद नागरिकों, विशेषकर पत्रकारों के खिलाफ राजद्रोह के आरोप में मामले दर्ज होते रहे हैं और इसकी चपेट में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति इसके चंगुल से निकलने के लिये अदालत के चक्कर लगाता रहता है। यह विडंबना ही है कि शीर्ष अदालत की संविधान पीठ की 58 साल पुरानी पुख्ता व्यवस्था के बावजूद आज भी सरकार और उसके नीति निर्धारक नेताओं की कार्यशैली से असहमति व्यक्त करने वाले नागरिकों के खिलाफ किसी न किसी आधार पर राजद्रोह के आरोप में केन्द्र या राज्य सरकारों की ओर से ही दायर होते रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि शीर्ष अदालत ने पहली बार यह व्यवस्था दी है कि सरकार की नीतियों से असहमति व्यक्त करने या इसके खिलाफ आवाज उठाना राजद्रोह के दायरे में नहीं आता बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक अभिन्न हिस्सा है।

इससे पहले भी अनेक मामलों में न्यायालय इस तरह की राय व्यक्त कर चुका है। लेकिन ऐसा लगता है कि कार्यपालिका और नौकरशाही पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। पिछले एक दशक में देश में नागरिकों के खिलाफ राजद्रोह के कम से कम 798 मामले दर्ज हुए। इनमें से 2010 से 2014 के बीच मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के कार्यकाल में राजद्रोह के 279 और इसके बाद नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के शासन में 2014 से 2020 के दौरान 519 ऐसे मामले दर्ज हुए। इसके अलावा, राज्यों में भी इस तरह के मामले दर्ज होते रहे हैं। हाल ही में आंध्र प्रदेश की जगनमोहन रेड्डी सरकार ने ही दो समाचार चैनलों के खिलाफ अपने ही एक सांसद के आलोचनात्मक बयान प्रसारित करने के मसले पर राजद्रोह के मामले दर्ज किये, जिन पर उच्चतम न्यायालय ने रोक लगायी है।

अब सवाल उठता है कि क्या संविधान पीठ की व्यवस्था के तहत अगर प्रत्येक पत्रकार को धारा 124-ए और धारा 505 के तहत संरक्षण प्राप्त होगा तो फिर पत्रकारों के मामले में इन प्रावधानों का दुरुपयोग रोकने के लिये पुलिस और प्रशासनिक प्राधिकारियों पर दंड की व्यवस्था करना उचित नहीं होगा। इन कानूनों का दुरुपयोग रोकने के लिये पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को जागरूक बनाना भी जरूरी है। दंड के स्वरूप का निर्धारण न्यायालय और सरकार कर सकती है ताकि भविष्य में किसी पत्रकार को अनावश्यक रूप से राजद्रोह के अपराध का आरोपी नहीं बनाया जा सके।

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