प्रशासनिक तंत्र के राजनीतिकरण से उपजी विसंगतियां

प्रशासनिक तंत्र के राजनीतिकरण से उपजी विसंगतियां

एन.एन. वोहरा

एन.एन. वोहरा

जहां संविधान के लिए विधायिका और न्यायपालिका महत्वपूर्ण अंग होते हैं वहीं कार्यपालिका शायद सबसे जरूरी स्तंभ है क्योंकि देश की 135 करोड़ की विशाल आबादी को अपनी जीवनचर्या में उपस्थित किसी समस्या या स्थिति के निदान हेतु किसी न किसी सरकारी विभाग में जाना ही पड़ता है। कार्यपालिका में जनता के चुने हुए नुमाइंदे जैसे कि राजनीतिक कार्यकारी और नामांकित अथवा स्थाई सरकारी नौकर होते हैं। पिछले कुछ सालों से कार्यपालिका की कारगुजारी अधोगति की ओर है, लगातार खराब होती जा रही स्थिति के लिए उत्तरदायी अवयव जिनकी वजह से देश निर्माण के ध्येय समयानुसार पाने में देर होती है, इनमें शायद सबसे ज्यादा नुकसानदायक है  हेराफेरी की राजनीति, प्रशासनिक ढांचे का राजनीतिकरण, सरकारी तंत्र के कामकाज में दखलअंदाजी, बेलगाम भ्रष्टाचार और जवाबदेही तय न होना।

निरंकुश भ्रष्टाचार एवं गैरकानूनी आचरण के घुन ने सरकारी तंत्र की दक्षता और साख को अंदर तक खोखला कर दिया है। अफसोसनाक यह है कि नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े आम कामों को देखने के लिए जिन विभागों और एजेंसियों को काम सौंपा गया है, वह ज्यादातर योग्यता पर न होकर जाति-पाति या राजनीतिक आकाओं से नजदीकी के समीकरण को ध्यान में रखकर आवंटित किए जाते हैं। महत्वपूर्ण लोक सेवाएं सही ढंग से न दे पाने के चलते जनता के अंदर खासा अंसतोष व्याप्त होता है।

न्यायोचित प्रशासन और संवैधानिक तरीके से राजकाज चलाने के लिए जवाबदेही एक नींव का काम करती है। सरकारी मशीनरी का कामकाज तभी दक्षतापूर्ण बनता है जब हरेक मंत्री और उसके अंतर्गत आने वाले विभागों में कार्यरत तमाम अधिकारी-कर्मियों की जवाबदेही तय हो। हालांकि कुछेक प्रतिशत को छोड़कर चुनकर आए ज्यादातर ऐसे लोग मंत्री बन जाते हैं, जिन्हें नीति-निर्धारण और इसका क्रियान्वयन तो दूर की बात, प्रशासन चलाने में पहले कोई अनुभव नहीं होता। तिस पर अफसोसनाक यह कि ऐसे लोगों में ज्यादातर को काम कर दिखाने की ललक नहीं है, शायद उनमें इतनी काबिलियत भी नहीं है कि अपने नीचे आते विभागों का कामकाज क्या है, इसको ही पूरी तरह जान सकें और उनकी कार्यशैली में क्या कमियां हैं, इसकी शिनाख्त कर पाएं, जिनका हल निकाला जाना बहुत जरूरी होता है। न तो उनको सही निर्णय लेने का इल्म होता है और न ही तय किए गए ध्येयों को समयानुसार पूरा करवाने को सुनिश्चित करना। इसकी बजाय होता यह है कि पहले दिन से ही मंत्री महोदय अपनी सत्ता मनमाने ढंग से चलाने के आदी हो जाते हैं और अपने उन चहेतों की नियुक्तियां एवं तबादले करने जैसे स्वार्थपूर्ण कामों पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं जो आगे उनके लिए पैसा उगाहें और दिए गए गैरकानूनी निर्देशों को आंख मूंदकर लागू करें। इससे भी खराब यह है कि ऐसे मंत्री मातहत अफसरों पर दबाव या प्रभाव बनाते हैं ताकि विकास कार्यों के ठेके, विभागीय खरीदारी या पैसे के लेनदेन से संबंधित मामलों का काम उन लोगों को आवंटित किया जाए, जिन्हें मंत्री नवाजना चाहता है, भले ही इसके लिए नियम-कानून ताक पर क्यों न रखने पड़ें। इस किस्म का अनैतिक और नियम तोड़ने वाला काम न केवल कामकाज में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है और सरकारी मशीनरी के सुचारु काम को असफल बनाता है बल्कि अनुशासन और लोक-सेवाएं सही ढंग से देने में जवाबदेही का भी ह्रास कर देता है।

सरकारी तंत्र का राजनीतिकरण कर दिए जाने की वजह से विभिन्न विभागों में कार्यरत अधिकारियों में कुछ प्रतिशत भाग किसी दल विशेष के पाले में चला जाता है और अपनी वफादारी चुनकर आए किंतु ताकतवर नेताओं के प्रति बेहिचक दिखाने लगता है। ईमानदार अधिकारियों में कइयों को अनेकानेक उपायों से दरकिनार कर दिया जाता है तो किसी की कार्यकारी शक्ति को राजनेताओं की शह प्राप्त ‘आपराधिक गठजोड़’ से धमकियां दिलवा कर काफी क्षीण बना दिया जाता है, उल्टे ये तत्व अफसरों को निर्देश देने लगते हैं कि अमुक महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय क्या लेना है।

देश में विभिन्न लोकसेवा प्रदाता विभागों में अनेकानेक काडरों से संबंधित नियुक्त अधिकारियों के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए मौजूदा दंड विधान एवं अपील तंत्र इतना धारदार नहीं है कि बेईमान अधिकारियों में सहम पैदा कर सके। सरकारी कर्मियों के भ्रष्टाचार से निपटने को एक त्वरित और कदाचित अधिक दंडात्मक रवैया अपनाने की जरूरत है। हालांकि लोकसेवा विभागों में काम करने वाले अपने तौर तरीके भी बदलेंगे जब राजनीतिक कार्यकारी भी अपना कामकाज कानून अनुसार करने लगेंगे और प्रत्येक मंत्री अपने मातहत तमाम विभागों और संस्थानों में तय किए ध्येयों को समयानुसार पूरा करवाने हेतु माकूल जवाबदेही और जिम्मेवारी वाली व्यवस्था लागू करे।

सरकारी तंत्र का कामकाज सुधारने के लिए यह जरूरी है कि ऐसा माहौल बने, जिसमें लोकसेवा विभाग के सभी कर्मी निडर होकर काम कर सकें, अपना फर्ज दक्षतापूर्वक निभाएं और अपनी कार्यकुशलता एवं ईमानदारी के बल पर नौकरी में तरक्की पा सकें।

उक्त ध्येयों की पूर्ति के लिए निम्न उपाय करने से फायदा हो सकता है : सभी सेवाओं में उच्चस्तरीय निर्णय लेने वाले-चाहे वे आम विषय से संबंधित अफसरान हों या विशेषज्ञ, साइंसदान हों या तकनीकी माहिर अथवा सैन्य नेतृत्व या फिर वे सभी जो काबीना मंत्रियों के साथ काम करते हैं – इन सबको बिना राजनीतिक दखलअंदाजी के पूरी आजादी से अपना काम करने की इजाजत हो, कहीं से आने वाला दबाव या डर से पैदा की बाध्यता न हो। एक ठोस और उद्देश्यपूर्ण सलाह देने के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि जन सरोकारों से जुड़े विभागों के उच्चपदस्थ कर्मी अपने काम को अंजाम देते वक्त खुद को राजनीतिक रंगत से दूर रखें।

आज हमारे सामने बहुत सारी गंभीर समस्याएं मुंह बाये खड़ी हैं, मसलन, चिंतित करती आंतरिक सुरक्षा स्थिति, भ्रष्टाचार-कुप्रबंधन-गैर जवाबदेही से पैदा हुई कार्यप्रणाली इत्यादि। अतएव यह जरूरी हो जाता है कि कार्यपालिका संवैधानिक तरीके से अपना काम कर पाए और यह सुनिश्चित करे कि लोककल्याण कार्यक्रमों का क्रियान्वयन दक्षतापूर्वक किया जाए ताकि गरीबी से ग्रस्त परिवारों का जीवन स्तर ऊपर उठ सके, यह भी सुनिश्चित हो कि जनजातीय और अन्य समुदाय, जो दूरदराज क्षेत्रों में रहते हैं, इन पर विशेष ध्यान देते हुए समस्याओं का निदान सावधानी और संवेदनशीलता से किया जाए।

नक्सलवाद, जिसे एक समय केंद्रीय गृहमंत्री ने भारत गणराज्य को पेश सबसे बड़ा खतरा बताया था, उसकी पैदाइश और जड़ें पकड़ना देश के कई राज्यों के उन हिस्सों में संभव हो पाया था जहां जनजातीय और अन्य स्थानीय समुदायों को लंबे समय तक हाशिए पर और आर्थिक प्रगति से दूर रखा गया था। स्रोतों तक उनकी पहुंच न होने देने, यहां तक कि जिस जंगल में वे रहते हैं, उसी में पैदा होने वाले नैसर्गिक उत्पादों से महरूम कर देने के चलते वे लोग रोषस्वरूप स्थापित राज्य व्यवस्था के खिलाफ बागी हो गए थे।

अपने घर को सुव्यवस्थित करने में हमारे पास गंवाने को और ज्यादा समय बाकी नहीं है। दबे-कुचले और गरीबी से त्रस्त हमारे लाखों-लाख लोग अपनी समस्याओं का हल पाने के लिए अंतहीन समय तक इंतजार नहीं कर सकते। गुस्सा और असहाय होने की भावना उन्हें सत्ता के खिलाफ प्रतिकार करने की राह पर धकेल सकती है। इस तरह बनी स्थिति से जो दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम पैदा हो सकता है, संभवतः उसे केवल बल प्रयोग से काबू न किया जा सके–जबकि यह वही रवैया है, जिसे दशकों तक हम असफलतापूर्वक आजमाते आए हैं।

लेखक जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल हैं। उपरोक्त लेख शताब्दी वर्ष में 9 सितंबर को आयोजित सर सैयद यादगारी व्याख्यान में दिए गए ऑनलाइन संबोधन के अंशों पर आधारित है।

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