अदावत को दोस्ती में बदलने की कूटनीतिक पहल
विश्लेषकों ने माना है, कि एस. जयशंकर को ढाका भेजने का फैसला कूटनीतिक परिपक्वता का परिचायक है। एस. जयशंकर ढाका जितने समय थे, उन्होंने मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस से मिलने की ज़हमत नहीं उठाई। जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान ने...
विश्लेषकों ने माना है, कि एस. जयशंकर को ढाका भेजने का फैसला कूटनीतिक परिपक्वता का परिचायक है। एस. जयशंकर ढाका जितने समय थे, उन्होंने मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस से मिलने की ज़हमत नहीं उठाई।
जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान ने भारतीय राजनयिकों के साथ मुलाक़ात की बात मानी है। यह ख़बर जंगल में आग की तरह फैली है। बांग्लादेश स्थित जमात-ए-इस्लामी को भरोसे में लेने की ज़रूरत और भारतीय विदेशमंत्री एस. जयशंकर का पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया के जनाजे में शामिल होना, ये दो घटनायें सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस को असहज किये हुए है। मोहम्मद यूनुस चुनाव तक बांग्लादेश में बतौर ‘गेस्ट आर्टिस्ट’ हैं, बाद के दिनों में वो राष्ट्रपति बनेंगे, या मार्गदर्शक मंडल में शामिल होंगे? यह सवाल अधर में लटका पड़ा है। रॉयटर्स के साथ एक इंटरव्यू में, जमात अमीर ने कहा कि जब मैं बीमार था, जैसे दूसरे देशों के राजनयिक मुझसे मिलने आए, वैसे ही दो भारतीय राजनयिक भी कुशल-क्षेम के वास्ते मेरे घर आए थे। मैंने उनसे वैसे ही बात की, जैसे दूसरों से की थी।
जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान ने कहा, ‘भारतीय राजनयिकों ने अनुरोध किया कि इस दौरे को सार्वजनिक न किया जाए। आगे भी दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय हितों से जुड़ी भविष्य की कोई भी बैठक की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी।’ जमात प्रमुख शफीकुर रहमान ने पुष्टि की, कि मैंने अपनी बाईपास सर्जरी के बाद सितम्बर, 2025 की शुरुआत में एक भारतीय राजनयिक से मुलाकात की थी। अब सवाल यह है, कि क्या जमात लीडरशिप बीएनपी नेताओं के सम्बन्ध भारत के साथ सॉफ्ट करने में कोई भूमिका निभा रही है? यह भी एक क़िस्म की ‘पोलिटिकल बाईपास सर्जरी’ है, जिससे मुहम्मद यूनुस के रणनीतिकार अनजान थे।
जमात ने आखिरी बार 2001 और 2006 के बीच बीएनपी के साथ एक जूनियर गठबंधन सहयोगी के रूप में सत्ता संभाली थी, और वह फिर से उसके साथ काम करने के लिए तैयार है। बाहर से यही दिख रहा था कि भारत विरोधी माहौल बनाने में जमात पाकिस्तान के इशारों पर यह सबकुछ कर रहा था, लेकिन अब वो क्यास कथा पलटती दिख रही है। बांग्लादेश में हिन्दू विरोधी माहौल से देश, और देश से बाहर किस-किस को फायदा मिलता है? इस बारे में डिप्लोमेट तो खुलकर बोलेंगे नहीं, लेकिन यह विश्लेषण का विषय है। बुधवार को, जिस तरह का हुजूम बेग़म ख़ालिदा ज़िया के जनाजे में दिखा, वो इस बात का संकेत है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) एक बार फिर सियासी पारी खेल सकती है। सबका यही अनुमान था कि चुनाव तक बांग्लादेश में जो पार्टियां मैदान में हैं, वो हिन्दुओं को निशाने पर लेते हुए, भारत विरोधी विष वमन करेंगी। लेकिन, किसी ने सोचा नहीं था कि इस बीच बीएनपी की सर्वोच्च नेता ख़ालिदा जिया को सिपुर्द-ए-खाक़ करने की सूरत बन आएगी, और भारतीय विदेशमंत्री शोक और दोस्ती का पैगाम लेकर ढाका जायेंगे।
विश्लेषकों ने माना है, कि एस. जयशंकर को ढाका भेजने का फैसला कूटनीतिक परिपक्वता का परिचायक है। एस. जयशंकर ढाका जितने समय थे, उन्होंने मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस से मिलने की ज़हमत नहीं उठाई। इससे साफ़ संदेश जा रहा था, कि भारत सरकार की दिलचस्पी देश के अस्थायी व्यस्थापक में कतई नहीं है।
पीएम मोदी अदावत को दोस्ती में बदलने की कला में माहिर राजनेता हैं। उसका एक और उदाहरण बुधवार को देखने को मिल गया। जून, 2015 में बांग्लादेश यात्रा के दौरान, मोदी ने खालिदा ज़िया से मुलाकात की, जो उस समय विपक्ष की नेता थीं। दोनों पक्षों ने बातचीत को सकारात्मक बताया, मोदी ने बाद में इसे एक ‘गर्मजोशी भरी मुलाकात’ के रूप में याद किया। उसी मुलाक़ात का हवाला मोदी के पत्र में था, जो उनके बेटे और बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान को अपने विदेशमंत्री के माध्यम से भेजा था।
बांग्लादेश से भारत के सम्बन्ध उतार-चढ़ाव वाले ही रहे हैं। सैन्य शासन के पंद्रह साल की अवधि के दौरान, भारत और बांग्लादेश ने एक-दूसरे को बड़े पैमाने पर सुरक्षा अनिश्चितता की दृष्टि से देखना शुरू किया था। दोनों देशों ने एक-दूसरे के क्षेत्र में विद्रोहियों को गुप्त समर्थन दिया। नई दिल्ली ने बांग्लादेश के चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में शांति वाहिनी का समर्थन किया। इस बीच, ढाका ने भारत के उत्तर-पूर्व में विद्रोहियों को हथियारों की खेप पहुंचाने में मदद की, और उन्हें बांग्लादेशी धरती पर शिविर स्थापित करने की अनुमति दी।
ज़िया की बीएनपी सरकार को भी भारत विरोधी ही माना जाता था। उनके कार्यकाल में पाकिस्तान और चीन के साथ रक्षा सौदों को बढ़ावा दिया गया, जो भारत के लिए चिंता का विषय था। उन्होंने भारतीय ट्रकों के लिए बांग्लादेश से होकर जाने वाले ट्रांजिट को ‘गुलामी’ बताया और पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंचने के लिए भारत को ट्रांजिट अधिकार देने से इनकार कर दिया। खालिदा जिया पर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के उग्रवादी समूहों को पनाह देने, और आईएसआई के साथ सांठगांठ के आरोप लगे। बेग़म ज़िया ने 1972 की भारत-बांग्लादेश मैत्री संधि और 1996 की गंगा जल संधि को ‘गुलामी की संधि’ और ‘गुलामी का सौदा’ करार दिया था।
सबके बावजूद, शेख हसीना से दोस्ती के पुराने दिन याद करने का कोई मतलब नहीं रह गया। अब वो नई दिल्ली के लिए गले की हड्डी बन चुकी हैं। इस बार अवामी लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। अर्थात, बांग्लादेश में भारत के लिए अवामी लीग के रूप में कोई विकल्प नहीं है। ऐसे में बांग्लादेश की राजनीति में जो विकल्प दिखते हैं, उन्हीं के साथ भारत को संबंध दुरुस्त करने होंगे। डिप्लोमेटिक सूत्र इस बात की पुष्टि करते हैं, कि भारतीय राजनयिकों ने लंदन प्रवास के दौरान बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता तारिक रहमान के साथ अनौपचारिक संपर्क बना रखा था। इसलिए एस. जयशंकर का ढाका जाना, आपदा में अवसर जैसा ही था।
बीएनपी नेता तारिक़ रहमान के लन्दन से लौटने के बाद, जितनी तेज़ रफ्तार से सियासी मौसम में बदलाव आया है, उससे मुहम्मद यूनुस की सरपरस्ती वाले छात्र नेता असमंजस में हैं। छात्र नेता नाहिद इस्लाम ने 28 फरवरी, 2025 को नेशनल सिटीजन पार्टी की स्थापना की थी। नाहिद की नेशनल सिटीजन पार्टी सत्ता में आने के सपने देखने लगी थी। संभवतः इनके लिए ही मुहम्मद यूनुस ने दिसंबर के बदले दो माह आगे चुनाव टाल दिया था। कहने को जमात से जुड़ा ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ के नेता अबू शादिक ‘कायेम’ और बीएनपी के छात्र नेता रकिबुल इस्लाम राकिब भी आंदोलन में परिचित चेहरे थे। एक और छात्र संगठन ‘इंकलाब मंच’ के सह-संस्थापक शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद, बीएनपी ने इनके घावों पर मरहम लगाना शुरू किया है। ऐसे में लगता नहीं कि छात्र नेता किसी लीड रोल में नमूदार होंगे।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

