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आपराधिक मामलों के निपटान में देरी अन्याय जैसा

भारत में आपराधिक मामलों के निर्णय में देरी न्याय प्रणाली में अन्तर्निहित है। यह देरी न्याय से वंचित करने के समान ही है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकान्त द्वारा लम्बित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने का...

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भारत में आपराधिक मामलों के निर्णय में देरी न्याय प्रणाली में अन्तर्निहित है। यह देरी न्याय से वंचित करने के समान ही है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकान्त द्वारा लम्बित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने का एजेंडा तय करना प्रशंसनीय पहल है। इसके लिए बहु-आयामी रणनीति की जरूरत है।

एक दिवंगत रेलवे टीटीई को 50 रुपये की रिश्वतखोरी के आरोप से मुक्त होने में 40 साल लग गए, जिसके कारण अपने जीवन-काल में उन्हें सरकारी नौकरी, सम्मान और मानसिक श्ाांति खोने का दंश झेलना पड़़ा था। मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन में तैनात लिपिक, जागेश्वर प्रसाद अवधिया को 100 रुपये रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तारी के 39 वर्ष बाद सर्वोच्च न्यायालय ने दोषमुक्त कर दिया। वर्ष 2005 और 2006 के सबसे चौंकाने वाले निठारी सीरियल किलिंग मामलों में नवम्बर, 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने सुरेन्द्र कोली और पंढेर को भी दोषमुक्त कर दिया है। वस्तुुतः भारत में आपराधिक मामलों के निर्णय में देरी आपराधिक न्याय प्रणाली में अन्तर्निहित है, जिसके परिणाम स्वरूप गिरफ्तार किए गए सभी लोगों में से 46 प्रतिशत से अधिक को विचाराधीन कैदियों के रूप में विभिन्न अवधियों के लिए जेलों में सजायाफ्ता दोषियों की तरह कष्ट सहने को मजबूर होना पड़ रहा है। इस पृष्ठभूमि में, भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकान्त द्वारा लम्बित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने का एजेंडा तय करना प्रशंसनीय पहल है।

29 अक्तूबर, 2025 को भी आरोप निर्धारण में अत्यधिक देरी पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गम्भीर चिन्ता व्यक्त की गई थी और इस समस्या के समाधान के लिए समुचित दिशा-निर्देश निर्धारित करने हेतु भारत के महान्यायवादी और सॉलिसिटर जनरल से सहयोग मांगा था। आपराधिक मामलों के निपटान में देरी महज आकस्मिक नहीं, जिसे दिशा-निर्देश बनाकर रोका जा सके, वास्तव में यह उभरती दरपेेश परिस्थितियों से निपटने में संस्थागत विफलता का मामला है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के प्रकाशन ‘भारत में अपराध-2023’ के अनुसार, पिछले वर्ष के लम्बित 2,45,84,673 मामलों में इस वर्ष 8,25,681 और आपराधिक मामलों की बढ़ोतरी हुई, जिसके परिणाम स्वरूप वर्ष 2023 के अन्त तक देश में कुल 2,54,10,354 आपराधिक मामले निचली अदालतों में लम्बित हो गए। इस वर्ष न्यायालयों द्वारा 40,95,080 आपराधिक मामलों का ही निपटान सम्भव हो सका जबकि इस दौरान 49,20,771 नए मामले निर्णय के लिए अदालतों में प्राप्त हुए। इस प्रकार लम्बित मामलों की संख्या में प्रतिवर्ष औसतन 16 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। लम्बित आपराधिक मुकदमों के पीछे के कारणों को समझने के लिए गहन विश्लेषण और श्ाोध की आवश्यकता है। इस बढ़ते रुझान को रोकने और लम्बित मामलों की संख्या को कम करने के लिए एक बहु-आयामी रणनीति अपनाने की जरूरत है। इस रणनीति में निम्नलिखित आयाम श्ाामिल किए जा सकते हैं :

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पहला, इस मिथक को तोड़ने की आवश्यकता है कि एक पुलिस थाना क्षेत्र के मुकदमों की सुनवाई के लिए एक ही ट्रायल कोर्ट हो सकता है। लम्बित मुकदमों की संख्या के आधार पर एक थाना क्षेत्र में एक से अधिक मजिस्ट्रेट नियुक्त किए जाने चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि प्रत्येक ट्रायल कोर्ट में ढांचागत सुविधाओं के साथ-साथ कम से कम तीन स्टेनोग्राफर और दो लोक अभियोजकों की तैनाती का प्रावधान हो। जब तक नियमित पीठासीन अधिकारियों, अभियोजकों, सचिवीय कर्मचारियों की भर्ती नहीं हो जाती और अदालत कक्ष नहीं बन जाते, तब तक जिला जज को अदालतों के लिए भवन किराए पर लेने के लिए और अस्थायी अदालतों के संचालन हेतु सेवानिवृत्त अधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त करने का अधिकार दिया जा सकता है।

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दूसरा, कई राज्यों और केन्द्रश्ाासित प्रदेशों में एक ही न्यायाधीश आपराधिक और सिविल दोनों क्षेत्राधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं। यदि क्षेत्राधिकार विभाजित कर दिया जाए और विभिन्न प्रकृति के मामलों से निपटने के लिए अलग-अलग मजिस्ट्रेट/सिविल जज नियुक्त कर दिए जाएं तो इससे मुकदमों का श्ाीघ्र निपटान सम्भव होगा। कुछ राज्यों में यह प्रथा लागू भी है।

तीसरा, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 359 में संशोधन करके ‘समझौता योग्य मामलोंं’ की सूची में विस्तार किया जा सकता है औरं 3 वर्ष तक के कारावास या जुर्माने या दोनों से दण्डनीय सभी अपराधों को समझौता योग्य अपराध घोषित करके उनका ‘शीघ्र निपटान’ सुनिश्चित किया जा सकता है। भारत में अपराध, 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में केवल 3,03,802 छोटे आपराधिक मामलों में ही पक्षकारों द्वारा समझौता किया गया जो कुल पंजीकृत मामलों का लगभग एक प्रतिशत है।

चौथा, बीएनएसएस में प्रावधान है कि महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराध और सामाजिक-आर्थिक अपराधों संबंधी मामलों को छोड़कर बाकी सभी अपराधों में जहां 7 वर्ष तक की सज़ा का प्रावधान है, पक्षकार आपसी सहमति से मुकदमों का निपटारा कर सकते हैं जिसे ‘प्ली-बार्गेनिंग’ की संज्ञा दी गई है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 में केवल 42,318 मामलों का ही प्ली-बार्गेनिंग के माध्यम से निपटान किया जा सका था। इस प्रावधान में कुछ कमियां हैं। प्ली-बार्गेनिंग के सम्बन्धित प्रावधानों में संशोधन करके प्ली-बार्गेनिंग करने वाले अपराधी के सिर से अपराधी का टैग हटाया जा सकता है। अमेरिका में पहले से ही ही ऐसा प्रावधान है। इसके अलावा, पक्षकारों को यह भी छूट हो कि आपराधिक कार्यवाही के प्रत्येक चरण में वे प्ली-बार्गेनिंग की प्रक्रिया अपनपाकर अपने मुकदमों का फैसला करवा सकें।

पांचवां, आपराधिक मामलों की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने को बीएनएसएस में कई प्रावधान श्ाामिल किए गए हैं, जिनमें समयबद्ध आरोप तय करना, अदालत में गवाही के लिए विशेषज्ञों को बुलाने की गुंंजाइश सीमित करना, पोर्टल पर समयबद्ध तरीके से फैसले अपलोड करना, मुकदमों से पहले केस सम्पत्तियों का निपटान, रिमांड और साक्ष्य दर्ज करने को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा का प्रयोग और 3 वर्ष तक की कैद की सज़ा वाले अपराधों के लिए ‘सम्मरी ट्रायल’ द्वारा सुनवाई का दायरा बढ़ाना श्ाामिल है। इन कानूनी प्रावधानों का सही तरीके से प्रयोग सुनिश्चित करने और उनकी निगरानी के लिए एक तंत्र स्थापित करने की जरूरत है।

छठा, पर्याप्त संख्या में अभियोजकों, आशुलिपिकों और लिपिकों के न होने और अदालतों के काम के बोझ में दबे होने के कारण अनेक बार अदालतों में बुलाए गए गवाहों से दिन के समाप्त हो जाने तक पूछताछ नहीं हो पाती है। इस स्थिति में सुधार किया जा सकता है। सातवां, रिक्तियों की पूर्ति हेतु न्यायाधीशों, अभियोजकों और अदालती कर्मचारियों की वार्षिक आधार पर नियमित भर्तियां की जानी चाहिए और सम्बन्धित हाईकोर्ट इस सम्बन्ध में हुई प्रगति की निगरानी कर सकते हैं।

आठवां, सुप्रीम कोर्ट में लगभग 18 हजार से अधिक और हाईकोर्टों में 63 हजार से अधिक आपराधिक मामले लम्बित हैं। इन अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने और मौजूदा रिक्तियों को भरने के अलावा इन लम्बित मामलों को कम करने का अन्य कोई उपाय प्रतीत नहीं होता है।

ब्रिटिश राजनेता विलियम इवार्ट ग्लैडस्टोन ने कहा था ‘न्याय में देरी न्याय से इंकार करने के समान है।’ एक कल्याणकारी राज्य अपने लोगों को समय पर न्याय से वंचित नहीं कर सकता, वरना विकास प्रक्रिया अराजकता का शिकार हो जाएगी। सरकारों को सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देशों को गम्भीरता से लेकर न्याय देने में हो रही देरी को रोकने के अभियान में स्वेच्छा से भागीदार बनना चाहिए।

लेखक हरियाणा के पुलिस महानिदेशक रहे हैं।

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