आर्थिक सलाकार परिषद ने जनसंख्या नियंत्रण से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं को बंद करने और चीन की जनसंख्या नीति से सबक लेने की भी सिफारिश की है। हालिया ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6’ के आंकड़े भी निम्न प्रजनन दर की स्थिति की ओर संकेत करते हैं।
हाल ही में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) ने ‘द घोस्ट ऑफ पॉपुलेशन पास्ट : हाउ पॉपुलेशन कंट्रोल परसिस्ट्स इन इंडिया’ नामक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट बताती है कि भारत की कुल प्रजनन दर घटकर 1.9 रह गई है, जबकि आबादी को स्थिर रखने के लिए 2.1 की प्रजनन दर जरूरी मानी जाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार को छोड़ दें तो राष्ट्रीय प्रजनन दर 1.6 रह जाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश की बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति को देखते हुए अब जनसंख्या नियंत्रण को सरकारी नीति के मुख्य उद्देश्य के रूप में देखना प्रासंगिक नहीं है। साथ ही, परिवार नियोजन की नीतियों को स्वास्थ्य, बच्चों के बीच अंतर रखने और व्यक्ति की निजी पसंद के अनुरूप रखने की बात कही गई है। आर्थिक सलाहकार परिषद ने जनसंख्या नियंत्रण से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं को बंद करने और चीन की जनसंख्या नीति से सबक लेने की भी सिफारिश की। हालिया ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6’ के आंकड़े भी अलग-अलग राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में निम्न प्रजनन दर की स्थिति की ओर संकेत करते हैं।
अमूमन यह समझना सहज नहीं है कि आखिर यह प्रतिस्थापन स्तर (रिप्लेसमेंट लेवल) इतना महत्वपूर्ण क्यों है और मूल रूप से यह है क्या। इसके साथ ही स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न सहज उत्पन्न होगा कि 2.1 यानी एक महिला 2.1 बच्चे को कैसे जन्म दे सकती है? इसे समझने के लिए पहले प्रजनन दर और प्रतिस्थापन स्तर, दोनों को समझना होगा।
प्रजनन दर का सीधा अर्थ है कि एक महिला अपने प्रजनन काल में औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है। वहीं, प्रतिस्थापन स्तर वह स्थिति है, जिसमें एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी से संख्या के स्तर पर लगभग स्वयं को प्रतिस्थापित कर सके। सामान्यतः कम मृत्यु दर वाली आबादी में यह स्तर 2.1 बच्चे प्रति महिला माना जाता है। यानी 2.1 का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक महिला के 2.1 बच्चे हों, बल्कि यह पूरी आबादी में महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए बच्चों का औसत है।
यह स्तर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि प्रजनन दर लंबे समय तक इसके नीचे बनी रहती है तो आने वाली पीढ़ी का आकार धीरे-धीरे छोटा होने लगता है। इसका असर आगे चलकर आबादी की आयु संरचना तथा कार्यशील आबादी के आकार पर भी पड़ सकता है। ऐसे में जनसंख्या में एक संतुलन का होना महत्वपूर्ण हो जाता है।
हालांकि, इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि भारत की आबादी अब अचानक घटने लगेगी। कम प्रजनन दर का प्रभाव कुल आबादी में दिखाई देने में कई दशक लग सकते हैं, क्योंकि वर्तमान में बड़ी संख्या में युवा आबादी मौजूद है और जनसांख्यिकीय जड़त्व के कारण कुछ समय तक आबादी बढ़ती रह सकती है। लेकिन यदि प्रजनन दर लंबे समय तक इसी तरह प्रतिस्थापन स्तर (रिप्लेसमेंट लेवल) से नीचे बनी रहती है तो आगे चलकर आबादी के आकार के साथ-साथ उसकी आयु संरचना में भी बड़ा बदलाव आएगा।
एनएफएचएस-6 के हालिया आंकड़े इस बदलाव की गंभीरता को समझने का एक संकेत देते हैं। अंडमान-निकोबार में कुल प्रजनन दर 0.9 तक पहुंच गई है, जबकि दक्षिण भारत के कई राज्यों में भी यह प्रतिस्थापन स्तर से काफी नीचे है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो आने वाले समय में भारत के सामने केवल आबादी के आकार का नहीं, बल्कि वृद्ध होती आबादी, घटती कार्यशील आबादी और बदलती सामाजिक संरचना का प्रश्न भी खड़ा होगा। इसलिए यह ऐसा विषय है, जिस पर भविष्य की स्थिति का इंतजार करने के बजाय अभी से गंभीर विचार-विमर्श की आवश्यकता है।
आखिर प्रजनन दर में इस गिरावट के पीछे कारण क्या हैं? इसके कारणों को केवल जनसंख्या संबंधी आंकड़ों में तलाशना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे समाज में पिछले कुछ दशकों में आए उन बदलावों को समझना होगा, जिनका असर परिवार, विवाह, मातृत्व और बच्चों को लेकर हमारी सोच पर पड़ा है।
महिलाओं की शिक्षा इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू है। शिक्षा ने महिलाओं के सामने जीवन के विकल्पों का विस्तार किया है। उच्च शिक्षा, रोजगार और अपने भविष्य को लेकर निर्णय लेने की क्षमता ने महिलाओं के जीवन की प्राथमिकताओं को बदला है। विवाह और मां बनने का फैसला भी अब कई महिलाएं अपने जीवन की अन्य प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए लेने लगी हैं। लेकिन इसे केवल इस रूप में देखना उचित नहीं होगा कि महिलाओं के शिक्षित होने के कारण बच्चे कम हो गए। शिक्षा ने महिलाओं में अपने जीवन, करियर और भविष्य को लेकर आकांक्षाएं बढ़ाई हैं तथा परिवार और मातृत्व को लेकर निर्णय लेने की क्षमता को भी मजबूत किया है। साथ ही, बच्चों की संख्या के बजाय उनके पालन-पोषण, शिक्षा और बेहतर भविष्य को महत्व देने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है।
ऐसे में प्रश्न केवल यह नहीं है कि महिलाओं की प्राथमिकताएं क्यों बदलीं, बल्कि यह भी है कि क्या परिवार और समाज ने महिलाओं के जीवन में आए इन बदलावों के अनुरूप स्वयं को बदला है? यही प्रश्न घटती प्रजनन दर को समझने के लिए आगे की चर्चा का आधार बनता है।
लेकिन महिलाओं की शिक्षा, आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की क्षमता में आए इस बदलाव को उस सामाजिक संरचना से अलग करके नहीं देखा जा सकता, जिसमें परिवार और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी लंबे समय से मुख्यतः महिलाओं से जुड़ी रही है। जब महिलाओं के जीवन की प्राथमिकताएं बदलीं, तब यह सवाल भी सामने आया कि क्या परिवार और कार्यस्थल की व्यवस्था भी उसी गति से बदली? क्या महिलाओं को शिक्षा और रोजगार के साथ परिवार और मातृत्व की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए वैसी ही सामाजिक और संस्थागत सहायता मिली?
पितृसत्तात्मक व्यवस्था में यह असंतुलन कई समाजों में विवाह और मातृत्व को लेकर नई पीढ़ी के निर्णयों को प्रभावित करता दिखाई देता है। समाजशास्त्री पीटर मैकडोनाल्ड की ‘जेंडर इक्विटी थ्योरी’ इस विरोधाभास को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार देती है। जब महिलाओं को शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं, लेकिन परिवार के भीतर बच्चों की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों का बंटवारा उसी गति से नहीं बदलता, तब उनके सामने काम और परिवार के बीच एक नया तनाव पैदा होता है।
ऐसे में घटती प्रजनन दर को महिलाओं की बदलती आकांक्षाओं का परिणाम भर मानना अधूरा होगा; यह उस सामाजिक व्यवस्था का भी परिणाम हो सकती है, जो महिलाओं की नई भूमिका के साथ स्वयं को पूरी तरह बदल नहीं पाई। जनसंख्या को लेकर दुनिया की चिंता अब एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। ‘ऑन द कस्प : फ्रॉम पॉपुलेशन बूम टू बस्ट’ इस बदलाव को एक सवाल के सामने रखती है—‘फ्रॉम टू मेनी टू टू फ्यू?’ यानी बहुत अधिक से बहुत कम की ओर? यही सवाल भारत के लिए भी अब महत्वपूर्ण हो जाता है।
घटती प्रजनन दर के पीछे जिन सामाजिक बदलावों की भूमिका है, उन्हें समझना और उनके अनुरूप परिवार तथा सामाजिक व्यवस्था में बदलाव करना जरूरी है। बच्चों का जन्म और पालन-पोषण केवल महिलाओं की जिम्मेदारी मानने वाली सोच को बदलना होगा। वरना आने वाले समय में वृद्ध होती आबादी का एक बड़ा वर्ग हमारे सामने होगा, जिसकी जिम्मेदारी उठाने के लिए पर्याप्त कार्यशील आबादी नहीं होगी। यह स्थिति किसी भी देश के लिए बेहतर नहीं होगी।
लेखिका समाजशास्त्री एवं स्तंभकार हैं।

