शब्दों में शालीनता और मर्यादा जरूरी

शब्दों में शालीनता और मर्यादा जरूरी

विश्वनाथ सचदेव

विश्वनाथ सचदेव

बांग्ला भाषा का बड़ा प्यारा-सा शब्द है-दीदी। दीदी बड़ी बहन या बहन को कहते हैं, और अब तो बांग्ला भाषा का यह शब्द सारे उत्तर भारत में प्रचलित है। पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों में ममता बनर्जी को अक्सर दीदी कहकर संबोधित किया जा रहा है। उनके समर्थक और विरोधी दोनों उन्हें दीदी कह रहे हैं। अच्छा लगना चाहिए यह देखकर कि राजनीतिक-विरोधी एक-दूसरे को इतने स्नेहसिक्त शब्द के माध्यम से संबोधित कर रहे हैं। लेकिन कुछ लोगों ने इस व्यवहार को ग़लत माना है। उन्हें लग रहा है कि राजनेता इस शब्द का ही नहीं, इस शब्द के माध्यम से एक राजनेता का भी अपमान कर रहे हैं।

सच पूछा जाये तो उन्हें इस संबोधन से नहीं, इस शब्द के बोले जाने के ढंग से आपत्ति है। पश्चिम बंगाल की चुनावी सभाओं में जिस तरह ‘दीदी, ओ दीदी...’ का उच्चारण हो रहा है, उस लहज़े से शिकायत है कुछ लोगों को। यह लहज़ा सम्मान जताने का तो नहीं ही लगता। लटके ले-लेकर जिस तरह सभाओं में इस शब्द के माध्यम से ममता बनर्जी को संबोधित किया जा रहा है,  उसमें उपहास की गंध कहीं ज्यादा है। आपत्ति इस बात को लेकर है।

और ग़लत नहीं है यह आपत्ति। राजनीतिक विरोधियों की आलोचना करना; उनकी कथित खामियों को गिनाना; उनकी कथित कमजोरियों का बखान करके उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करना सामान्य बात है, पर यदि ऐसा करने में सामान्य शिष्टाचार और उचित व्यवहार की अनदेखी होती है तो इसे लेकर चिंता होनी ही चाहिए। इसी औचित्य का तकाज़ा है कि हमारी संसद में और राज्यों की विधानसभाओं में ‘असंसदीय भाषा’ पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। सांसदों और विधायकों से अपेक्षा की जाती है कि वे सदन के भीतर घोषित आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल नहीं करेंगे-और यदि कोई माननीय सदस्य जानबूझकर या अनजाने में ऐसा करता है तो उस शब्द को, या उन शब्दों को सदन की कार्यवाही से निकाल दिया जाता है। यह एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है और दुनिया भर में जनतांत्रिक व्यवस्था वाले देशों में इसका पालन किया जाता है। सवाल उठता है जो शब्द संसद में बोलना अस्वीकार्य है, उन्हें सड़क पर बोलना स्वीकार्य क्यों होना चाहिए?

किसी भी सभ्य समाज में इस संदर्भ में कोई लिखित व्यवस्था आवश्यक नहीं होनी चाहिए। हर ज़िम्मेदार नागरिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी वाणी और व्यवहार पर अंकुश रखेगा।  यह बात हमारे नेताओं पर कहीं ज़्यादा लागू होती है। अपेक्षा की जाती है कि वे अपने व्यवहार से इस दिशा में उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। पर अक्सर वे ग़लत उदाहरण प्रस्तुत करते देखे जाते हैं।

यह दीदी वाला उदाहरण ही लें। बंगाल में सड़क किनारे बैठकर आती-जाती युवतियों पर,  छींटाकशी करने वालों को अक्सर ‘दीदी, ऐ दीदी’ कहते सुना जाता है। सांसद महुआ मोइत्रा के अनुसार ऐसे लोगों को ‘रोक-अर-छेले’ कहा जाता है और उन्होंने हमारे कुछ नेताओं पर भी आरोप लगाया है कि वे चुनावी सभाओं में इसी तरह का व्यवहार कर रहे हैं।

सवाल चुनावी सभाओं में अपने प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने का नहीं है। जनतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह की जायज़ कोशिश करना कतई ग़लत नहीं है, पर इस कोशिश में शिष्टाचार और व्यवहार की सीमाओं का अतिक्रमण किसी भी दृष्टि से सही नहीं ठहराया जा सकता। दुर्भाग्य से, हमारे नेता, चाहे वे किसी भी रंग के झंडे वाले हों, अक्सर यह अतिक्रमण करते दिखते हैं। यह प्रवृत्ति चुनावी सभाओं में और ज़्यादा उभर कर सामने आती है। कभी जानबूझकर, और कभी अनजाने में, वे अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए ऐसे शब्दों और ऐसे लहज़े का उपयोग करते हैं, जिसे सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं किया जाना चाहिए। कुछ साल पहले एक चुनावी सभा में एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने अपने विरोधी के लिए ‘मौत का सौदागर’ विशेषण काम में लिया था। तब उस विरोधी नेता ने ‘जर्सी गाय’ कह कर अपने प्रतिद्वंद्वी को संबोधित किया था। ऐसा ही एक उदाहरण एक नेता ने ‘रामज़ादे और हरामज़ादे’ कह कर प्रस्तुत किया था। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। सवाल उठता है क्यों ज़रूरत पड़ती है किसी नेता को इस तरह के शब्दों की और इस तरह की लटकेबाजी की?

क्या-क्या नहीं कहते हमारे नेता एक-दूसरे को। एक नेता दूसरे पर ‘टोलाबाजी’, ‘कट मनी’ और ‘मिशी भाइपो’ का आरोप लगाता है तो जवाब में दूसरा अपने विरोधी को ‘दैत्य और दंगाबाज’ कह रहा है। इस तरह के उदाहरण सिर्फ बंगाल में ही नहीं दिख रहे। पिछले चुनावों में देश में कई जगह इस तरह के शब्द और वाक्य काम में लिये जाते रहे हैं। आज भी हमारे नेता एक-दूसरे पर बेबुनियाद आरोपों की झड़ी लगाते दिखते हैं। हमारे मंत्रियों तक को यह याद नहीं रहता कि सदन में किसी को झूठा कहना भी असंसदीय शब्द माना गया है! वहां भी यह अपेक्षा की जाती है कि माननीय सदस्य किसी को झूठा कहने के बजाय यह कहे कि ‘आप सच नहीं बोल रहे।’ सच न बोलने और झूठ बोलने में भले ही कोई अंतर न होता हो, पर शब्दों की मर्यादा और शालीनता तो साफ दिखती है। यह मर्यादा सड़क पर भी निभायी जानी चाहिए।

जब कोई नेता विशाल जनसभा में लटके ले-लेकर बोलता है तो तालियां ज़रूर बजती हैं, पर शब्दों की मर्यादा का उल्लंघन कोई अच्छा उदाहरण प्रस्तुत नहीं करता। जनतांत्रिक मूल्यों का तकाज़ा है कि हमारे नेता स्वस्थ उदाहरण प्रस्तुत करें। किसी को ‘पप्पू’ या ‘मंदबुद्धि’ कहना उसे छोटा नहीं बनाता, उल्टे कहने वाला स्वयं अपनी गरिमा खो रहा होता है। इसी तरह किसी को ‘फेंकू’ या ‘हवाबाज़’ घोषित कर देने से उसका कद छोटा नहीं हो जाता। आरोप लगाना ग़लत नहीं है, पर बेबुनियाद आरोप अपराध की श्रेणी में आते हैं।

किसी संदर्भ विशेष में राजनीतिक विरोधी का मज़ाक उड़ाना भी समझ में आ सकता है, पर इस बात का ध्यान रखा जाना ज़रूरी है कि किसी का मजाक उड़ाते-उड़ाते आप स्वयं मजाक न बन जाएं। पचहत्तर साल का हो रहा है हमारा जनतंत्र। यह उम्र हमसे एक परिपक्वता की अपेक्षा करती है। हमारी कथनी और करनी दोनों में यह परिपक्वता झलकनी चाहिए।  प्रतिद्वंद्वी का मज़ाक उड़ाकर नहीं,  उसकी सीमाओं को उजागर करके हम अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर सकते हैं। पता नहीं हमारे नेता कब यह समझेंगे कि दूसरे की खींची रेखा को छोटा सिद्ध करने के लिए उसे मिटाने की नहीं, उससे बड़ी रेखा खींचने की आवश्यकता होती है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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