स्वतंत्रता सेनानी होली के महीनों पूर्व ही गाजे-बाजे के साथ देशवासियों में स्वतंत्रता की चेतना जगाने वाले फगुए गाना और गुलाल व फूलों से होली खेलना शुरू कर देते थे। धुलेंडी के दिन महिलाएं और बच्चे खादी के वस्त्र पहनकर सुराजी गाने गाते थे।
वर्ष 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया तो विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के इस्तेमाल की उनकी अपील ने ऐसा रंग दिखाया था कि देशवासियों ने विदेशी कपड़ों तक की होली जला डाली थी। लेकिन उस दौर की होली का यह पूरा परिचय नहीं है। तब होली आती तो आज़ादी के दीवानों और उनकी राह में कांटे बिछाते रहने वाले अंग्रेजों के बीच नए सिरे से ठन जाती थी। कारण यह था कि आज़ादी के दीवाने प्रायः होली पर देशवासियों को राग-द्वेष भुलाकर एक करने, जगाने और लड़ने को प्रेरित करने की नई कवायदें शुरू करते थे, जो अंग्रेजों को कतई गवारा नहीं होती थीं।
1853 में झांसी की होली के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था, 21 नवम्बर, 1853 को उसके राजा गंगाधर राव नेवालकर के निःसंतान निधन के बाद अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी ने झांसी पर ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ का कहर बरपाने के लिए होली का ही दिन चुना था। इतिहासकारों के अनुसार, गंगाधर राव अपने रहते अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर गए थे। लेकिन उनके निधन के बाद डलहौजी ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
प्रसंगवश, डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीनस्थ भारतीय राज्यों व रियासतों को उसके साम्राज्य में मिलाने की ऐसी ‘हड़प नीति’ थी, जिसके तहत कोई राजा निःसंतान रहते दुनिया को अलविदा कह जाता तो राज्य को कंपनी के साम्राज्य में मिला लिया जाता था।
झांसी को हड़पने के लिए डलहौजी ने इसी नीति के तहत 7 मार्च, 1854 को एक फरमान निकाला और इरादतन होली के दिन ही झांसी भेजा। फरमान के साथ एक इश्तिहार भी था, जिसमें लिखा था कि अब कंपनी की ओर से झांसी का शासन मेजर एलिस चलाएंगे।
इस रंग में भंग के बाद झांसीवासी भला होली कैसे मनाते? रानी लक्ष्मीबाई ने भी होली के सारे समारोह रद्द कर दिए और महल में जाकर भविष्य पर छाए काले बादलों से निपटने की योजनाएं बनाने में व्यस्त हो गईं। तब से डेढ़ से ज्यादा शताब्दी बीत गईं, लेकिन झांसी के लोग उस फरमान के आने, रानी द्वारा उसे अंगूठा दिखाने और इससे क्रुद्ध अंग्रेजों के विकट हमले के दौरान झांसी को बचाते हुए वीरगति प्राप्त करने की याद में होली के दिन होली नहीं मनाते।
काश! लाहौरवासी भी झांसी वालों की तरह उन छह बब्बर अकाली आंदोलनकारियों की शहादत को याद रखते और उनका शोक मनाते, 1926 में जिन्हें अंग्रेजों ने लाहौर सेंट्रल जेल में होली के दिन ही फांसी दे दी थी। उस साल होली 27 फरवरी को थी और उस दिन फांसी पर लटकाए गए इन आंदोलनकारियों के नाम थे—किशन सिंह गड़गज्ज, संता सिंह, दिलीप सिंह, नंद सिंह, करम सिंह और धरम सिंह।
तब भगत सिंह ‘क्रांतिकारियों का शहर’ कहलाने वाले कानपुर में रहकर आज़ादी की लड़ाई में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी के लोकप्रिय पत्र ‘प्रताप’ में काम कर रहे थे। उन्होंने ‘एक पंजाबी युवक’ के नाम से 15 मार्च, 1926 के ‘प्रताप’ में लेख लिखकर इस बात पर रोष और क्षोभ जताया था कि इस छह वीरों के बलिदानों को लेकर लाहौर शोक में नहीं डूबा और होली मनाता रहा।
इसी ‘प्रताप’ के शहर कानपुर में 1942 में होली के दिन हटिया बाजार के रज्जन बाबू पार्क में जमा क्रांतिकारी तिरंगे झंडे को खूब ऊंचा फहराकर होली खेल रहे थे, तो अंग्रेजों के दर्जन भर घुड़सवार सिपाही सरपट घोड़े दौड़ाते आए और तिरंगा उतारने लगे। दोनों पक्षों में भीषण संघर्ष छिड़ गया। अंततः सिपाही भारी पड़े और अंग्रेज अफसरों ने और पुलिस बल बुलाकर 45 क्रांतिकारियों को क्रूरतापूर्वक गिरफ्तार कर लिया।
जैसे ही इन गिरफ्तारियों की खबर फैली, समूचा कानपुर क्रांतिकारियों के समर्थन में सड़कों पर उतर आया। छह दिन बीत गए, फिर भी जनाक्रोश नहीं थमा तो अफसरों को विवश होकर क्रांतिकारियों की रिहाई का आदेश देना पड़ा। सातवें दिन क्रांतिकारी जेल से छूटे तो उन्हें एक जुलूस के साथ कानपुरवासी उन्हें हटिया के उसी रज्जन बाबू पार्क में ले आए, जहां तिरंगा फहराने के जुर्म में सिपाहियों ने उन्हें पकड़ा था। फिर वहां जश्नपूर्वक होली मनाई। तभी से कानपुर में सात दिन होली मनाई जाती है।
गौरतलब है कि स्वतंत्रता सेनानी होली को सामाजिक सुधार और शिक्षा का त्योहार बनाने की अपनी कोशिशों को लेकर अंग्रेजों से टकराते रहे थे। स्वतंत्रता सेनानी होली के महीनों पूर्व ही गाजे-बाजे के साथ देशवासियों में स्वतंत्रता की चेतना जगाने वाले फगुए गाना और गुलाल व फूलों से होली खेलना शुरू कर देते थे। धुलेंडी के दिन महिलाएं और बच्चे खादी के वस्त्र पहनकर अपने मोहल्लों में और कई बार मोहल्ले के बाहर भी निकलते और सुराजी गाने गाते थे। उन सारे गानों में कुरीतियां व रूढ़ियां मिटाकर समाज को बेहतर बनाने पर जोर होता था। जेलों में बंद स्वतंत्रता सेनानी भी कभी जेल के अफसरों से इजाज़त लेकर और कभी इजाज़त न मिलने पर उसकी अवज्ञा कर होली खेलते थे। उनकी होली में भी सर्वाधिक जोर सद्भाव पर ही होता था।

