ईमानदारी की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति दाल-खाना, भात-खाना, रोटी-खाना के जुगाड़ से ऊपर नहीं उठ पाता। वह ‘खाना’ को मात्र एक क्रिया मानता है। जिसमें ईश्वर प्रदत्त मुख से अन्न को उदरस्थ किया जाता है।
लो जी! अब कमर्शियल सिलेंडरों के दाम ताबड़तोड़ बढ़ गए। सो होटलों का खाना महंगा होने की खबर है। होटलों में खाने के शौकीन और ऑनलाइन बुलाकर खाने वाले लोग दुखी हैं। बुद्धि खाने पर जा अटकी है। खाने के बहाने नाना प्रकार के खाने के विचार खाए जा रहे हैं। ‘खाने-पीने’ वाले लोगों के अनुसार, जागरूकता के कुछ कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य ‘खाना’ रोक देने से होता है? इन कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों पर न खाने के लिए फालतू का दबाव बनाया जाता है। वहीं ईमानदारी की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति दाल-खाना, भात-खाना, रोटी-खाना के जुगाड़ से ऊपर नहीं उठ पाता। वह ‘खाना’ को मात्र एक क्रिया मानता है। जिसमें ईश्वर प्रदत्त मुख से अन्न को उदरस्थ किया जाता है ताकि मानव काया सक्रिय और परोपकार के काम में लग सके। इसके इतर ‘खाने’ के बारे में सोचना भी वह पाप समझता है।
विडंबना यह है कि ईमानदारी की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति जहां-जहां भी जाता है, तथाकथित ‘खाना’ पीछा नहीं छोड़ता। इस घोर कलियुग में वह बेजान-सा ईमानदारी-का-पुतला साबित होता है। अस्पतालों के बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘खैराती-दवाखाना’ लिखा होता है। वहां पर डॉक्टर अक्सर नदारद रहते हैं। लाचार मरीज ‘सब्र-खाता’ हुआ बैठा रहता है। यहां के दवा-वितरण-केंद्र ‘दवाखाना’ के नाम को चरितार्थ करते हुए दवाएं खा जाते हैं। मरीज सुबह की ताजी ‘हवा-खाना’ जैसे प्राकृतिक इलाज के भरोसे भटकते हैं।
किसी निर्दयी व्यक्ति ने हमारे ईमानदारी के पुतले को ताना कसा, ‘साहब! आप वह खाइएगा जिसे लोग खुलेआम नहीं खाते, बल्कि चुपके-चुपके खाते हैं, जैसे घूस-खाना या रिश्वत-खाना। आजकल इस खाने की होड़-सी लगी हुई है।’ ईमानदार क्रोधित हो उठा और बोला, ‘नीति शिक्षा कहती है, डांट-खाना, हाथ-खाना, लात कभी भी मत खाना समझे। ये निम्नस्तरीय खाना हैं। रिश्वतखोरों और बेईमानों का बुरा हश्र होता है। चोर-उचक्कों को चप्पल और जूते भी खाना पड़ते हैं।’
‘नेताओं द्वारा ‘वोट-खाकर’, ऐश से ‘नोट-खाने’ की पुरानी परम्परा है। इसलिए श्रीमान! ईमानदारी को रोज-रोज ओढ़ने और बिछाने के चक्कर में खाने के लाले पड़ सकते हैं।’ निर्दयी व्यक्ति ने चंपत होने के पूर्व ताना कसा। ईमानदार ताने को आत्मसात् करके सोचने लगा, ‘हे भगवान! लोग भेजा-खाना या दिमाग-खाना कब छोड़ेंगे?’ फिर गंतव्य की ओर बढ़ते हुए उसके क़दमों में एक भरोसा बलवती हो रहा था कि भ्रष्टाचार के सामने वह मात नहीं खाएगा। बेईमानों और भ्रष्टाचारियों को जेलखाना भेज देगा।

