संघर्ष के बाद फिलीस्तीनी हितों की फिक्र

संघर्ष के बाद फिलीस्तीनी हितों की फिक्र

जी. पार्थसारथी

जी. पार्थसारथी

इस्राइल के साथ पांच दशकों तक राजनयिक संबंध न रहने की वजह से भारतीयों को इस्राइली दृष्टिकोण और उसके पास-पड़ोस के मामलों की जानकारी कम ही है। ऐतिहासिक तौर पर भी भारतीयों-यहूदियों के बीच संबंध बहुत ज्यादा नहीं रहे। विदेशी धरती पर दोनों के बीच संबंध कम ही हैं। पश्चिम एशिया और खाड़ी के देशों में व्याप्त तनावों के पीछे स्थानीय लोगों के बीच मतांतर, आशंकाएं और होड़ क्यों है, इस बाबत भी भारतीयों की जानकारी न्यून है। वहां पनपे यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म, तीनों मतावलम्बी यरुशलम को पवित्र शहर मानते हैं।

अफसोस कि फिलहाल इस्राइल में यहूदियों और अल्पसंख्यक मुस्लिमों के बीच बहुत गहरी धार्मिक रार है। डर है सांप्रदायिक पाट इतना चौड़ा न हो जाए कि पुल बांधना मुश्किल हो जाए। यह मंजर उस हालात से भिन्न है जब 1947 में भारत का बंटवारा धार्मिक लीक पर हुआ था। भारत ने धर्मनिरपेक्ष संविधान को चुना, जिसमें अल्पसंख्यकों के हितों का सम्मान सुनिश्चित है। वहीं पाकिस्तान, जिसने जिन्नाह के धार्मिक आधार वाले ‘दो राष्ट्र’ सिद्धांत पर यकीन किया, वहां आपसी फूट इस कदर बनी, जिसकी परिणति 1971 में अलग देश बांग्लादेश के रूप में हुई। यहां एक सवाल जायज है कि केवल धर्म से राष्ट्रीयता का आधार पुख्ता रखा जा सकता है?

पश्चिम एशिया में साझी विरासत वाले तीन संप्रदाय-यहूदी, ईसाई और इस्लाम-के बीच पूर्वाग्रह और प्रतिद्वंद्विता आज भी जारी है। ईसाइयों के लिए यरुशलम पवित्र है, क्योंकि ईसा मसीह को सलीब पर चढ़ाने के बाद यहीं दफनाया गया था। यहूदी, जिन्हें हिटलर का नरसंहार सहना पड़ा, उनकी मान्यता में राजधानी यरुशलम वाला इस्राइल वह देश है, जिसका वादा ईश्वर ने हज़रत अब्राहम से किया था और वे लोग ऐसी जगह पर बसने की कामना सदियों तक करते आए हैं। वहीं इस्लाम के लिए भी यरुशलम का टेंपल माउंट मक्का-मदीना के बाद तीसरा सबसे पवित्र स्थल है। धार्मिक कट्टरता और खुद को न्यारा बताने की होड़ वह अड़चनें हैं, जिनकी वजह से साझा विरासत होने के बावजूद तीनों धर्मों के लोग शांति और सौहार्द से मिल-जुलकर नहीं रह पाए।

गाज़ा के फिलीस्तीनी क्षेत्र का हालिया तनाव पूर्वी यरुशलम में हुए प्रदर्शनों से शुरू हुआ जब वहां बसे 6 फिलीस्तीनी परिवारों को इस्राइली प्रशासन ने निष्कासित कर दिया। जाहिर है, फिलीस्तीनियों को अंदेशा था कि इस्राइली सर्वोच्च न्यायालय भी निर्णय उनके खिलाफ देगा। ऐसा महसूस करना जायज है क्योंकि जिस जगह से उन्हें खदेड़ा जा रहा है, अंतर्राष्ट्रीय कानून के मुताबिक वह उनकी है। तनाव की चिंगारी जल्द ही भड़ककर ज्वाला बन गई, गाज़ा पट्टी में फिलीस्तीनियों और इस्राइलियों के बीच जमकर बमबारी हुई। इन हमलों में 66 बच्चों सहित 256 फिलीस्तीनी मारे गए और 119 जख्मी हुए। इस प्रसंग में भारत ने सही रुख अपनाते हुए एक तरफ इस्राइल तो दूसरी ओर अरबों के साथ समान संतुलन वाला रिश्ता कायम रखा है।

इस्राइल के साथ भारत के रिश्तों में विस्तार और विविधता आई है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इस्राइली समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू के साथ निजी मित्रता बना ली थी। मोदी ने इस्राइल यात्रा के दौरान ध्यान रखा कि फिलीस्तीनी राजधानी रामल्लाह पहुंचकर राष्ट्रपति महमूद अब्बास से भी मुलाकात की जाए। रोचक है कि हालिया वर्षों में इस्राइल और कुछ पड़ोसी अरब राष्ट्रों के बीच नए मैत्री संबंध कायम हुए हैं, जबकि इससे पहले ईरान की तर्ज पर संबंध लगातार बिगड़ रहे थे। अब छह अरब मुल्क-मिस्र, जॉर्डन, बहरीन, यूनाइटेड अरब अमीरात, सूडान और मोरक्को के साथ इस्राइल के राजनयिक संबंध हैं। हो सकता है जल्द ही अन्य अरबी देशों के साथ भी बनें। सर्वविदित है कि अरबी मुल्कों और इस्राइल की साझी चिंता और ध्येय इस इलाके में ईरान का बढ़ता प्रभाव घटाने के अलावा कट्टरवादी अरब बागियों को मिलने वाली ईरानी शह भी है। रोचक बात यह है कि पिछले कुछ दशकों से पश्चिम एशिया क्षेत्र में ध्यान का केंद्र अरब-इस्राइल तनाव से हटकर अब अरब-ईरान प्रतिद्वंद्विता पर आ गया है।

जब प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव इस्राइल को राजनयिक मान्यता देने जा रहे थे, तब अरब जगत व्यग्र हो उठा था। लेकिन जल्द ही पाया कि भारत फिलीस्तीनियों के हक में पुराना समर्थन और सहानुभूति कायम रखे है। मजेदार यह कि जब प्रधानमंत्री मोदी ने फिलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मिलने के लिए जॉर्डन से रामल्लाह के लिए हेलीकॉप्टर में उड़ान भरी तो सुरक्षा हेतु इस्राइली वायुसेना के विमान साथ थे।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा समिति में गाजा और यरुशलम की हालिया घटनाओं पर विमर्श में भारत के स्थाई प्रतिनिधि टीएस त्रिमूर्ति ने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर भारत इस्राइल और फिलीस्तीन, दोनों से क्या चाहता है। त्रिमूर्ति ने कहा ‘युद्धविराम तुरंत करना वक्त की नजाकत है। हम दोनों पक्षों से संयम एवं यथास्थिति कायम रखने, तनाव घटाने और पूर्वी यरुशलम सहित आसपास के इलाके की पूर्व स्थिति में एकतरफा बदलाव न करने का आह्वान करते हैं।’

इस्राइल ने पाया कि वक्त के साथ यूरोपियन शक्तियां भी फिलीस्तीनियों के प्रति सहानुभूति भरा झुकाव रखने लगी हैं। हाल में, अमेरिकी विदेश मंत्री एंथोनी बलिन्केन का फिलीस्तीनियों के लिए हमदर्दी और समझ भरा भाव दिखाना एक महत्वपूर्ण संकेत है, जब उन्होंने रामल्लाह में फिलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मुलाकात के बाद यरुशलम में अमेरिकी उपदूतावास पुनः खोलने की घोषणा की। साफ है कि अमेरिका को अहसास है कि फिलीस्तीनियों के प्रति प्रधानमंत्री नेतन्याहू का कड़ा रुख, खासकर यरुशलम पर, प्रतिकर्म पैदा कर रहा है।

हालांकि फिलीस्तीनी समस्या का हल जल्द होने वाला नहीं है, गौरतलब है कि राष्ट्रपति जो बाइडेन गाज़ा में उन फिलीस्तीनियों के पुनर्वास में दिलचस्पी ले रहे हैं, जिनके घर हालिया इस्राइली बमबारी में तबाह हुए हैं। इसी बीच, इस्राइल सऊदी अरब और अन्य अरबी मुल्कों से औपचारिक राजनयिक मान्यता पाने के लिए काफी प्रयासरत है। इस्राइल को सलाह है कि फिलीस्तीनी भूमि और आगे न कब्जाए, खासकर यरुशलम में।

कोई शक नहीं कि मिस्र और सऊदी अरब के प्रभाव का इस्तेमाल करके चरमपंथी गुट हमास को छोटे-से उकसावे पर हिंसा करने से रोका जा सकता है। इस्राइल की मुख्य चिंता इस इलाके में ईरान की भूमिका को लेकर है, जहां वह हमास जैसे कट्टरवादी गुटों को हथियार मुहैया करवाकर अपना प्रभाव बढ़ाता जा रहा है। अहम सवाल यह है कि यदि ईरान अमेरिका और सहयोगी यूरोपियन मुल्कों के साथ संधि हेतु समझौता वार्ता करता है, जिससे उस पर लगे परमाणु प्रतिबंध हट सकते हैं, तब भी क्या वह अपनी उक्त नीतियां जारी रखेगा।

हालिया चुनाव परिणामों के बाद नेतन्याहू एक व्यवहार्य गठबंधन बनाने में असफल रहे हैं। लगता है पूर्व कमांडो रहे दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री नफ्ताली बैनेट के नेतृत्व में अब इस्राइल में सैद्धांतिक रूप से विपरीत ध्रुवों वाले दलों की गठबंधन सरकार बनने जा रही है। इस गठजोड़ में वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाले याअर लापिड विदेश मंत्री होंगे। बैनेट दो साल के लिए प्रधानमंत्री रहेंगे और बाकी समय में लापिड यह पद संभालेंगे। लगता है इस घटनाक्रम से बाइडेन प्रशासन खुश है। कदाचित बाइडेन प्रशासन इस्राइलियों को मनाने में व्यस्त रहेगा कि फिलीस्तीनियों के साथ मेल-मिलाप बनाने के उपाय किए जाएं। यरुशलम के विवाद को सुलझाने के लिए बैनेट प्रशासन को फिलीस्तीनियों की चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता रखते हुए आगे बढ़ना होगा।

लेखक पूर्व राजनयिक हैं।

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

पाक सेना के तीर से अधीर हामिद मीर

पाक सेना के तीर से अधीर हामिद मीर

नीति-निर्धारण के केंद्र में लाएं गांव

नीति-निर्धारण के केंद्र में लाएं गांव

असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा

असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा

बदलोगे नज़रिया तो बदल जाएगा नज़ारा

बदलोगे नज़रिया तो बदल जाएगा नज़ारा

हरियाणा के सामाजिक पुनर्जागरण के अग्रदूत

हरियाणा के सामाजिक पुनर्जागरण के अग्रदूत

मुख्य समाचार

सुप्रीमकोर्ट ने सीबीएसई और आईसीएसई की 12वीं का रिजल्ट तैयार करने के फार्मूले पर लगायी मुहर

सुप्रीमकोर्ट ने सीबीएसई और आईसीएसई की 12वीं का रिजल्ट तैयार करने के फार्मूले पर लगायी मुहर

कहा-यदि विद्यार्थी परीक्षा देने के इच्छुक हैं तो दे सकते हैं