तरक्की के लिए जरूरी है सांप्रदायिक सौहार्द

तरक्की के लिए जरूरी है सांप्रदायिक सौहार्द

एन.एन. वोहरा

एन.एन. वोहरा

विभाजन के बाद का अनुभव बताता है कि देश निर्माण में जिस तरह अन्य सब चीजों की जरूरत एक जैसी होती है, वहीं अर्थपूर्ण विकास एवं उन्नति तभी प्राप्त की जा सकती है जब मुल्क में राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक-व्यवस्था कायम रहे। व्यवसाय घरेलू हो या विदेशी कंपनियां, वे तभी निवेश कर मुनाफादायक धंधा चला पाएंगे जब मुल्क और समाज में शांति और सामान्य हालात कायम रहें। इस तरह का माहौल बनाने के लिए जरूरी है कि सरकारी तंत्र तेजी और दक्षता के साथ काम करे, कानून-व्यवस्था बनी रहे, भ्रष्टाचार नियंत्रण में हो और सभी नागरिकों की भलाई एवं सुरक्षा सुनिश्चित रहे। अतएव यदि सभी मोर्चों पर तरक्की पानी है और देश को उस ध्येय को तेजी से पाना है, जिसके लिए आजादी लेते वक्त अहद उठाया था, तो सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि एक स्वच्छ एवं दक्ष प्रशासन देने के अलावा मुल्क में विश्वास, सुरक्षा एवं निश्चिंतता व्याप्त रहे।

इसके लिए प्रथम और आवश्यक अवयव है स्थिरता और सार्वजनिक व्यवस्था कायम करना और सभी मोर्चों पर तेजी से प्राप्ति करना, हम उस किस्म की सांप्रदायिक अशांति पैदा होना बार-बार गवारा नहीं कर सकते जिस तरह हाल में राष्ट्रीय राजधानी में देखने को मिली है, जिसके नतीजे में व्यापक स्तर पर हिंसा, हत्याएं और जान-माल का नुकसान हुआ है। यह गंभीर चिंता का विषय है और जैसा कि मीडिया में बताया गया है, उक्त अशांति इसलिए बनी थी क्योंकि एक संप्रदाय विशेष की आस्था और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं पर दूसरे संप्रदाय से संबंधित राजनीतिक तत्वों को किंतु-परंतु करने और मखौल उड़ाने दिया गया था, जाहिर है इसका उद्देश्य धार्मिक वैमनस्य पैदा करना था।

सनद रहे कि दंगों में जान-माल की हानि के अलावा आर्थिकी को भी काफी नुकसान पहुंचता है, सांप्रदायिक हिंसा की प्रत्येक घटना अनेकानेक दीर्घकालीन नतीजे पीछे छोड़कर जाती है  मसलन आपसी अविश्वास, विभिन्न जातियों अथवा संप्रदायों के बीच एक-दूसरे का डर और लोगों के बीच नफरत घर कर जाती है। बैर का ऐसा बीज पड़ जाता है जो कई पीढ़ियों तक खत्म नहीं होता जैसा कि दिल्ली वाली घटनाओं में हुआ है। इस तरह के प्रसंग अलग-अलग संप्रदायों से संबंध रखने वाले पड़ोसियों के बीच कभी न भरने वाली दरार पैदा कर देते हैं, जो इससे पहले दशकों से उन्हीं गली-मोहल्लों में आपस में मिल-जुलकर हंसी-खुशी रहते आए हैं। अफसोसनाक है कि सांप्रदायिकता का वायरस एक बार किसी के दिमाग में घुस जाए तो उसे निकालना बहुत कठिन होता है।

सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है कि शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों के बीच आपसी बैर और फूट का कैंसर फैलाने की कोशिश की जा रही है। हालिया वर्षों में, राष्ट्रीय राजधानी की दो यूनिवर्सिटियों में अभूतपूर्व हिंसक झड़पें हुई हैं, शैक्षणिक सत्रों को अपूरणीय नुकसान भी पहुंचा है। छात्र वर्ग को सबसे बेहतरीन मौके मुहैया करवाकर और भारत की विशाल युवा शक्ति का भरपूर इस्तेमाल करके तेजी से आर्थिक तरक्की पाने की बजाय यहां युवाओं को राजनीतिक लाभ उठाने की खातिर गुमराह किया जा रहा है।

देशभर में शहरों, गांवों और दूर-दराज में फैली अनेकानेक जातियां हैं, जिनसे हमारी विशाल जनसंख्या बनी है। लोग विभिन्न संप्रदाय, बोलियां एवं सांस्कृतिक अंतर का प्रतिनिधित्व करते हैं और मिलकर वह भारत बनाते हैं। जिसे ‘अबाधित विविधताओं का देश’ कहा जाता है। इस विविधता को हमारे संविधान निर्माताओं ने बड़ी संवेदनशीलता और स्वीकार्यता दिखाते हुए समाहित किया था, जब उन्होंने नागरिकों के हक एवं विशोषाधिकार और राजकीय नीति सिद्धांत बनाए थे।

अपने सार्वजनिक भाषणों और वक्तव्यों में राजनेता अक्सर देश की हजारों साल पुरानी सभ्यता का जिक्र करते वक्त न्यायोचित गर्व से बताते हैं कैसे कालांतर में इस ‘अनेकता में एकता’ से हमें बहुत ज्यादा सामाजिक बल मिलता रहा है। हालांकि, बतौर नागरिक अब महसूस हो रहा है कि हमारे समाज में उपस्थित बहुस्तरीय विविधता के प्रति संवेदनशीलता लगातार खत्म होती जा रही है, यह ह्रास कुछ राजनीतिक दलों की वजह है जो लोगों के बीच जाति-संप्रदायगत फूट डालकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने में लगे हैं।

तरक्की, गरीबी उन्मूलन और असमानता हटाने वाले ध्येय की प्राप्ति हेतु हमें स्थिरता की जरूरत है ताकि देश आर्थिक एवं सैन्य रूप से मजबूत बनने की दिशा में आगे बढ़ सके। सांप्रदायिक प्रेम में किसी किस्म की फूट पड़ना हम गवारा नहीं कर सकते और इसका अंजाम किस कदर तबाहकुन होता है यह इस भस्मासुर ने बार-बार दिखा दिया है। इसकी बजाय हमें सतत सामाजिक सौहार्द कायम रखना होगा और उस रिवायती सहनशीलता को पुनः जागृत करना होगा, जिसके माध्यम से हम सदियों से जाति, संप्रदाय और भाषा में विषमता के बावजूद सम्मिलित शक्ति प्राप्त कर लेते थे।

पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न भागों से हमारे युवा लड़के-लड़कियां अपने घरों से दूर जाकर नौकरी करने लगे हैं। आज हमें जम्मू-कश्मीर के पहाड़ों और राजस्थान के रेतीले इलाकों में मिजो, नागा और मणिपुरी युवा काम करते मिल जाएंगे, इसी तरह केरल और अंडमान द्वीप में पंजाबी और हरियाणवी कामगार नजर आते हैं। यह चलन स्वागतयोग्य है क्योंकि इससे सांस्कृतिक एकीकरण बनता है। अलग नैन-नक्श वाले जिन लोगों को हमारे बच्चों ने पहले न देखा हो, उनकी पृष्ठभूमि और संस्कृति के बारे में जागरूक करवाना हमारा फर्ज बनता है। साथ ही उनके खान-पान की आदतें, कपड़े पहनने के रंग-ढंग और यहां तक कि बालों के स्टाइल चुनने की आजादी का सम्मान करना सिखाना चाहिए।

हाल के वर्षों में हमें जाति और संप्रदाय को लेकर हुए दंगों, भीड़तंत्र से उपजी सरेआम हत्याओं के क्रूर दृश्य देखने को मिले हैं। प्रत्येक सरकार सुनिश्चित करे कि इनकी पुनरावृत्ति न होने पाए।

हमारे नीति-निर्धारकों को अहसास होना चाहिए कि अगर प्रशासनिक मशीनरी के कामकाज की खामियों को दूर नहीं किया तो आगे हालात बहुत खतरनाक बन सकते हैं। वर्तमान विफलताओं और भावी चुनौतियों का आकलन करते हुए कार्यपालिका और न्यायपालिका तुरंत प्रभाव से अपनी असल संवैधानिक भूमिका का निर्वहन करें। संविधान की हिफाजत-निडर होकर न्याय करने की अपनी सर्वोच्च जिम्मेवारी का अहसास पूरी तरह पुनः जगने का और ज्यादा इंतजार न्यायपालिका न करे। काफी अरसे से लंबित पड़े चुनाव सुधार, जो हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में व्याप्त अनेकानेक व्याधियों के इलाज हेतु अत्यंत जरूरी हैं, इनको प्राथमिकता देते हुए लागू किया जाए। साथ-ही-साथ, नीति-निर्धारक स्व-शुद्धि की जरूरत को मान्यता दें ताकि संपूर्ण प्रशासनिक ढांचे की पूरी तरह सफाई हो सके और राज्यों के अधिसंख्य विभागों में विचरने वाले दलालों का सफाया हो सके, ऐसे सुधार लागू किए जाएं।

आवश्यक सुधार लागू करने में राजनीतिक इच्छाशक्ति और दृढ़ता जरूरी होती है, लेकिन यह किए बिना हम भारत के नागरिकों को संतोषजनक प्रशासन नहीं दे सकते। उम्मीद करें कि हमारे नीति-निर्धारक हिम्मत दिखाते हुए चुनौती को सुलझाने की खातिर गांडीव अवश्य उठाएंगे।

लेखक जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल हैं। उपरोक्त लेख शताब्दी वर्ष में 9 सितंबर को आयोजित सर सैयद यादगारी व्याख्यान में दिए गए ऑनलाइन संबोधन के अंशों पर आधारित है

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