अटलांटिक के ठंडे पानी से मॉनसून में बदलाव
एक नई रिसर्च से पता चलता है कि उत्तरी अटलांटिक महासागर में पानी के एक ठंडे हिस्से ने जेट स्ट्रीम हवाओं के जरिए भारतीय गर्मियों के मॉनसून में बदलाव शुरू कर दिए हैं। इससे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी को खतरा...
एक नई रिसर्च से पता चलता है कि उत्तरी अटलांटिक महासागर में पानी के एक ठंडे हिस्से ने जेट स्ट्रीम हवाओं के जरिए भारतीय गर्मियों के मॉनसून में बदलाव शुरू कर दिए हैं। इससे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी को खतरा पैदा हो गया है।
मॉनसून हमारी जीवन रेखा है। भारत और दक्षिण एशिया के दूसरे हिस्सों में 1 अरब से अधिक लोग खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए मॉनसून पर निर्भर हैं। हर साल हम एक अच्छे मॉनसून की प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया है कि पिछले कुछ वर्षों से भारतीय मॉनसून के पैटर्न में परिवर्तन हो रहा है। वैज्ञानिक इस बदलाव के कारणों को जानने की कोशिश कर रहे हैं। अब एक नई रिसर्च से पता चलता है कि उत्तरी अटलांटिक महासागर में पानी के एक ठंडे हिस्से ने जेट स्ट्रीम हवाओं के जरिए भारतीय गर्मियों के मॉनसून में बदलाव शुरू कर दिए हैं। इससे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी को खतरा पैदा हो गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन दोनों प्रणालियों के बीच का संबंध एक ऐसे पहले से अज्ञात संबंध को दिखाता है जो दक्षिण एशिया में मौसम के अनुमानों को जानकारी दे सकता है और दूसरी जगहों पर मौसम की घटनाओं पर रोशनी डाल सकता है।
ध्यान रहे कि जेट स्ट्रीम हवाएं पृथ्वी के वायुमंडल में 9 से 16 किलोमीटर की ऊंचाई पर बहने वाली तेज गति वाली, संकरी वायुधाराएं हैं। तापमान के अंतर और पृथ्वी के घूर्णन से संचालित ये हवाएं वायुमंडलीय सीमाओं के रूप में कार्य करती हैं जो वैश्विक मौसम के पैटर्न को आकार देती हैं और वाणिज्यिक विमानन मार्गों को प्रभावित करती हैं।
भारतीय गर्मियों का मॉनसून वर्षा का एक पैटर्न है जो जून से सितंबर तक रहता है और यह गर्म उत्तरी हिंद महासागर और भूमध्य रेखा के नीचे ठंडे समुद्री पानी के बीच तापमान के अंतर से चलता है। शुरू में, मॉनसून ने भारत के पश्चिमी तट और उत्तरी भारत के एक बड़े इलाके (गंगा के मैदान) में भारी बारिश शुरू की थी। लेकिन 1999 से यह पैटर्न बहुत बदल गया है। शोधकर्ताओं ने एक नए अध्ययन में पाया कि उत्तर-पश्चिम भारत में अब मॉनसून सीजन में 1999 से पहले के मुकाबले लगभग 25 प्रतिशत ज्यादा बारिश होती है, जबकि गंगा के मैदानी इलाकों में लगभग 4 प्रतिशत कम बारिश होती है।
इस अध्ययन के पहले लेखक और भारतीय विज्ञान संस्थान के जलवायु वैज्ञानिक महेंद्र निम्माकांति ने कहा कि यह परिवर्तन किसानों के लिए खास तौर पर बहुत बुरा है, क्योंकि उनके खेतों की मिट्टी और फसलें बारिश के पुराने पैटर्न के हिसाब से ढल गई हैं। उन्होंने कहा कि भारत काफी हद तक खेती पर निर्भर है। उत्तर-पश्चिम भारत में सामान्य से अधिक बारिश होने पर अचानक बाढ़ आ जाती है और फसलों का नुकसान होता है, क्योंकि इस इलाके की खेती सूखे हालात के हिसाब से ढल गई है। इस बीच, गंगा के मैदानी इलाकों में सूखे के दौर भी आए हैं, जिससे फसलों में भी कमी आई है और किसानों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा है।
पिछले अध्ययनों ने भारतीय मॉनसून में परिवर्तन को अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (एएमओसी) में बदलाव से जोड़ा था। एएमओसी अटलांटिक में समुद्री धाराओं का एक बड़ा जाल है जो वैश्विक जलवायु को नियमित करता है और उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी पहुंचाता है। आंकड़े बताते है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से एएमओसी धीमा हो रहा है और उत्तरी अटलांटिक महासागर में पहले के मुकाबले कम गर्मी छोड़ रहा है। निम्माकांति ने कहा कि इन अध्ययनों में यह नहीं बताया गया कि भारतीय मॉनसून कैसे बदल सकता है। इसके पीछे के तंत्र को भी विस्तार से नहीं समझाया गया। उन्होंने कहा, ये अध्ययन आम तौर पर यह समझाते हैं कि अगर एएमओसी कमजोर होता है, तो यह भारतीय मॉनसून को भी कमजोर करता है।
एक बड़ी समस्या यह है कि मौजूदा जलवायु मॉडल भारतीय मॉनसून में हुए बदलावों को नहीं दिखाते हैं, क्योंकि वे उत्तरी अटलांटिक महासागर की सतह के तापमान में बदलाव को भी पूरी तरह से ग्रहण नहीं करते हैं। इन मॉडलों ने ग्रीनलैंड के दक्षिण-पूर्व में एक अत्यंत ठंडे क्षेत्र पर गौर नहीं किया जिसे ‘कोल्ड ब्लॉब’ के नाम से जाना जाता है, जहां 1901 और 2021 के बीच पानी 1800 के दशक के आखिर की तुलना में ज्यादा ठंडा था। कोल्ड ब्लॉब बताता है कि एएमओसी कमजोर हो रहा है क्योंकि यह उत्तरी अटलांटिक तक पहुंचने वाली गर्मी की मात्रा में कमी की ओर इशारा करता है।
यह पता लगाने के लिए कि भारतीय मानसून कैसे और क्यों बदला है, शोधकर्ताओं ने दर्जनों जलवायु मॉडलों में बारिश का डेटा, समुद्र की सतह के तापमान के रिकॉर्ड और असल जिंदगी के दूसरे अवलोकन डाले। इसने पिछले 27 सालों में देखे गए बदलावों को फिर से दिखाया। इन नतीजों से उत्तरी अटलांटिक में हुए बदलावों और मानसून में बदलावों के बीच संबंध का पता चला। यह जानने के लिए क्या उत्तरी अटलांटिक समुद्र की सतह के तापमान की वजह से भारतीय मानसून अजीब तरह से बर्ताव कर रहा है, टीम ने एक सिमुलेशन (कंप्यूटर पर परिस्थितियों की नक़ल) में कोल्ड ब्लॉब को जोड़ा और हटाया।
नतीजों से पता चला कि ठंडे ब्लॉब ने उतरी अटलांटिक पर एक मजबूत टेम्परेचर ग्रेडिएंट (तापमान में परिवर्तन की दर और दिशा का पैमाना) बनाकर भारतीय मानसून को शिफ्ट कर दिया है, जो बदले में यूरेशिया के ऊपर वायुमंडल में जेट स्ट्रीम हवाओं और प्रेशर सिस्टम पर असर डालता है। खासकर, उत्तरी अटलांटिक के ऊपर जेट स्ट्रीम तेज हो गई है, और पश्चिमी रूस में यूराल पहाड़ों के ऊपर एक ‘ब्लॉकिंग’ सिस्टम मजबूत हो गया है। इसके परिणामस्वरूप भारत में मौसम सिस्टम बदल गए हैं, जो नमी वाली हवा को देश के उत्तर-पश्चिम की ओर ले जा रहे हैं और उसे दूसरे इलाकों से दूर खींच रहे हैं।
एजीयू एडवांसेज जर्नल में छपे नए नतीजों से मौसम का अनुमान लगाने वालों को भारत और पड़ोसी देशों में मॉनसून के दौरान बहुत ज्यादा बारिश और सूखे जैसी घटनाओं का अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि भारतीय मॉनसून वैश्विक जलवायु में एक निर्णायक बिंदु (टिपिंग प्वाइंट) है, और इन निष्कर्षों से पता चलता है कि यह सिस्टम 1999 में एक अहम सीमा पार कर गया था। तब से कोल्ड ब्लॉब की वजह से जेट स्ट्रीम में लगातार बदलाव हुआ है, जिससे मॉनसून में अचानक बदलाव आए हैं। अभी यह साफ नहीं है कि तेजी से बदलती जलवायु में भारतीय मॉनसून कैसे बदलेगा, क्योंकि जलवायु मॉडल उत्तर अटलांटिक के बारे में अलग-अलग अनुमान लगाते हैं, और दुनिया के बदलने के साथ-साथ दूसरे कारण भी असर डाल सकते हैं।
लेखक विज्ञान मामलों के जानकार हैं।
