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संज्ञानात्मक युद्ध : दांवपेच का सातवां रणक्षेत्र

मेघना नदी दस्तावेज की तार्किक सीख है कि भारत का संवैधानिक प्रारूप एक राजनीतिक विकल्प से कहीं अधिक है। यह संज्ञानात्मक लचीलेपन के लिए एक रणनीतिक संपत्ति है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कृत्रिम नैरेटिव के युग में, हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था एक...

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मेघना नदी दस्तावेज की तार्किक सीख है कि भारत का संवैधानिक प्रारूप एक राजनीतिक विकल्प से कहीं अधिक है। यह संज्ञानात्मक लचीलेपन के लिए एक रणनीतिक संपत्ति है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कृत्रिम नैरेटिव के युग में, हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था एक परम 'वितरित रक्षा' के रूप में कार्य करती है।

युद्ध का शब्दिक अर्थ अपनी परिभाषा से बाहर निकल चुका है। सदियों से, शक्ति का माप हल की नोक और युद्धपोत के पीछे बनने वाली लहरों से किया जाता रहा है। रणनीति ने भूमि, समुद्र, वायु, शांत गहराइयों, अंतरिक्ष के निर्वात और साइबर ग्रिड की टिमटिमाती शिराओं का मानचित्रण कर लिया है। आज एक सातवें कार्यक्षेत्र (डोमेन) ने चुपचाप रणनीति की धुरी को हर लिया है। एक अनुभूति : सबसे अंतरंग और सबसे व्यापक।

यह बदलाव अब और अधिक सैद्धांतिक नहीं रहा। पूर्वी यूरोप से लेकर पश्चिम एशिया तक और हमारी अपनी विवादित सीमाओं पर, युद्ध का दायरा पहले ही विस्तृत हो चुका है। प्रभाव अभियान अब प्रत्यक्ष कार्रवाई से पहले, उसके साथ और उसके बाद तक जारी रहता है। केंद्र बिंदु अब मंचों से धारणा की तरफ सरक रहा है, केवल मारक क्षमता से हटकर एकजुटता कायम रखने वाला समाज ही तनाव के दौरान बचा रह सकता है।

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आधुनिक युद्धक्षेत्रों में, नैरेटिव की गति, सूचनागत आघात और सामाजिक लचीलेपन के जरिए परिणाम निरंतर आकार लेते जा रहे हैं। धारणा ने अब ओओडीए लूप्स, एस्केलेशन थ्रेशोल्ड और राजनीतिक निर्णय चक्रों को इस प्रकार संकुचित कर दिया है, जिसका अनुमान परंपरागत सिद्धांत पूरी तरह लगा नहीं पाए।

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एकजुट रखने वाला कार्यक्षेत्र : राष्ट्र शक्ति का शून्य-

शून्य, भारतीय सभ्यता का एक योगदान, गणित में वह मूक गुणांक है जो पैमाना बनाता है। किसी राष्ट्र की संरचना में सामाजिक सामंजस्य वही बुनियादी भूमिका निभाता है। इस शून्य के बिना, शक्ति का अंकगणित अस्थिर हो जाता है। इसके बगैर, सबसे उन्नत गतिज ताकतें, मिसाइलें, उपग्रह और विमान वाहक बेड़े तक भी आकर्षण खो देते हैं। जब सामाजिक विश्वास भंग हो जाए, तो सैन्य क्षमता थम जाती है। जब दोनों एकीकृत हो जाएं, तो राष्ट्रीय शक्ति अधिक वेग से आगे बढ़ती है।

इसलिए संज्ञान आधुनिक युद्धों में जोड़ने वाले डोमेन के रूप में उभरा है। इसकी एक सतह पर लोगों में एकता निहित है; दूसरी सतह पर युद्ध के छह पारंपरिक माध्यम संचालित होते हैं। प्रत्येक स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकता है, लेकिन उनकी असली क्षमता एकीकरण में निहित है। सातवें कार्यक्षेत्र में एकता वह जोड़ने वाला पदार्थ है जो सबको थामे रखता है।

नदी का सिद्धांत : क्षरण से घेराबंदी तक - भारत ने 1971 के युद्ध में इस गतिशीलता का आरंभिक प्रदर्शन देख लिया था। ‘मेघना क्रॉसिंग’, एक दुस्साहसिक नदी पारीय अभियान, जिसने ढाका के लिए राह खोल दी, इसने बलों की तैनाती से कहीं अधिक किया। इसने प्रतिद्वंद्वी की अपरिहार्यता की धारणा को बदलकर रख दिया।

जलीय बाधा के तर्क ने आगे बढ़ने की संभावना को खारिज कर रखा था, लेकिन वायुसैन्य प्रहारों और बख्तरबंद दस्तों वाले अभियान ने संज्ञानात्मक अनुभूति आघात दिया। प्रतिद्वंद्वी के पास गोला-बारूद ख़त्म नहीं हुआ था; बल्कि लड़ने की इच्छाशक्ति उखड़ गई थी। इस संज्ञानात्मक आघात ने आत्मसमर्पण गति को तीव्रता दी।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में, ‘मेघना सिद्धांत’ पुनः तीव्र प्रासंगिकता प्राप्त कर गया है। सातवें डोमेन में, उद्देश्य संज्ञानात्मक घेराबंदी बनाना है: प्रतिद्वंद्वी द्वारा भंग करने से कहीं पहले, अपने प्रणालीगत संतुलन की संभाल लेना। यह लाभ संकट के दौरान कभी भी सुधारा नहीं जा सकता; इसे युद्धों के बीच के काल में निरंतर, कल्पनाशील प्रशिक्षण के माध्यम से ढालना पड़ता है।

भारत की संरचनात्मक उत्कृष्ट कृति : वितरित लचीलापन : अधिकांश आधुनिक शक्तियां किले जैसी हैं, केंद्रीकृत, भव्य, और अक्सर भंगुर। भारत अलग ढंग से विकसित हुआ है। यह एक जीवंत नेटवर्क के रूप में कार्य करता है। संविधान की प्रस्तावना सोर्स कोड के रूप में कार्य करती है। बहुलवाद उच्च स्तरीय झटका-अवशोषक के रूप में कार्य करता है। ‘अनेकता में एकता’ महज बयानबाजी के रूप में नहीं बल्कि वितरित रक्षा व्यवस्था के रूप में कार्य करती है।

चुनावी मंथन, भाषाई बहुलता और संघीय जटिलता गणतंत्र पर बार-बार दबाव डालकर इसका इम्तिहान लेती है। रणनीतिक गहराई उस संचित अनुभव से बनी है। 1.4 अरब अलग-अलग स्वरों का एक देश, जो लोकतांत्रिक सहमति से जुड़ा हुआ है, वह सूचनात्मक झटकों का असामान्य रूप से शक्तिशाली अवशोषक बन जाता है। वह शक्ति जो सामाजिक रूप से स्थिर नहीं होती, वह रणनीतिक रूप से नाजुक हो जाती है। 1962 के बाद का हर युद्ध इस सहनशक्ति का गवाह है।

एआई का दौर और डिजिटल ढांचा : कृत्रिम बुद्धिमत्ता धारणा और प्रतिक्रिया के बीच अंतराल को कम कर रही है। ऐसे माहौल में विश्वसनीयता खुद-ब-खुद युद्धक शक्ति का एक रूप बन जाती है। ड्रोन एक हवाई मशीन है, संज्ञान माध्यम है। भारत का डिजिटल सार्वजनिक आधारभूत ढांचा जनता के स्तर पर विश्वास निर्माण हेतु पहले से बना बनाया सांचा प्रदान करता है। सही ढंग से संचालित, ऐसे मंच सुनिश्चित कर सकते हैं कि धारणा और सत्यापन योग्य वास्तविकता के बीच अंतर खतरनाक रूप से न बढ़ने पाए।

यूक्रेन - एक तनाव परीक्षा : यूक्रेन-रूस संघर्ष सातवें डोमेन का तनाव के दौरान गहराई से परीक्षा का अवसर प्रदान करता है। सालों से जारी युद्ध में, अकेले युद्धक्षेत्र प्रदर्शन ने रणनीतिक सहनशीलता का निर्धारण नहीं किया है। नैरेटिव सुसंगतता, आर्थिक सहनशक्ति और राजनीतिक वैधता परंपरा को जारी रखे हुए है।

जो चीज़ लगातार दिखाई दे रही है, वह है लंबे समय से तनाव के बीच भी सामाजिक एकता की धुरी कायम रहना। जो राष्ट्र आंतरिक विश्वास बनाए रखेंगे, वे उद्देश्य पर लंबे समय तक टिके रह सकते हैं; जहां पर परस्पर भरोसा खंडित हो जाए, वहां पर रणनीतिक हानि जमा होती जाती है।

अपने स्थापना काल से ही, भारत ने ‘वी द पीपल’ (हम लोग) को मूल में रखा है और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी नागरिक समरसता को क्रियान्वित किया है। सातवें डोमेन में, सहनशक्ति का प्रवाह न केवल मारक क्षमता से बनता है, बल्कि इसके पीछे मौजूद एकजुटता से तैयार होता है।

लंबे युद्ध की हकीकत : आधुनिक संघर्ष एक गतिज कृत्य होने के बजाए लंबे खिंचने वाले प्रणालीगत द्वंद्व में बदल चुका है। विस्तारित लड़ाइयों में, जो पक्ष सीखने के चक्र में महारत हासिल कर लेता है वह दिशा निर्धारित करता है, लेकिन सहनशक्ति उसी देश में प्रवाहित होगी, जो अपने नैतिक एवं संस्थागत आधार को संरक्षित रख पाएगा।

जीत अब एकमात्र सफलता नहीं रह गई है। समय और दूरी से परे, यह निर्णयगत लाभ को सतत रखना हो गया। कथात्मक प्रचार शिथिलता, निर्णय अधिभार, और संस्थागत फिसलन अब रणक्षेत्र में नुकसान की भांति हैं।

खुद सिद्धांत को अनुकूलन के लिए निरंतर मजबूर किया जा रहा है। रियल टाइम में क्रमिक विकास करने वाले संघर्षों में गैर-लचीली संहिता हाथ-पैर मारती रह जाती है। आधुनिक युद्धक्षेत्र उन संगठनों को पुरस्कृत करता है जो निरंतर सीखेंगे, बुद्धिमानी से विकेंद्रीकरण कर सकेंगे, और एकता खोए बगैर खुद को बदल सकते हैं। यहां फिर से, गहरा लाभ उन सामाजिक एवं संवैधानिक आधारों में निहित है जो दबाव के बावजूद स्पष्टता बनाए रखते हैं।

अंततः समरूपता : आखिरकार, सातवां डोमेन किसी राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को दर्शाता है। कृत्रिम नैरेटिव्स और कृत्रिम प्रचार के युग में, लाभ उस समाज को होगा जो निरंतर तनाव के बीच एकजुटता कायम रखेगा। मशीन की अराजकता के विरुद्ध सबसे मजबूत बचाव ‘हम लोग’ की सतत सुस्पष्टता है। संज्ञान युग में, एकता स्वयं ही निवारण बन जाती है, और प्रत्येक नागरिक राष्ट्रीय लचीलेपन में एक हितधारक होता है। युद्धों को अब लड़ने से पहले ही आकार दिया जाता है। यदि लड़ाई हम पर थोपी जाती है, तो जो राष्ट्र अपने डोमेन (कार्यक्षेत्र) को स्पष्टता और एकजुटता के साथ संरेखित रख पाएगा, वह न केवल बल के जरिए बल्कि प्रणालीगत लाभ के माध्यम से प्रतिद्वंद्वी को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करेगा।

सातवें डोमेन में, जीत पहली गोली चलाने से काफी पहले शुरू हो जाती है और आखिरी गोली थमने के काफी देर बाद तक कायम रहती है।

लेखक सेना की पश्चिमी कमान के पूर्व कमांडर एवं पुणे इंटरनेशनल सेंटर के संस्थापक ट्रस्टी हैं।

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