इमरान के ‘नये पाकिस्तान’ में वर्गीय तनाव

इमरान के ‘नये पाकिस्तान’ में वर्गीय तनाव

इमरान के ‘नये पाकिस्तान’ में वर्गीय तनाव

जी. पार्थसारथी

उन्नीसवीं सदी में इस्लाम की दो बड़ी धाराएं भारत की धरा पर नमूदार हुई थीं। रिवायती तौर पर इनमें से एक को ‘देवबंदी’ तो दूसरी को ‘बरेलवी’ पुकारा जाता है। यह दोनों प्रवाह उन मुस्लिम आलिमों और विचारकों के प्रयासों से फलीभूत हुए थे, जो दिल्ली में मुगल सल्तनत ढहने के बाद ब्रितानी हुकूमत के कोप से बचने को फरार हुए थे। देवबंदी विचारधारा को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनवा क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों ने अपना रखा है। समूचे अफगानिस्तान में बसने वाली तमाम पश्तून जाति भी इस पर अमल करती है। इसी तरह देवबंदी तौर-तरीकों ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तमाम पश्तूनों के बीच अपने पांव जमा रखे हैं। वहीं दूसरी ओर बरेलवी पंथ को भी इस बात पर संतोष था कि बाकी भारतीय उपमहाद्वीप में उसका प्रभाव कायम है। 19वीं सदी में देवबंदी विचारधारा के प्रचारक भारत से निकलकर अरब की खाड़ी वाले देशों में पहुंचे। यह ऐसी पहल थी, जिसने आगे चलकर खासा लाभ पहुंचवाया, क्योंकि सऊदी अरब ने देवबंदी संस्थानों की भरपूर आर्थिक मदद की है।

भारतीय देवबंदी नेतृत्व द्वारा लिया गया सबसे दूरगामी निर्णय था महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करते हुए धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का प्रतिपादन करना। ‘दारुल उलूम’, जो पहले भी इस पंथ का मुख्य केंद्र था और आज भी है, उत्तर प्रदेश के देवबंद शहर में है। हालांकि आरंभ में बरेलवी नेतृत्व के कुछ लोग समकालीन देवबंदियों जैसी उदार सोच वाले थे, लेकिन अधिकांश, जो मौजूदा पाकिस्तान में रहते थे, आगे चलकर बंटवारे का समर्थन करने लगे। 3 नवंबर 2009 को भारतीय मुस्लिमों की भलाई के लिए समर्पित जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद नामक एक देवबंदी धड़े ने सम्मेलन बुलाकर आत्मघाती बम हमलों और बेगुनाह आम लोगों को निशाना बनाने वाले आतंकी कृत्यों की भर्त्सना की। यह सीधे तौर पर पाकिस्तान की भारत के खिलाफ आतंक को एक ‘राजकीय औजार’ की तरह इस्तेमाल करने वाली नीति की आलोचना थी।

पाकिस्तानी सेना ने लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद और अफगान तालिबान जैसे देवबंदी सोच वाले आतंकी संगठनों की पीठ पर अपना हाथ रख दिया, जो सैनिक प्रतिष्ठान से सांठ-गांठ कर अपनी विध्वंसक गतिविधियां चलाते हैं। जैश-ए-मोहम्मद ने वर्ष 2001 में भारत की संसद पर तो वर्ष 2008 में लश्कर-ए-तैयबा ने मुंबई आतंकी हमलों को अंजाम दिया। इन गुटों की ‘धाय मां’ आईएसआई ने इनके संबंध अफगान तालिबान से करवा रखे हैं। लिहाजा जल्द ही बरेलवियों को इल्म हो गया कि पाकिस्तानी पंजाब में राजनीतिक प्रभाव और समर्थन की कूवत रखने के बावजूद पाकिस्तान की बृहद राजनीति में वे अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं। जिस दिन से अफगानिस्तान में सोवियत संघ ने सैनिक हस्तक्षेप शुरू किया था, तब से लेकर पश्तून, जो अधिकांश देवबंदी हैं, आईएसआई की कृपा और शेष दुनिया के ध्यान का पात्र बने हुए हैं। तालिबान को यह भी लगता है कि उनके देवबंदी सिद्धांत, मददगार लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद की वहाबी विचारधारा के ज्यादा नजदीक हैं।

प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को पदच्युत कर सूली पर चढ़वाने वाले सैनिक तानाशाह जनरल जिया उल हक के इस कारनामे से कायल होकर पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी इलाके और दक्षिणी अफगानिस्तान के पश्तून देवबंदी उनके ‘नैसर्गिक सहयोगी’ बन गए। जिया उल हक ने पाकिस्तानी राजनीति में ‘इस्लामीकरण का नया दौर’ चलाया। उन्होंने देश के कट्टरवादी इस्लामिक तत्वों के साथ नजदीकी रिश्ते कायम किए, जिसके तहत पंजाब और सिंध सूबों में व्याप्त जमात-ए-इस्लामी, तो उत्तरी इलाके में पश्तून देवबंदी जाति प्रमुख थी। उसी वक्त सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर चढ़ाई करने की भूल कर डाली, जिसने अमेरिका-पाकिस्तान गठजोड़ बनाने की राह प्रशस्त कर मौका दिया और सऊदी अरब का समर्थन प्राप्त कर इन्होंने अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ देवबंदी लड़ाकों की बहुलता वाले ‘जिहाद’ का ईजाद किया। साथ ही पाकिस्तान के वहाबी विचाराधारा वाले गुट भी अफगानिस्तान के उक्त ‘जिहाद’ में आ मिले। ठीक इसी वक्त आईएसआई ने जम्मू-कश्मीर के देवबंदी सोच वाले जमात-ए-इस्लामी को गांठकर जम्मू-कश्मीर में भी ‘जिहाद’ करने को उकसाया। लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद, दोनों ही देवबंदी विचारधारा पर चलने वाले और पश्चिमी विचारधारा के धुर विरोधी हैं। वे तालिबान के साथ अपना नजदीकी सैद्धांतिक नाता मानते हैं।

चूंकि बरेलवी तौर-तरीकों में इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद की लगभग पूजा-अर्चना की जाती है, इसलिए सऊदी अरब उन्हें ‘विधर्मी’ की तरह लेता है। जब भी मदीना या अन्य पवित्र इस्लामिक धार्मिक स्थलों पर कोई बरेलवी पूजा स्थल की तरह लेकर अर्चना करने लगे तो सऊदियों का कड़ा कोप झेलना पड़ता है। पाकिस्तानी अखबार ‘फ्राइडे टाइम्स’ के संपादक नज़म सेठी के अनुसार ‘पाकिस्तान में, खासकर बहुसंख्या वाले पंजाब प्रांत में, बरेलवी खुद को उस धार्मिक जुनून से उपजा बताते हैं, जिनका मकसद व्यावहारिक रूप में हजरत मोहम्मद के विचारों का प्रतिपादन करना तथा पैगम्बर और इस्लाम की ईश निंदा करने वालों को सबक सिखाना है।’ परिणामस्वरूप राजनीतिक आकांक्षा उन्मुख ‘तहरीक-ए-लब्बैक’-पाकिस्तान (टीएलपी) नामक कट्टरपंथी संगठन का उदय हुआ जो जल्द ही पाकिस्तानी सेना के गढ़ माने वाले पंजाब सूबे के शहरों और गांव-गांव में फैल गया और धार्मिक असहिष्णुता का प्रचार करने लगा।

तहरीक-ए-लब्बैक का पहला शिकार अासिया बीबी के नाम से मशहूर पंजाबी हिंदू महिला अासिया नौरीन बनी। उन पर इस्लाम और पैगम्बर की कथित ईश-निंदा का इल्जाम मढ़कर मुकदमा चलवाया और अदालत ने भी बेजा फैसला देते हुए मौत की सजा सुना डाली। हालांकि वर्ष 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त फैसले को उलट दिया था। लेकिन बीबी अासिया को फौरन कनाडा भागकर अपनी जान बचानी पड़ी। टीएलपी ने उस वक्त और शोहरत बटोर ली जब इसके एक समर्थक सुरक्षा गार्ड ने पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर को इसलिए मार डाला क्योंकि उसने अासिया बीबी को दोषमुक्त करने और छोड़ देने का समर्थन किया था। अब पाकिस्तानी पंजाब सूबे में टीएलपी का खासा राजनीतिक प्रभाव है। पिछले दिनों फ्रांस में हजरत मोहम्मद के प्रति दिखाए गए कथित अनादर के प्रतिकर्म में पाकिस्तान स्थित फ्रांसीसी राजदूत को निकाल बाहर करने के लिए तहरीक-ए-लब्बैक ने सूबे भर में जो प्रदर्शन-जूलूस आयोजित किए।

पाकिस्तान को यह अहसास होने लगा है कि केवल आस्था के दम पर पूरे देश को एकीकृत नहीं रखा जा सकता, विशेषकर विभिन्न वर्गीय मतांतरों के चलते। न तो पाकिस्तान के अंदर कम तीव्रता वाला संघर्ष चलाने वाले तहरीक-ए-तालिबान-ए-पाकिस्तान ने और न ही अफगानिस्तानी तालिबान नेतृत्व ने ड्यूरंड लाइन को बतौर अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा कभी मान्यता दी है।

भारत ने पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के साथ पर्दे-के-पीछे वाला संपर्क साधकर बढ़िया काम किया है। इसका एक मुख्य परिणाम समूची सीमा रेखा और जम्मू-कश्मीर में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति कायम रखने वाली संधि पर हस्ताक्षर किया जाना है। इसी बीच, अप्रत्याशित स्वभाव वाले प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत से कृषि उत्पाद आयात करने वाले उस प्रस्ताव को खारिज करवा दिया है, जिसका अनुमोदन उन्होंने पहले किया था। दुनिया ने इस बात पर गौर किया है कि पिछले हफ्ते सऊदी अरब में युवराज सलमान ने इमरान खान को मिलने का वक्त देने से पहले जनरल बाजवा से भेंट करने को तरजीह दी है। इसी तरह अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी अभी तक इमरान से व्यक्तिगत मुलाकात या फोन पर बात नहीं की है।

लेखक पूर्व राजनयिक हैं।

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