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जर्मन पनडुब्बी डील पर चीनी निगाहें

जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स जब तक भारत में थे, चीन की पूरी निगाहें रक्षा समझौतों पर टिकी हुई थी। चीन की चिंता एशिया-प्रशांत और साउथ चाइना सी में भारत की बढ़ती नेवल पॉवर को लेकर है। ‘प्रोजेक्ट 75-आई’ के नाम...

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जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स जब तक भारत में थे, चीन की पूरी निगाहें रक्षा समझौतों पर टिकी हुई थी। चीन की चिंता एशिया-प्रशांत और साउथ चाइना सी में भारत की बढ़ती नेवल पॉवर को लेकर है।

‘प्रोजेक्ट 75-आई’ के नाम से जाना जाने वाला यह समझौता अमल में आया तो भारत की रक्षा खरीद, अधिप्राप्ति (प्रोक्योरमेंट) में एक क्रान्तिकारी बदलाव लाएगा। पहली बार, इस डील में एक कॉम्प्रिहेंसिव डिज़ाइन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (टीओटी) शामिल है, जिससे छह टाइप 214 पारंपरिक सबमरीन पूरी तरह से मुंबई में मज़गांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड यार्ड में बनाई जा सकेंगी। जर्मन डील नौसेना के अगली पीढ़ी के ‘स्टील्थ’ बेड़े पर केंद्रित है। लेकिन, पनडुब्बियों की डील केवल जर्मनी तक सीमित नहीं है। भारत, फ्रांस के साथ तीन अतिरिक्त स्कॉर्पियों क्लास (कलवरी) सबमरीन के लिए 4.3 अरब डॉलर की डील अलग से फाइनल कर रहा है। मौजूदा जर्मन सरकार इस डील को रूसी सैन्य उपकरणों पर भारतीय निर्भरता से दूर करने और बाजार में पैठ बनाने के लिए एक रणनीतिक प्राथमिकता के रूप में देखती है। कुछ तकनीकी वजहों से लगभग फ़ाइनल हो चुकी ‘प्रोजेक्ट 75-आई’ डील की घोषणा नहीं की जा रही है।

फ्रीडरिष मैर्त्स की सत्तारूढ़ क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) एक मध्य-दक्षिणपंथी पार्टी है, जिसके साथ गठबंधन में क्रिश्चियन सोशल यूनियन (सीएसयू) और ओलाफ शॉल्त्स की मध्य-वामपंथी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) शामिल है। इसे जर्मनी में ‘काला-लाल गठबंधन’ कहते हैं। इस गठबंधन का उद्देश्य आर्थिक विकास और रक्षा खर्च बढ़ाना है। हालांकि, सामाजिक कल्याण के सवाल पर इनमें मतभेद हैं। भले ही मैर्त्स सरकार भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी का समर्थन करती हो, मगर जर्मनी में कुछ राजनीतिक दल, खासकर एसपीडी और ग्रीन्स, हथियारों के निर्यात पर सख्त पाबंदियों की वकालत करते रहे हैं, खासकर नाटो से बाहर के क्षेत्रों में।

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जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स जब तक भारत में थे, चीन की पूरी निगाहें रक्षा समझौतों पर टिकी हुई थी। चीन की चिंता एशिया-प्रशांत और साउथ चाइना सी में भारत ककी बढ़ती नेवल पॉवर को लेकर है। एडवांस्ड टाइप 214 सबमरीन डील को लेकर चीन की भृकुटि तनी हुई है। गत 31 जुलाई, 2025 को चीनी समाचारपत्र ग्लोबल टाइम्स की एक लीड खबर से उसकी चिंता समझी जा सकती है, जिसमें लिखा था, ‘भारत अगले हफ़्ते साउथ चाइना सी में युद्धपोत भेजने की योजना बना रहा है। ऐसा क़दम फिलीपींस के लिए समर्थन का ‘एक साफ़ संकेत’ है।’

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टॉप नौसैनिक शक्तियों में नंबर वन अमेरिका है। चीन दूसरे नंबर पर और तीसरे स्थान पर रूस है। उसके प्रकारांतर इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, और जापान हैं। भारत सातवां नौसैनिक शक्ति है। एडवांस्ड सबमरीन बनाने के लिए जर्मनी के साथ एक ऐतिहासिक समझौते पर साइन होने से भारत के रक्षा क्षेत्र को ज़बरदस्त बूस्टर डोज़ मिलने वाला है। ‘थाईसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स’, जर्मनी की सबसे बड़ी नौसैनिक जहाज निर्माता कंपनी है। थाईसेनक्रुप के साथ यह डील छह डीजल पनडुब्बियों के लिए है, जिन्हें एडवांस्ड कन्वेंशनल सबमरीन के नाम से जाना जाता है। तकनीकी ज़रूरतों में से एक यह है कि पनडुब्बियों में एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) टेक्नोलॉजी से लैस है, ताकि ऐसी पनडुब्बियां स्टील्थ क्षमता बढ़ाने के लिए ज़्यादा समय तक पानी के अंदर रह सकें।

लेकिन सवाल है कि भारतीय नौसेना के लिए टाइप 214 सबमरीन क्यों चाहिए? भारत और रूस की नौसेना के बीच पनडुब्बी प्रौद्योगिकी का लंबा और सफल इतिहास रहा है, जिसमें किलो-क्लास और अकुला-क्लास पनडुब्बियों का बड़ा योगदान है। रूसी पनडुब्बियां अक्सर अन्य पश्चिमी देशों की तुलना में अधिक किफायती रही हैं, जिससे भारत अपने रक्षा बजट के भीतर अपनी क्षमता बढ़ा सका। रूस ने भारत को परमाणु पनडुब्बियों को लीज पर देकर भारत की परमाणु पनडुब्बी क्षमता को बढ़ाने में मदद की है। फिर भी, यह नाकाफ़ी है।

यह पनडुब्बी जर्मनी के टाइप 214 डिज़ाइन पर आधारित है, जिसमें एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) टेक्नोलॉजी शामिल है। एआईपी सिस्टम अपने पनडुब्बियों को ऑक्सीजन के लिए बार-बार सतह पर आए बिना, पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन की तुलना में बहुत लंबे समय तक पानी के अंदर काम करने की अनुमति देते हैं। इसका मतलब है कि ऐसे सबमरीन दो हफ्ते, या उससे कहीं ज़्यादा समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं, जिससे स्टील्थ क्षमता बहुत बढ़ जाती है, और शत्रु की सेनाओं द्वारा पकड़े जाने की संभावना कम हो जाती है।

टाइप 214 सबमरीन एडवांस्ड मटीरियल का उपयोग करके बनाई गई हैं, जो सोनार डिटेक्शन से बचना आसान कर देते हैं। सोनार डिटेक्शन वह तकनीक है, जो पानी के नीचे वस्तुओं (जैसे पनडुब्बियां, मछली, समुद्री तल) का पता लगाने, नेविगेट करने, और उनका मानचित्रण करने के लिए ध्वनि तरंगों का उपयोग करती। टाइप 214 पनडुब्बियों सोनार डिटेक्शन को भी धोखा देने में सक्षम है। टाइप 214 सबमरीन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर न सिर्फ भारत की सबमरीन बनाने की क्षमता को बेहतर बनाएगा, बल्कि भविष्य के रक्षा प्रोजेक्ट्स के लिए भी ज़मीन तैयार करेगा। यह लोकल इंडस्ट्रीज़ को मज़बूत करेगा, रक्षा रिसर्च और डेवलपमेंट में नवाचार को बढ़ावा देगा। यह सहयोग भारतीय रक्षा निर्माण के क्षेत्र में भी भरोसा पैदा करेगा, भविष्य में जॉइंट वेंचर और एक्सपोर्ट के रास्ते खोल सकता है।

इस समझौते के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक, जर्मनी से भारत को टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर है। इसमें देरी की वजह भी इन्हीं बिंदुओं पर क्रमवार बातचीत है। इस वास्ते जर्मन चांसलर को अपने देश की संसद और सरकार में सहयोगी गठबंधन को भी भरोसे में लेना होगा। मंगलवार को जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स स्वदेश लौट गए। विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों पक्षों ने 19 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। रणनीतिक, आर्थिक और लोगों के बीच संबंधों में सहयोग को गहरा करने के उद्देश्य से कई नीतिगत घोषणाएं कीं। लेकिन, 800 अरब डॉलर की पनडुब्बी डील पर गहरी चुप्पी है।

इन सारे समझौतों में मास्टर स्ट्रोक कोई है तो वह है एडवांस्ड ‘टाइप 214 सबमरीन डील’। लेकिन उभयपक्षीय व्यापार का भी अपना महत्व है। जर्मन सरकार की 2030 तक लक्षित कुल 10 अरब यूरो की प्रतिबद्धता रियायती ऋण के रूप में होंगी, जिसमें से लगभग 5 अरब यूरो का निवेश पहले ही किया जा चुका है। जर्मनी, 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। द्विपक्षीय व्यापार पिछले कुछ वर्षों में 50 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 51.23 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। पिछले पांच वर्षों में जर्मनी में रहने वाले भारतीयों की संख्या दोगुनी होकर तीन लाख पर पहुंच गई है। इनमें लगभग 60,000 छात्र भी शामिल हैं। जर्मनी ने भारतीय पासपोर्ट धारकों के लिए वीजा मुक्त आवाजाही की घोषणा की है। लेकिन, क्या ‘प्रोजेक्ट 75-आई’ डील से अमेरिका को कोई दिक्कत नहीं है? यदि अमेरिकी क्लब का देश, रक्षा सौदे में रूस को रिप्लेस करे तो दिक्कत होनी नहीं चाहिए। पाकिस्तान, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसे हालत से गुज़रता रहेगा!

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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