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पाकिस्तान की हवाई ताकत में छिपा चीन का हाथ

चीन की रणनीतिक सोच है कि पाक को भारत के बराबर सैन्य ताकत हासिल करने की ज़रूरत नहीं है। उसे इतनी क्षमता दी जाए कि वह भारत को अपने पश्चिमी मोर्चे पर संसाधन लगाने के लिए मजबूर कर सके। ताकि...

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चीन की रणनीतिक सोच है कि पाक को भारत के बराबर सैन्य ताकत हासिल करने की ज़रूरत नहीं है। उसे इतनी क्षमता दी जाए कि वह भारत को अपने पश्चिमी मोर्चे पर संसाधन लगाने के लिए मजबूर कर सके। ताकि भारत से सीधा टकराव किए बिना दबाव बनाया जा सके।

मई 2025 के सैन्य टकराव ने भारत की एक पुरानी चिंता पर ध्यान और ज़्यादा केंद्रित करवा दिया कि असल लड़ाई के दौरान चीन और पाकिस्तान के बीच का सैन्य सहयोग गठजोड़ कैसा रहेगा? इसका जवाब ज़रूरी नहीं कि चीन द्वारा सीधे लड़ाई में शामिल होने में ही हो। इसकी अधिक परिणामी भूमिका पाकिस्तान की युद्धक्षेत्र का अवलोकन करने, जानकारी प्रोसेस करने व तेज़ी से कार्रवाई करने की क्षमता को मज़बूत करने में हो सकती है।

यह बात पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फ़ोर्स और पाकिस्तान एयर फ़ोर्स के बढ़ते सहयोग में साफ़ तौर पर दिखाई दे रही है। सालों तक, इस रिश्ते को मुख्य रूप से चीन द्वारा पाकिस्तान को दिए गए हथियारों और उपकरणों—जैसे कि जे-10सी, एयर-डिफ़ेंस सिस्टम, मिसाइलें और पायलट रहित हवाई वाहनों (ड्रोन)—के नज़रिए से देखा जाता था। आज सवाल यह नहीं है कि पाक के पास कितने चीनी लड़ाकू विमान या मिसाइलें हैं, बल्कि यह प्रश्न है कि क्या चीन पाकिस्तान को एक ऐसा सैन्य सिस्टम बनाने में मदद कर रहा है जो तेज़ी से फ़ैसला लेने में समर्थ और तेज़ी से हमला करने लायक हो।

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इस सोच की शुरुआत पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फ़ोर्स के बदलावों से हुई थी। वर्ष 1991 के खाड़ी युद्ध ने हवाई ताकत के बारे में चीनी सोच पर गहरा असर डाला। बीजिंग ने देखा कि अमेरिकी सैन्य श्रेष्ठता किसी एक लड़ाकू विमान या हथियार से नहीं आई थी। यह समर्था सैटेलाइट, हवा से आरंभिक चेतावनी देने वाले विमान, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, इंटेलिजेंस, कमांड नेटवर्क और सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों को एक साथ जोड़कर एक समन्वयक क्रियान्वयन तंत्र बनाने से मिली थी।

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जियांग ज़ेमिन के दौर में, ये सबक पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सूचना-आधारित प्रणाली की ओर अग्रसर हुए, यानी जानकारी में बढ़त और नेटवर्क से जुड़े ऑपरेशन ही युद्धक्षेत्र में असरदार होने का फ़ैसला करेंगे। नई रणनीति में हवाई ताकत को ज़्यादा अहमियत मिलने के साथ चीनी वायु सेना की संस्थागत स्थिति भी मज़बूत होती गई।

शी जिनपिंग के दौर में, यह बदलाव इंटीग्रेटेड मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस (जिसे चीन ‘इंटेलिजेंटाइज़ेशन’ कहता है) की ओर बढ़ा है: यानी युद्धक्षेत्र की जानकारी को प्रोसेस करने और फ़ैसला लेने की रफ़्तार बढ़ाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऑटोमेशन और एडवांस्ड कंप्यूटिंग का इस्तेमाल। चीनी हवाई ताकत का उद्भव जनरल शू किलियांग से बेहतर शायद ही किसी और अफ़सर की तरक्की में परिलक्षित होता हो। खुद एक फ़ाइटर पायलट और चीनी वायुसेना के पूर्व कमांडर रहे शू, केंद्रीय सैन्य आयोग के उपाध्यक्ष बनने वाले पहले सेवा-कालिक वायुसेना अफ़सर बने। वर्ष 2012 से 2022 के दौरान, चीन के सैन्य आधुनिकीकरण में हवाई ताकत की भूमिका और भी अहम हो गई।

पाकिस्तान के मामले में भी शू की भूमिका अहम है। वर्ष 2019 में कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद, उन्होंने पाकिस्तान का दौरा किया, जहां बातचीत में हवाई ताकत के क्षेत्र में सहयोग पर विशेष ज़ोर दिया गया। इसके बाद पाकिस्तान ने जे-10सी विमान खरीदने की प्रक्रिया तेज़ कर दी, जेएफ-17 कार्यक्रम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई और कई क्षेत्रों में चीन के साथ सहयोग बढ़ाया।

आज पाकिस्तान, चीन के बृहद सैन्य रूपांतरण का लाभार्थी है। जे-17 इस रिश्ते की गहराई और सीमाओं दोनों को दर्शाता है। पाकिस्तान ने एयरक्राफ्ट असेंबली, इंटीग्रेशन, मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल में काफ़ी क्षमताएं विकसित की हैं, वैसे पाक कई अहम तकनीकों के लिए चीन पर निर्भर है, जिनमें एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, हथियार और ख़ास मैटेरियल जैसे ज़रूरी इनपुट शामिल हैं।

‘प्रोजेक्ट अज़्म’ का हश्र एक सबक है। 2017 में पांचवीं पीढ़ी का स्वदेशी फ़ाइटर जेट बनाने के मक़सद से शुरू की गई इस परियोजना की रफ़्तार बाद में धीमी पड़ गई। ऐसे प्रोजेक्ट के लिए आवश्यक तकनीकी गहराई, संसाधन और समय बहुत ज़्यादा चाहिए थे। इसकी बजाय, ध्यान आधुनिक चीनी प्रणालियां हासिल करने और उनसे जुड़े नेटवर्क को मज़बूत करने पर केंद्रित हो गया।

एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट में पाक द्वारा किया गया निवेश इसका एक और उदाहरण है। अवाक्स प्रणाली राडार की रेंज बढ़ाती है, ट्रैक बनाती और कायम रखती है, तथा फ़ाइटर जेट्स के बीच तालमेल बैठाकर हवाई युद्ध का वृहद परिदृश्य बनाने में मदद करती है।

ड्रोन इसमें एक और परत जोड़ते हैं। पाकिस्तान तुर्की और घरेलू स्तर पर बनाई प्रणालियों के साथ-साथ चीनी विंग लूंग और सीएच-सीरीज़ के ड्रोन इस्तेमाल करता है। निगरानी और हमले के अलावा, ये मानवरहित प्रणालियां बतौर डिकॉय (धोखा देने वाले), आसमान में लटकते विस्फोटक और इलेक्ट्रॉनिक-वॉरफेयर प्लेटफ़ॉर्म के तौर पर भी काम कर सकती हैं। यहां तक कि सस्ते ड्रोन दुश्मन को रडार चालू कर अपनी रक्षात्मक स्थिति उजागर करने या बहुत महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलें व्यर्थ ख़पाने को बाध्य कर सकते हैं।

चीनी मदद से पाक ने अपनी रिमोट-सेंसिंग क्षमताओं का तेज़ी से विस्तार किया है, जिसमें ऑप्टिकल और सिंथेटिक-अपर्चर-रडार सैटेलाइट शामिल हैं। सितंबर 2025 में चीनी कमर्शियल स्पेस कंपनी ‘पाईसैट’ के साथ हुआ समझौता, जिसमें एक बड़ी राडार-इमेजिंग कॉन्स्टेलेशन (उपग्रह समूह) की योजना शामिल है, इस बात की गवाही देता है। ये निवेश एक ही मक़सद की ओर इशारा करते हैं : युद्धक्षेत्र की यह स्पष्ट और निरंतर तस्वीर पाने की क्षमता कि दुश्मन की सेनाएं कहां-कहां हैं, क्या हरकत हो रही है, कौन सी प्रणालियां सक्रिय हैं और आगे क्या होगा। वर्ष 2020 में पाक वायुसेना द्वारा ‘सेंटर फ़ॉर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एंड कंप्यूटिंग’ की स्थापना बेहद अहम है। यह युद्धक्षेत्र की जानकारी को तेज़ी से प्रोसेस कर सकती है और लक्ष्य साधने के समय को कम कर सकती है।

पारंपरिक मिलिट्री ‘किल चेन’ में टारगेट का पता लगाना, उसे लॉक करना और ट्रैक करना, हमला कैसे करना है यह तय करना, हमला करना और नतीजे का आकलन शामिल होता है। सेंसर, कमांड नेटवर्क और हथियारों को एक साथ जोड़ देने पर इस प्रक्रिया में लगने वाला समय काफ़ी कम हो जाता है—जिसे ‘किल-चेन कम्प्रेशन’ कहते हैं। बहु-सेंसर प्रणाली को बहु-आघातीय प्रणाली से जोड़ने पर यह तंत्र ‘किल वेब’ की तरह काम करने लगता है।

चीनी और पाकिस्तानी वायुसेना के बीच होने वाले ‘शाहीन’ अभ्यास इसलिए अहम हैं क्योंकि इस किस्म के आयुध केवल ख़रीदने से काम नहीं बनता, इनका संयुक्त अभ्यास करना ज़रूरी है। 2011 से ‘शाहीन’ अभ्यास का दायरा बढ़ा है; पहले यह सामान्य एयर-कॉम्बैट ट्रेनिंग थी, लेकिन अब इसमें फ़ाइटर जेट, एयरबोर्न अर्ली वार्निंग, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, एयर डिफेंस और कमांड-एंड-कंट्रोल जैसे जटिल ऑपरेशन शामिल हैं। अत: इससे चीनी ऑपरेशनल कॉन्सेप्ट्स के बाबत भी पाकिस्तान को गहरी जानकारी मिली है।

पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के पूर्व सीनियर इंटेलिजेंस अधिकारी जनरल शियोंग गुआंगकाई ने एक बार पाक को ‘चीन का इस्राइल’ कहा था। दरअसल, पाक एक भौगोलिक और सैन्य रूप से सक्षम पार्टनर है, जिसकी भारत से दुश्मनी चीन को रणनीतिक फ़ायदा पहुंचाती है। यह चीन के ‘यि शियाओ झी दा’ सिद्धांत की याद दिलाता है—यानी बड़े को रोकने के लिए छोटे का इस्तेमाल करना, यानी पाक को इस लायक बनाना कि वह भारत को अपने पश्चिमी मोर्चे पर लगातार ध्यान और संसाधन लगाने के लिए मजबूर कर सके। यही कारण है कि मई 2025 के भारत-पाक टकराव में चीन की तरफ से पाकिस्तान को दी गई ख़ुफ़िया जानकारी, उपग्रह प्रदत्त सूचना और तकनीकी मदद पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

लेखिका रक्षा मामलों की विशेषज्ञ हैं।

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