‘द लैंसेट’ पत्रिका के एक अध्ययन में जापान के बच्चे सबसे अधिक स्वस्थ पाए गए। इसका श्रेय निश्चय ही उनके स्वास्थ्यवर्द्धक आहार एवं चुस्त दिनचर्या को जाता है। पाठशाला जाने के लिए बस की अपेक्षा वे पैदल चलना ज्यादा पसंद करते हैं।
नन्हे कंधों पर भारी-भरकम बस्ता, उनींदी आंखों में शत-प्रतिशत अंक पाने की जद्दोजहद, डिजिटल संसाधनों पर सर्च में जुटी नाज़ुक उंगलियां, कुल मिलाकर यह परिदृश्य है आधुनिक युग का, जिसने न केवल बचपन की सहजता छीन ली है बल्कि बच्चों को खेलकूद के मैदानों से भी दूर कर डाला है। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन हेल्थ सीएस मॉट चिल्ड्रन हॉस्पिटल के सर्वेक्षणानुसार, प्रत्येक 10 में से 1 बच्चा सप्ताह में एक बार भी बाहर खेलने नहीं जाता। इसमें प्रमुख कारण है, बढ़ता स्क्रीनटाइम। स्कूली पढ़ाई के पश्चात ट्यूशन की भागम-भाग में इतना समय ही कहां मिलता है, जो बच्चों में बाहर जाकर खेलने की ललक शेष रहे? इसी कारण आजकल अधिकतर बच्चे आउटडोर खेल खेलने की बजाय सोशल मीडिया खंगालना अथवा ऑनलाइन गेम्स खेलना अधिक पसंद करते हैं।
अपनी अति व्यस्तता अथवा बच्चों को चोट लगने के भय से अनेक माता-पिता भी बच्चों को खेलने के लिए बाहर भेजने से गुरेज़ करते हैं। कुछ अभिभावकों को लगता है कि खेलकूद में समय बिताने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी, जबकि विशेषज्ञों के कथनानुसार, नियमित रूप से खेलना-कूदना बच्चों की स्मरणशक्ति बढ़ाता है। उनमें कड़ी मेहनत तथा समर्पण की भावना विकसित होती है, जिससे वे पढ़ाई में सर्वोत्तम परिणाम देने के साथ अपने नियमित कार्य भी अधिक कुशलतापूर्वक कर पाते हैं।
गहनतापूर्वक जांचें तो खेलकूद अपने आप में सर्वोत्तम व्यायाम है। मांसपेशियां मजबूत बनाने, रक्त संचार बेहतर करने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने तथा संक्रामक रोगों से बचाव करने के साथ ये अच्छी नींद लाने में भी मददगार बनते हैं। छोटी आयु से ही खेलों में भाग लेने से जहां शारीरिक पुष्टता बढ़ती है वहीं टीम वर्क, अनुशासन, सहनशीलता, सुनने-दूसरे का दृष्टिकोण समझने, समझौता करने जैसे आवश्यक गुण भी विकसित होते हैं। खेलने-कूदने से आत्मविश्वास बढ़ता है, संचार शैली सशक्त होती है। बच्चे दूसरों के समक्ष खुलकर अपनी बात रखना सीख जाते हैं।
खेल बच्चों को आत्मनिर्भरता, दृढ़ता तथा बारी-बारी से काम करने का कौशल बढ़ाने में तो सक्षम बनाता ही है, व्यक्तिगत भावनाएं समझने तथा प्रबंधित करना सीखने के लिए भी उन्हें एक सुरक्षित स्थान प्रदान करता है। इससे जहां लचीलापन अपनाने तथा दूसरों के प्रति सहानुभूति रखने में सहायता मिलती है, वहीं रचनात्मकता व कल्पनाशीलता को भी अपेक्षित विस्तार मिलता है। खेलकूद नशे जैसी बुराइयों से दूर रखने में सहायक सिद्ध होते हैं।
‘द लैंसेट’ पत्रिका के एक अध्ययन में जापान के बच्चे सबसे अधिक स्वस्थ पाए गए। इसका श्रेय निश्चय ही उनके स्वास्थ्यवर्द्धक आहार एवं चुस्त दिनचर्या को जाता है। पाठशाला जाने के लिए बस की अपेक्षा वे पैदल चलना ज्यादा पसंद करते हैं। अपना कार्य स्वयंमेव निपटाना उनकी आदत में शामिल है, जबकि इस संदर्भ में भारत के बहुतेरे बच्चों की स्थिति कमोबेश विपरीत ही मिलेगी।
आधुनिक बच्चों में संवेदना दिनों-दिन कम हो रही है, वे नाकामी का सामना नहीं कर पाते, उनकी प्रॉब्लम सॉल्विंग क्षमता घट रही है; बाल मनोचिकित्सक इन सबके पीछे परिवर्तित जीवनशैली को मुख्य दोषी ठहराते हैं। समस्यायों से छुटकारा देश के शीर्ष संगठनों में शामिल ‘एडुस्पॉट्स’ की एक हेल्थ एवं फिटनेस स्टडी के अनुसार, देश में स्कूली बच्चों-किशोरों का स्वास्थ्य एवं फिटनेस का स्तर लगातार गिर रहा है। कम उम्र बच्चे भी मधुमेह, अस्थमा जैसी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। देश के ताज़ा आर्थिक सर्वेक्षण के तहत, 2020 के दौरान भारत में 3.3 करोड़ से अधिक बच्चे मोटापे के शिकार थे। 2035 तक आंकड़ा 8.3 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। शारीरिक सक्रियता का अभाव बच्चों का दैहिक लचीलापन कम कर रहा है। ऐसी स्थिति में उनका बाहर निकलकर खेलना और भी महत्वपूर्ण बन जाता है।
जॉयस मेयर ने कहा है, ‘हम अपने परिवार को जो सबसे सुंदर तोहफ़ा दे सकते हैं, वह है ख़ुद की अच्छी सेहत।’ अभिभावकों के लिए ज़रूरी है कि समय निकालकर बच्चों को प्रतिदिन कम से कम तीस मिनट के लिए साइकिलिंग, रनिंग, जंपिंग आदि गतिविधियों का हिस्सा अवश्य बनाएं। मॉट पोल की सह-निदेशक सारा क्लार्क के मुताबिक़ पेड़ पर चढ़ना, साइकिल चलाना या झूले से फिसलना बच्चों के विकास के लिए अनिवार्य है। खेल के दौरान लगी छोटी-मोटी चोटें, दरअसल, बच्चों को समूचे तौर पर मज़बूत बनाने का कार्य करती हैं। इनसे आत्मविश्वास, सहनशीलता और समस्या सुलझाने की क्षमता बढ़ती है। तुलनात्मक तौर पर बीते बीस-पच्चीस वर्षों का जायज़ा लें तो शहरों का भूगोल काफी हद तक बदल चुका है, पहले की भांति बच्चों के खेलने के लिए अधिक स्थान उपलब्ध नहीं। ऐसे में विद्यालयों का दायित्व भी बढ़ जाता है कि शारीरिक शिक्षा पीरियड के तहत वे रोज़ाना एक-आध घंटा बच्चों के खेलने हेतु अवश्य सुनिश्चित करें।
वास्तव में खेल बच्चों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। खेलकूद से ही बचपन खिलता है, बच्चों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का आत्मबल मिलता है। प्रश्न समग्र विकास का है, क्यों न आभासी संसार में डूबे बच्चों का रुख़ खुले मैदानों की तरफ़ मोड़ा जाए, जहां उन्मुक्त सांस लेते हुए वे अपने व्यक्तित्व को सम्पूर्णता दे पाएं?

