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विश्व व्यवस्था में रणनीतिक उलझाव पर बदलता नजरिया

रणनीतिक अस्पष्टता कभी वक्त निकालने का तरीका था जिससे तनाव घ्ाटाया जा सके। ताकि इतिहास अपना काम कर सके। यह स्थायित्व में भी मददगार थी। लेकिन मौजूदा बिखरावपूर्ण विश्व व्यवस्था में, यह फैसले टालने, जवाबदेही बगैर सहनशक्ति परखने व तथ्य...

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रणनीतिक अस्पष्टता कभी वक्त निकालने का तरीका था जिससे तनाव घ्ाटाया जा सके। ताकि इतिहास अपना काम कर सके। यह स्थायित्व में भी मददगार थी। लेकिन मौजूदा बिखरावपूर्ण विश्व व्यवस्था में, यह फैसले टालने, जवाबदेही बगैर सहनशक्ति परखने व तथ्य बदलने का जरिया है। यह अस्पष्टता अचानक विफल नहीं हुई बल्कि जानबूझकर की गयी।

दशकों तक, रणनीतिक अस्पष्टता को समझदारी की तरह लिया जाता था, समय निकालने का तरीका, तनाव घटाएं और इतिहास को अपना काम करने दें। एक अधिक संतुलित दुनिया में, इसने स्थायित्व बनाने का काम किया। मौजूदा बिखरावपूर्ण विश्व व्यवस्था में, यह फैसला टालने, जवाबदेही बगैर सहनशक्ति परखने व तथ्य बदलने का जरिया है। जो उपाय कभी शांति कायम रखता था, आज अनिश्चितता बढ़ा रहा है। परिणाम है नियंत्रित विचलन। अस्पष्टता अचानक विफल नहीं हुई; जानबूझकर की गयी।

अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था ने शनै:-शनै: संयम को चुप्पी मानना सीख लिया। मुश्किल सवाल अनुत्तरित छोड़ दिए गये, सीमाएं अस्पष्ट और समयसीमा अनिर्धारित बनी रहीं। असमान महत्वाकांक्षा और अवसरवादी संशोधनवाद के युग में, अस्पष्टता सुरक्षा कवच की बजाय बोझ बन गई, जिसका दोहन वे करते हैं जिन्हें देरी करते जाने से फायदा है और भुगतना उन्हें पड़ता है जो विश्व व्यवस्था का पालन करने पर निर्भर रहते हैं। रणनीतिक अस्पष्टता की शुरुआत टालमटोल के तौर पर नहीं हुई थी। इसका मकसद था इरादे परखना और तालमेल बनने देना। यह कारगर रहा क्योंकि यह पारस्परिक आधार पर था और इसमें संतुलन शामिल था। समय के साथ, दोहराव ने इसे खोखला कर डाला। एक अस्थायी उपाय वह प्रवृत्ति बन गया;जिसका उद्देश्य नीयत स्पष्ट करना था, वह यथास्थिति की धीरे-धीरे, हिसाब-किताब लगाकर समाप्ति का तरीका बन गया।

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जब अस्पष्टता असमानता हो जाए : अनिर्धारित सीमाओं से इतर इसकी मिसाल कहीं इतनी साफ दिखाई नहीं देती। बहुत ऊंचाई वाले इलाकों में, नीति का मोल विरल हवा और जमी बर्फ में मापा जाता है। सबसे पहले नागरिकों को भुगतना पड़ता है, मसलन,कोई चरवाहा किसी रोज पाए कि एक गैर-मान्यताप्राप्त बाड़बंदी ने पीढ़ियों पुरानी उसकी चरागाह छीन ली या जब कोई ग्रामीण पाए कि पुरखों से चला रहा उसके क्षेत्र का नक्शा रात में खामोश सैनिक गश्त से पुनर्निधारित कर दिया गया। दूर समुद्र में , मछुआरों का यह पाना कि उनकी आजीविका रातोंरात अपराध बन गयी, इसलिए नहीं कि नक्शों की लकीरें सार्वजनिक रूप से पुन: खींची गईं, बल्कि इसलिए कि वे जानबूझकर अस्पष्ट छोड़ दी थी।

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ऐसी सीमाओं पर, सैनिक अनिश्चितता को जीवन का अंग मानकर जीते हैं। वे उसी ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर चलते हैं, मामला निबटा देने की बजाए संयम बरतते हैं। जब अस्पष्टता पककर टकराव में बदल जाती है, तब उन्हें राजधानियों में अनिर्णय से पैदा जोखिम संभालने के लिए मानव बारूदी सुरंगों के रूप में आगे कर दिया जाता है।

लीक बदलने की लोकतांत्रिक कीमत : लंबे समय तक जारी अस्पष्टता की कीमत समान रूप से नहीं झेलनी पड़ती। लोकतंत्र बहसों और जवाबदेही के जरिये अनिश्चितता को जज़्ब करते हैं। संशोधनवादी व्यवस्थाएं छद्म रूप से अस्पष्टता चलाती हैं। असमान संदर्भों में, अस्पष्टता सबसे मज़बूत पक्ष का भरोसेमंद साथ निभाती है। लीक में बदलाव असमान लागत लागू करता है और औपचारिक पसंद के बगैर, अंश-वार बदलाव बनाता है। ऐसी स्थितियों में, स्पष्टता टकराव नहीं बढ़ाती ; यह लोकतांत्रिक स्वच्छता है।

नियम कौन लिखता है : जब लोकतंत्र प्रारूप बनाने को टालते हैं, तो वे मूल स्वरूप खो देते हैं। नियम सहमति से नहीं, बल्कि बारंबार प्रक्रिया से बदलते हैं। अस्पष्टता विकल्पों का तबतक क्षरण करती जाती है जबतक कि सिर्फ़ एक ही बचे। एक सदी से भी पहले, लॉर्ड कर्ज़न ने पाया था कि सीमाओं को तय करने के बजाय उन्हें अनिर्धारित छोड़ देने से लाभ ज़्यादा होता है। उनकी यह अंतदृष्टि फायदा उठाने की गर्ज से थी। अस्पष्टता उस हित में है जो नक्शे को परिवर्तनीय और वक्त को हथियार की तरह बरतता है।

समय सीमाओं का टकराव -2035 और 2047 : वह तर्क अब मद्धिम पड़ रहे वापसी बिंदु पर पहुंच चुका है। स्थिरता अब अनकही बातों पर और निर्भर नहीं रह सकती; यह योजनाबद्ध होनी चाहिए। जल्दबाज़ी तारीखों के टकराव से चालित है। चीन ने वर्ष 2035 को राष्ट्रीय कायाकल्प की समय-सीमा तय किया है। जबकि भारत का संकल्प साल 2047 तक है, जोकि आज़ादी का शताब्दी वर्ष है। बीच के दशकों को दूसरे की समयसीमा के हवाले करके कोई भी एक पक्ष ताकत का सभ्यतागत मील पत्थर हासिल नहीं कर सकता। जब एक पक्ष दशकों की योजना बना रहा हो और दूसरे की प्रतिक्रिया टुकड़ों में हो, तो अस्पष्टता तटस्थ नहीं रहती; यह महत्वाकांक्षा घटाने वाली बन जाती है।

समय अब क्यों मायने रखता है : याेजनाबंदी को समयबद्ध अनुशासन की जरूरत होती है। समय सीमा वाली रूपरेखा टाल-मटोल के फायदों को उलट देती है। एक बार जब सीमा व समय तय हो जाए, तब संयम को औचित्य की और अधिक जरूरत नहीं रहती; उल्लंघन को पड़ती है। व्यावहारिक रूप से, यह तर्क इशारा करता है एक दीर्घ-कालिक,समय-सीमाबद्ध, महीनों में नहीं बल्कि दशकों में मापी जाने वाली रूपरेखा, वह जो समस्या के निबटारे में देरी वाले यथास्थिति उपाय को ठंडे बस्ते में डाल देने वाली, अधिक संतुलित घड़ी हो। 15 से 20 साल वाला क्षितिज रखना स्थायित्व को रियायत नहीं है; यह संरचना के साथ धैर्य को पुष्ट करना है। यह संवाद की पूर्व-बंदी या एकतरफा बदलावों को वैधता दिए बगैर, अस्पष्टता को दायित्व में और टालमटोल को जवाबदेही में रूपांतरित करना है। एक तयशुदा अवधि के लिए यथास्थिति बनाना बड़े लाभार्थी को उसके फायदे से वंचित करता है और शांत रहकर गतिविधि करने की बजाय जानबूझकर किए काम से संशोधनवाद को सतह पर आने पर मजबूर करता है। समय, जिसे कभी शक्तिशाली पक्ष हथियार की तरह बरतते रहे, तब एक बाधा बन जाएगा। या तो धैर्य महत्वाकांक्षा में देरी करवा देगा या फिर उल्लंघन इरादे को उजागर कर देगा।

रूपरेखा बनाना टकराव वृद्धि नहीं : यह एक ऐलान है। सोचसमझकर किया गया वह कार्य जिसके जरिये एक लोकतंत्र स्पष्ट व सरेआम ऐलान करता है कि अब किस मुद्दे पर बातचीत नहीं होगी, किस की पुनर्समीक्षा की जाएगी, और वह क्या है जिसके परिणाम झेलने होंगे। प्रारूप बनाने का अभिप्राय अपना रुख सख्त बनाना नहीं ; यह नैतिक पलायन को समाप्त करना है जिसका पोषण अस्पष्टता करती है।

संयम से जिम्मेदारी तक : एक समयबद्ध प्रारूप शांति को तजता नहीं, जिम्मेदारी बहाल करता है। जब सीमाएं खींच दी जाएं व वक्त तय किया जाए, तब संयम को बहाने की और जरूरत नहीं रहती। नैतिकता का बोझ निर्णायक रूप से बदल जाता है, उस राज्य पर नहीं होता, जो अपनी लीक पर कायम है, बल्कि उस पर जो उल्लंघन करे। स्पष्टता उकसावा नहीं, जबावदेही है।

रणनीतिक प्रतीक्षा का अंत : कभी अस्पष्टता संतुलन के लिए काम की चीज़ थी। आज, यह उन लोगों का फायदा करती है जो मामला टालने से लाभ लेते हैं। रूपरेखा फिर से बनाने का मतलब टकराव चुनना नहीं;यह खुद की रूपरेखा बनाने की बात है। जो सभ्यताएं अपनी शर्तों को परिभाषित करने से इंकार करें, वे शांति सहेजकर नहीं रख पातीं;वे अपने भविष्य दूसरों के हवाले कर देती हैं। व्यावहारिक रूप से, ऐसे प्रारूप का स्वरूप है एक कूटनीतिक ठहराव, एक समयबद्ध यथास्थिति कायम रखना या तय अंतराल पर घोषित दायरे की पुनर्समीक्षा,जो संयम को धैर्य की मुद्रा से दायित्व के प्रारूप में बदल दे।

संयम अपना नैतिक अधिकार तब खो देता है जब वह ज़बरदस्ती चलाए। संवाद अपनी आत्मा तब खो देता है जब वह एकतरफ़ा फायदे को छिपाने वाला बन जाए। टालमटोल करते जाना अब सुरक्षा पाने का उपाय नहीं रहा; यह तो केवल जोखिम को शृंखला में निचली ओर धकेलना है, किसी चरवाहे, गश्ती दल या सैनिक पर। सुन त्ज़ू ने अस्पष्टता को धोखाधड़ी से जोड़ा था। चाणक्य ने चेताया था कि देरी करने से राज्य हाथ से निकल जाता है। क्लॉज़विट्ज़ हमें याद दिलाते हैं कि हिचकिचाहट दुश्मन को पहल का मौका दे देती है। रणनीतिक इंतज़ार का युग बीत चुका है। आगे जो कुछ भी होगा, या तो योजनाबद्ध ढंग से बनेगा या खुद ही खो जाएगा।

लेखक सेना की पश्चिमी कमान के पूर्व कमांडर एवं पुणे इंटरनेशनल सेंटर के संस्थापक ट्रस्टी हैं।

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