भारत-अमेरिकी रिश्तों की चुनौतियां

भारत-अमेरिकी रिश्तों की चुनौतियां

पुष्परंजन

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जो बाइडेन के शपथ वाले मंच पर एक मंगोल चेहरे को जिसने भी देखा, हैरान हुआ था। यह ताइवानी दूत एच. पी-खि़म थीं, जो पेइचिंग की आंखों की किरकिरी बन गयी थीं। ताइवान को स्वतंत्र देश के रूप में देखना, चीन की वन चाइना पॉलिसी को चुनौती देने से कम नहीं है। भारत खुलकर ख़म नहीं ठोकता, मगर इस बार जो बाइडेन ने 40 साल बाद ऐसा कर दिखाया। 1979 में प्रेसिडेंट जिम्मी कार्टर ने ताइवान से कूटनीतिक संबंध तोड़ लिये थे। उसके बाद से अमेरिकी संसद में ताइवान के किसी दूत को जाना भी होता तो उसे बतौर सांस्कृतिक-आर्थिक प्रतिनिधि टिकट लेकर प्रवेश करना होता है। चालीस साल बाद जो बाइडेन प्रशासन द्वारा ऐसे बदलाव को चीन पचा नहीं पाया। ताइवानी दूत पी-खि़म ने कैपिटल हिल से एक वीडियो क्लिप जारी कर कहा कि हमें चाहिए आज़ादी।

ताइवान में डीपीपी (डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी) की नेता मैडम त्साई इंग-वेन शासन प्रमुख हैं, जिन्होंने ट्वीट के ज़रिये जो बाइडेन से चुनाव से पहले और चुनाव के बाद भी संपर्क बनाये रखा है। जो बाइडेन उनके हर ट्वीट का जवाब देते हैं तो चीन का रक्तचाप बढ़ जाता है। मगर, इस बार चीन ने अपना गुस्सा दूसरे तरीके से प्रकट किया। चीन ने अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री माइक पोंपियो, पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन समेत ट्रंप शासन के समय रहे 28 अधिकारियों को प्रतिबंधित किया है। चीन ने यह भी आदेश जारी किया कि इन लोगों से प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष बिजनेस करने वाले लोग अपना कारोबार हांगकांग समेत चीनी आधिपत्य वाले इलाकों से समेट लें।

प्रतिबंध लगाने का यह सिलसिला केवल चीन तक सीमित नहीं है। ईरान इनसे चंद क़दम आगे निकल गया। इस्लामी गणतंत्र ईरान ने एक आदेश के ज़रिये ट्रंप, माइक पोंपियो, पूर्व रक्षामंत्री मार्क स्पर, पूर्व वित्त मंत्री स्टीवेन मनोचेन, पूर्व एनएसए जॉन बोल्टन समेत पेंटागन व सीआईए के सीनियर अधिकारियों पर प्रतिबंध आयद किये जाने का ऐलान किया है। ऐसे प्रतिबंध का मतलब क्या होता है? क्या इन दोनों मुल्कों को ऐसा लग गया कि जो बाइडेन बहुत ज्यादा छूट चीन और ईरान को नहीं देने वाले?

ईरान को अब भी उम्मीद है कि जो फैसला बराक ओबामा के समय ‘फाइव प्लस-वन’ (सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्य साथ में जर्मनी) ने लिया था, उसकी वापसी होगी। स्विट्ज़रलैंड के लोज़ान में 2 अप्रैल 2015 को नाभिकीय समझौते पर मुहर लगी थी। 20 जुलाई 2015 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के प्रस्ताव संख्या 2231 के आधार पर इसे स्वीकार किया गया था। ‘जेसीपीओए’ स्वीकार करते ही दुनिया ने राहत की सांस ली थी। यह सोचकर कि पश्चिम एशिया में शांति व खुशहाली की वापसी होगी। इस प्रयास की वजह से पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की विश्व भर में तारीफ़ हुई थी। 2016 में ईरान ने जेसीपीओए (ज्वाइंट कंप्रेहेंसिव प्लान एक्शन) पर अमल करना आरंभ कर दिया था।

कुछ विचित्र-सा लगता है कि जिस संधि को पटरी पर लाने के वास्ते फाइव प्लस वन देशों को बरसों लग गये, ट्रंप ने सिर्फ़ एक ट्वीट के ज़रिये ध्वस्त कर दिया। 8 मई 2018 को ट्रंप ने इसे रद्द कर ईरान पर प्रतिबंध आयद कर दिया। ईरान इतना भड़का हुआ था कि उसने 7 जुलाई, 2019 को ऐलान कर दिया कि हम यूरेनियम संवर्द्धन के 3.67 प्रतिशत ग्रेड को अब बढ़ाने जा रहे हैं। इस प्रतिबंध का प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव भारत के तेल आयात पर पड़ा। बात इतनी दूर तलक गई कि आज चीन इस्तांबुल-तेहरान-इस्लामाबाद-शियान रेल परियोजना का हिस्सा बन चुका हैै। चीन ने ट्रंप की हठधर्मिता का फायदा उठाया और इस इलाके की भू-सामरिक स्थिति पलट कर रख दी।

प्रेसिडेंट जो बाइडेन जिस अंदाज़ में ट्रंप के फैसले को एक-एक कर पलट रहे हैं, उससे दक्षिण-पश्चिम एशिया में उम्मीदों की नयी किरण फूटने लगी है। मगर, इससे बहुत भावुक होने की आवश्यकता नहीं है। नामित अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन सीनेट में विदेश मामलों की समिति के समक्ष जो बयान दे रहे हैं, उससे लगता नहीं है कि ट्रंप की चीन और ईरान संबंधी नीतियों को एकदम से उलट-पुलट देंगे। ट्रंप ने जाने से पहले यह बयान दिया था कि चीन उईगुर मुसलमानों का संहार कर रहा है। इससे ब्लिंकन बिल्कुल इत्तेफाक़ रखते हैं।

ट्रंप जिस तरह से भारत की सक्रियता एशिया-प्रशांत में चाहते थे, लगता नहीं कि इन नीतियों में कोई बड़ा बदलाव होना है। इस इलाके में चीन को काउंटर करने के वास्ते भारत को समर्थन की आवश्यकता पड़ेगी, यह तस्वीर कुछ हफ्तों में शायद साफ हो जाएगी। अमेरिका के लिए साउथ चाइना सी और पूर्वी एशिया केंद्रित कूटनीति की कई वजहें हैं। पहली वजह, एशिया-प्रशांत के इलाके में एक-तिहाई व्यापार दक्षिण चीन सागर के बरास्ते होता है। दूसरी वजह, दक्षिण-पूर्व एशिया के दस देशों का संगठन ‘आसियान’, 66 करोड़ 11 लाख आबादी का प्रतिनिधित्व करता है और 9.727 ट्रिलियन डॉलर की मुक्त व्यापार अर्थव्यवस्था है। भारत आसियान का चौथा बड़ा व्यापारिक साझीदार है। प्रशांत पारीय पार्टनरशिप ‘टीपीपी’ में भारत की साख़ बनी है, यह अमेरिकी रणनीतिकार अच्छे से महसूस करते हैं।

इस इलाके से बाहर निकलें तो दक्षिण एशिया में मालदीव, अफग़ानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल जैसे देश सामने हैं। जो बाइडेन स्वयं चाहेंगे कि भारत, चीन की ‘वन बेल्ट वन रोड‘ के अश्वमेध घोड़े को रोकने के साथ-साथ, वैक्सीन कूटनीति में चीन को काउंटर करे। चीन की वैक्सीन कूटनीति अफ्रीका और पश्चिम एशिया में पांव जमा चुकी है, उसे हिलाने-डुलाने के वास्ते भारत के पास टीके की उपलब्धता उस मात्रा में नहीं है, इस ज़मीनी सच को स्वीकार करना चाहिए। मगर, बात कूटनीतिक-वैचारिक समानता की आ जाती है। सर्वविदित है कि ह्यूस्टन से लेकर अहमदाबाद के मंच तक क्या हुआ था? उस कथा को बार-बार बांचने की आवश्यकता नहीं है। बराक ओबामा तो लगभग बिसार दिये गये थे। अब बराक कूटनीति की थोड़ी-बहुत छाप बाइडेन के फैसलों में दिखेगी, इस संभावना को नकार नहीं सकते।

किरकिरी कहां हुई है? कमला हैरिस ने 370 हटाने और कश्मीर के पुनर्गठन की निंदा की थी। 18 दिसंबर, 2020 को कैपिटल हिल में अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ जो बैठक निर्धारित थी, उसे भारतीय विदेश मंत्री ने रद्द कर दिया था। वजह, कांग्रेसनल प्रोग्रेसिव कॉकस की प्रमुख प्रमिला जायपाल थीं। 6 दिसंबर, 2020 को डेमोक्रेट सांसद प्रमिला जायपाल 370 के विरुद्ध निचले सदन में प्रस्ताव ला चुकी थीं, जो सीनेट तक नहीं पहुंचा। अमेरिका का नया निज़ाम अपनी पार्टीगत नीतियों पर क़ायम रहेगा, यह तो दिखता है, मगर भारत अपने आपको बदली परिस्थितियों में कैसे फिट करता है, यह बड़ा सवाल है।

लेखक ईयू-एशिया न्यूज़ के नयी दिल्ली संपादक हैं।

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