आतंकवाद को मुहैया धन रोकने में चुनौतियां : The Dainik Tribune

आतंकवाद को मुहैया धन रोकने में चुनौतियां

आतंकवाद को मुहैया धन रोकने में चुनौतियां

मनोज जोशी

मनोज जोशी

पिछले सप्ताहंत भारत ने ‘आंतक के लिए कोई धन नहीं’ (नो मनी फॉर टैरर यानी एनएमएफटी) नामक मंत्री स्तरीय आतंकरोधी धन-निषेध मंच के तृतीय सम्मेलन की मेजबानी की। इसका पहला अधिवेशन 2018 में पेरिस में हुआ था और दूसरा 2019 में मेलबोर्न में। अगली बैठक 2020 में भारत में रखी गई थी लेकिन कोविड महामारी की वजह से नहीं हो पाई। यह आयोजन 100 से अधिक मुल्कों की आर्थिक-खुफिया इकाइयों के सहयोग से हुआ। इसको ‘एग्नोमेंट ग्रुप’ भी पुकारा जाता है।

भारत ने दो बहुत बड़े आतंकवादी हमले झेले हैं। पहला, 1985 में आयरिश समुद्र के ऊपर उड़ते एयर इंडिया विमान में विस्फोट और 1990 के दशक में पंजाब और कश्मीर में अनेक शहरों में हुए आतंकी वारदातें, नरसंहार। दूसरा, 2008 में मुंबई में हुआ आत्मघाती हमला।

हालांकि फिलहाल खतरा कम हुआ लगता है। मोदी सरकार जहां घरेलू मोर्चे पर अपनी आतंकरोधी नीति जारी रखे हुए है, वहीं कूटनीतिक उपायों में संयुक्त राष्ट्र का समर्थन प्राप्त बृहद अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद समागम (सीसीटीआई) बुलाने का आह्वान किया है। कोई हैरानी नहीं कि नई दिल्ली सत्र में प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने कड़े शब्दों में आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले मुल्क (यानी पाकिस्तान) और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में अड़ंगा लाने वालों (यानी चीन) की निंदा की है।

सालों से आतंकवाद का गहरा दंश झेल रहे एक मुल्क के तौर पर भारत इस चुनौती का सामना करने हेतु वैश्विक बिरादरी को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत ने उन सभी देशों के खिलाफ संयुक्त प्रयास का आह्वान किया है जो आतंकवाद को बढ़ावा और धन मुहैया करवाते हैं। इस समागम से पहले, अक्तूबर माह में नयी दिल्ली में आयोजित संयुक्त राष्ट्र विशेष परिषद समिति की बैठक को संबोधित करते हुए भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि आतंकवादी खतरा अब तौर-तरीके बदलकर, नये रंगरूटों की भरती करने और भड़काने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने के अलावा ड्रोन, वीपीएन एड्रैस, मैसेज एन्क्रिप्शन स्क्रिप्ट, ब्लॉक-चेन और डिजिटल करंसी का उपयोग करने लगा है।

वर्ष 2018 में प्रथम एनएमएफटी सम्मेलन हुआ था, तब अमेरिका से पाकिस्तान की अनबन के चलते अमेरिकियों ने उसको वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) की सूची में डलवा दिया। यह कार्यबल आतंकी गतिविधियों को चलाने, काला धन मुहैया करवाने वालों की निगरानी करने के अलावा सामूहिक नरसंहार हथियार बनाने वालों या उनका पोषण करने वालों पर भी कार्रवाई करता है। पाकिस्तान को पहले भी, 2008-09 में इस सूची में रखा जा चुका है, वर्ष 2012-15 के बीच कड़ी निगरानी के तहत रहा। फिलहाल ‘ग्रे सूची’ में होने की वजह से पाकिस्तान के लिए आईएमएफ, विश्व बैंक और एडीबी जैसे वित्तीय संस्थानों से ऋण लेना मुश्किल बना हुआ है। अतएव पाकिस्तानी सरकार को मजबूरन आतंकवादियों और उनके संगठनों पर कार्रवाई करनी पड़ रही है। इस सिलसिले में लश्कर-ए-तैयबा सरगना हफीज़ सईद और मुंबई हमले के मुख्य सूत्रधार साज़िद मीर के खिलाफ कानूनी कदम उठाने पड़े। अप्रैल माह में हफीज़ को आतंक फैलाने और इसके लिए धन मुहैया करवाने के दोष में 68 साल की कैद की सजा दी गई है और लखवी को 20 साल की। साज़िद मीर के खिलाफ हुई कार्रवाई होना चौंकाता है, क्योंकि इस साल के शुरू तक पाकिस्तान यह दावा करता रहा कि मीर, जो कि मुंबई हमले का मुख्य सूत्रधार और शायद आईएसआई अफसर है, मर चुका है। अचानक जून के महीने में उसकी गिरफ्तारी दिखाकर 15 साल की जेल सुनाई गई।

हालांकि, पाकिस्तान अभी भी दावा कर रहा है कि वह जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अज़हर का सुराग नहीं पा सका। जून, 2022 में एफएटीएफ ने तीन-दिवसीय मौका-मुआयना किया और पाकिस्तान को क्लीन चिट दे डाली। एफएटीएफ के समक्ष रखे गए प्रक्रिया संबंधी दस्तावेज गुप्त हैं। परंतु इसमें शक कम है कि पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ दोस्ताना पुनः बना लिया है। शायद यह बदलाव अफगानिस्तान में छिपे अल कायदा सरगना अयमन अल-जवाहिरी को ड्रोन हमले में मार गिराने में किए गए पाकिस्तानी सहयोग की एवज में आया हो।

लेकिन भारत अभी भी तसल्लीबख्श स्थिति में होने से काफी दूर है। साउथ एशिया टेरेरिस्म पोर्टल (एसएटीपी) में अजय साहनी कहते हैं कि हालांकि फिलहाल यह कहना अतिशयी होगा कि खालिस्तानी आतंकवाद का पुनर्जागरण हो चुका है। इतना साफ है कि आपराधिक गुटों और खालिस्तानी तत्वों के बीच आपसी तालमेल में बढ़ोतरी हुई है। सीमापार से ड्रोन के जरिये पंजाब में नशा-हथियारों की खेप पहुंचाने में आईएसआई भी सक्रिय है। इस साल के पहले नौ महीनों में सुरक्षा बलों ने 171 ड्रोन फ्लाइट्स होने की पहचान की है और ऐसी भी होंगी जो पकड़ में नहीं आ सकी। पाकिस्तान हर वह काम कर रहा है जो लंबे समय से करता आया है। कश्मीर में, पाकिस्तानी एजेंसियां ‘द रिजेस्टेंस फ्रंट’ (टीआरएफ) नामक संगठन के जरिये काम कर रही हैं, जिसने हालात उबाल में बनाए रखने के उद्देश्य से काफी असरअंदाज़ हमलों को अंजाम दिया है।

मोदी-शाह के रवैये की समस्या यह है कि आतंकवाद से निपटने के लिए ‘सबका एक ही उपाय’ नीति चलाए हुए हैं, जिसमें घरेलू पृथकतावादी एवं सशस्त्र विद्रोहियों और पाकिस्तान द्वारा भेजे गए छद्म योद्धा एवं आतंकवादियों के बीच के फर्क को ध्यान में नहीं रखा जा रहा है। तिस पर यह नीति चुनींदा है यानी अक्सर चुनावी फायदे से जुड़ी है, तब भाजपा पाकिस्तानी गतिविधियों को बड़ा मुद्दा बनाकर भुनाती है। वर्ना तो मुंहबाए खड़ी चुनौतियों को नज़रअंदाज किया जाता है। ड्रोन उड़ानों का विषय एफएटीएफ प्रक्रिया में क्यों शामिल नहीं किया गया, यहां तक कि एनएमएफटी मंच पर भी नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। भारत को पूरा हक है कि वह अपनी सार्वभौमिकता के सरासर उल्लंघन पर सैन्य अथवा अन्य तरीकों से प्रतिक्रिया करे। लेकिन फिलहाल, सरकार कुछ करती दिखाई नहीं देती। एक बड़ा सबक जिसको नज़रअंदाज किया गया है, यह कि, जो रणनीति केवल बल प्रयोग पर टिकी हो, वह कारगर नहीं होती। यह इस्राइल का नहीं, बल्कि हमारे निजी अनुभवों का निचोड़ है। जबकि ऐसी नीति की जरूरत है, जिसमें सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ राजनीतिक प्रक्रिया, वार्ता, समझौतापरक रुख का सम्मिश्रण हो। लेकिन समस्या यह है कि सरकार की रणनीति देश में समतामूलक नहीं है।

बेशक मोदी ने अपने भाषण में घरेलू कट्टरवाद को लेकर चेताया है परंतु सरकार ने जब विगत में मुस्लिमों पर हुए अवांछित हमलों के वक्त मुंह परे फेरे रखा तो यह अहसास क्यों नहीं हुआ कि इससे प्रतिक्रियात्मक इस्लामिक आतंकवाद का और एक चरण शुरू हो सकता है। हालांकि, 2008 के बाद ऐसी घटनाओं में काफी कमी आई है, पर दक्षिण भारत में पिछले समय में परेशान करने वाली कुछ घटनाएं हुई हैं, जो भावी घटनाक्रम का चेतावनी संकेतक है।

लेखक ऑब्ज़र्वर फॉर रिसर्च फाउंडेशन में विशिष्ट सदस्य हैं।

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