सत्य निकेतन में हुए हादसे की असली वजह दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रावासों की भारी कमी रही है। हॉस्टल नहीं मिलते तो हजारों छात्र असुरक्षित और बेहद महंगे पीजी में रहते हैं। अक्सर मकान मालिक मनमाना किराया वसूलते हैं। यूजीसी व यूनिवर्सिटी प्रशासन ने भी ध्यान नहीं दिया।
दिल्ली में सत्य निकेतन हादसा बेहद अफ़सोस की बात है जिसके होने के लक्षण पहले ही नजर आ रहे थे। यानी पूरी-पूरी आशंकाएं थीं। गंभीर इंसानी लापरवाही की वजह से हुई इस त्रासदी में कई छात्रों की जानें चली गईं। इसका मूल कारण है दिल्ली यूनिवर्सिटी में हॉस्टल की अपर्याप्त सुविधाएं।
लेखक मास्को विश्वविद्यालय में पीएचडी करने के दौरान वहां के छात्रावास में वे चार वर्ष रहे। हॉस्टल के हर कोने में रसोई आदि सुविधाएं थीं जहां कभी-कभार अपनी मर्जी का खाना बना सकते थे। इसके अलावा वहां बड़े-बड़े भोजनालयों की भरमार थी। वहां छात्रों को रोजमर्रा की जरूरतों की चिंता नहीं करनी पड़ती थी। वे दिल लगाकर पढ़ाई कर सकते थे। सप्ताहांत के समय छात्रावास में विविध रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों का छात्र स्वयं आयोजन करते थे। सभी को अपनी कलात्मक व सृजनात्मक प्रतिभा चमकाने का अवसर मिलता था। कलात्मक ढंग से नाचना या गाना सीख सकते थे। इन सब हुनरों का विकास करने का अवसर छात्रावासों में ही मिलता था। मास्को विश्वविद्यालय में छात्रावास सुविधा नि:शुल्क थी। निवास के अलावा जिम, चिकित्सालय व रोजमर्रा की सभी जरूरी सुविधायें छात्रावास कैम्पस में थीं। यानी हॉस्टल घर से दूर घर जैसा माहौल प्रदान करते थे।
ऐसा ही अनुभव कुछ-कुछ स्वीडन और फिनलैंड में भी मिलता है। लेकिन वहां के छात्रावास महंगे होते थे जो बहुत सारे छात्रों के सामर्थ्य से बाहर होते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक बनने पर इस यूनिवर्सिटी के तीन पोस्ट-ग्रेजुएट हॉस्टलों की मैनेजमेंट से जुड़ने का अवसर मिला– जुबली हॉल और पीजी मेन्स हॉस्टल के प्रोवोस्ट और ग्वायर हॉल के रेजिडेंट ट्यूटर के तौर पर। इससे दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्रावासों की कमी की गंभीरता को समझने और खुद के छात्रावासीय जीवन के संदर्भ में समझने का अवसर मिला।
निस्संदेह, निराशा पैदा होनी स्वाभाविक थी कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्रावास सुविधा बेहद कम है। विश्वविद्यालय में 80 से ज़्यादा कॉलेज हैं जिनमें से मात्र दस में छात्रावास हैं। इनमें ज़्यादातर कॉलेज डीयू के मेन कैंपस में हैं – मिरांडा हाउस, सेंट स्टीफंस, हिंदू कॉलेज हंसराज, रामजस, किरोड़ीमल, एसआरसीसी , डीआर,आईपी आदि कॉलेज छात्रावास की सुविधा देते हैं। मेन कैंपस के बाहर, सिर्फ़ लेडी श्रीराम कॉलेज में हॉस्टल है। इन कालेजों के छात्रावासों में भी दिल्ली से बाहर से आने वाले सभी छात्रों को जगह नहीं मिलती। छात्र रहने के लिए मारे-मारे फिरने को मजबूर होते हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय में दिल्ली से बाहर के छात्रों की स्थिति दयनीय ही कही जा सकती है। यहां के 50 से अधिक पोस्ट ग्रेजुएट विभागों के लिए कुल 7-8 हॉस्टल हैं : जुबली हॉल, ग्वायर हॉल, पीजी मेन्स और विमेंस हॉस्टल, दो इंटरनेशनल हॉस्टल और नॉर्थ-ईस्ट के छात्रों के लिए एक हॉस्टल। साउथ कैंपस में सिर्फ़ एक महिला छात्रावास है। सभी अंडर-ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट हॉस्टलों में लगभग 2,500 छात्रों के रहने की जगह है। जबकि ज़रूरत दसियों हज़ारों छात्रावास के कमरों की है। पर हमारे देश में आधुनिक सुविधाओं के बारे में सोचता कौन है? रहने के लिए बस एक खटिया मिल जाए तो भाग्यशाली समझो। पर वह भी मुहैया नहीं होती छात्रावासों में।
सिर्फ़ पुराने कॉलेजों में ही हॉस्टल की सुविधा है, वह भी नाममात्र की। दिल्ली में अलग-अलग सरकारों के समय लगभग 57 कॉलेज बने। उनमें से किसी ने भी अपने कैंपस में हॉस्टल सुविधा देने की कोशिश नहीं की। बस कालेज बनाकर नाम कमाते रहे। बाहरी छात्रों को अपने देश की राजधानी में पढ़ने का पूरा अधिकार है। पर यह हक हजारों जोखिमों से भरा है, जान तक का जोखिम लेना पड़ता है। सत्यनिकेतन में यही हुआ। यूजीसी भी इस गंभीर अनदेखी में हिस्सेदार मानी जा सकती है। वह न तो अपने फंड से बने नए कॉलेजों के लिए हॉस्टल की सुविधा ज़रूरी मानती है, और न ही यह शर्त रखती है कि कॉलेजों में दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ हॉस्टल भी बनाए जाएं। छात्रावासों के बारे में सोचा ही नहीं जाता, मानो छात्रों को रहने-खाने की जरूरत ही नहीं।
यूनिवर्सिटी प्रशासन को भी अपने विभागों और कॉलेजों के लिए हॉस्टल इंफ्रास्ट्रक्चर न बना पाने की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिये। दरअसल, यूनिवर्सिटी प्रशासन हॉस्टल बनाने से बचता रहा है- वह हॉस्टलों को बहुत बड़ी परेशानी और सिरदर्दी का स्रोत मानता रहा है। मानो वे शिक्षा के लिए अनावश्यक हों। लेखक के मुताबिक, कॉलेज मैनेजमेंट के लिए ज़िम्मेदार एक डीन अक्सर कहते थे कि यूनिवर्सिटी के लिए हॉस्टल बेवजह की परेशानियां खड़ी करते हैं। अमूमन विवि प्रशासन के कई लोग जेएनयू का उदाहरण देते हैं, जहां कथित तौर पर कुछ ज्यादा ही आजादी होती है, छात्र स्वच्छंद और उन्मुक्त हो जाते हैं।
नीति-नियंताओं द्वारा हायर एजुकेशन के लिए बजट में भारी कटौती की गई है। यहां तक कि एजुकेशन सेस का बड़ा हिस्सा भी दूसरे कामों में लगा दिया जाता है। जोर निजीकरण पर है जिसकी योजना में मानव व मानवीय मूल्यों का कोई स्थान शायद ही होता हो। हॉस्टल प्रशासन के सामने बड़ी समस्या यह भी होती है कि हॉस्टल में रहने वाले छात्र अपने कोर्स की अवधि से ज़्यादा समय तक टिके रहते थे, खासकर पोस्ट-ग्रेजुएट हॉस्टलों में। लेखक के मुताबिक, प्रोवोस्ट के तौर पर उन्हें जुबली हॉल में कोर्स अवधि से ज़्यादा समय तक रहने वाले छात्रों को निकालने के लिए एक बार पुलिस की मदद लेनी पड़ी थी; उनमें कुछ तो 10-15 साल से वहां रह रहे थे।
दिल्ली यूनिवर्सिटी और उसके कॉलेजों के आसपास तेज़ी से बढ़े ‘पेइंग गेस्ट’ (पीजी) मालिक बेतहाशा कमाई करते हैं और विवश छात्रों का शोषण करते हैं। नॉर्थ कैंपस के पास मुखर्जी नगर, हडसन लेन, विजय नगर और साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन आदि डीयू में हॉस्टलों की कमी की वजह से ही बने हैं। इन पीजी आवासों में बाहर से आए मजबूर छात्रों को नारकीय स्थिति में रहना पड़ता है। सत्य निकेतन की दुखद घटना ऐसी ही ज़िंदगी का नतीजा है। पीजी के मालिकों में से कुछ लालची लोग मजबूर छात्रों का बेरहमी से शोषण करते हैं। दरअसल, अधिकतर पीजी मालिक किसी न किसी सियासी पार्टी से जुड़े होते हैं।
बहरहाल, समाधान इसमें निहित है कि बड़े पैमाने पर और तेज़ी से हॉस्टल बनाए जाएं। अगर इच्छाशक्ति हो, तो ऐसा किया जा सकता है। इस संदर्भ में हैदराबाद की सेंट्रल यूनिवर्सिटी, 'इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजेज़ यूनिवर्सिटी' (इएफएलयू) का उदाहरण दिया जा सकता है जहां तीन साल से भी कम समय में लगभग तीन हज़ार छात्रों के लिए उच्च कोटि के छात्रावास बनाए गए थे, जहां लगभग सभी छात्रों को छात्रावास आसानी से मिल जाता है।
लेखक इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजेज़ यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के वाइस-चांसलर रहे हैं।

