कश्मीर मुद्दा सुलझाए बगैर ब्रिटेन का निकलना!
असली सवाल यह है कि क्या ब्रिटिश यह समझते हैं कि उनके आखिरी दिनों में लिए गए फैसलों का असर आज भी करोड़ों लोगों की ज़िंदगियों को आकार दे रहा है। दिल्ली-इस्लामाबाद की नवीनतम घटनाओं से तो लगता है कि...
असली सवाल यह है कि क्या ब्रिटिश यह समझते हैं कि उनके आखिरी दिनों में लिए गए फैसलों का असर आज भी करोड़ों लोगों की ज़िंदगियों को आकार दे रहा है। दिल्ली-इस्लामाबाद की नवीनतम घटनाओं से तो लगता है कि इतिहास अभी भी अतीत नहीं बना, वहीं का वहीं खड़ा है।
भारत और पाकिस्तान के बीच की ‘जैसे को तैसा’ जवाब देने की प्रवृत्ति और अविश्वास के मिलेजुले भाव से देखना दिलचस्प है। बुधवार को भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने श्रीनगर का दौरा किया और जम्मू-कश्मीर को ‘भारत का अहम हिस्सा’ बताया। पाकिस्तान ने तुरंत इसका विरोध किया। इसके बाद राजनयिक स्तर पर ‘जैसे को तैसा’ वाला दौर शुरू हुआ : पाकिस्तान ने इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग के बाहर लगे सुरक्षा बैरियर हटवा दिए; तो जवाबी प्रतिक्रिया में भारत ने भी नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग के बाहर ठीक वही किया।
भारत और पाकिस्तान की आज़ादी के बाद उनकी उम्र लगभग 80 साल हो चुकी है। लेकिन वे अभी भी ऐसे व्यवहार करते हैं मानो दिवंगत माता-पिता की विरासत के लिए झगड़ रहे बच्चे हों। ज़ाहिर है, यहां ‘दिवंगत माता-पिता’ से अभिप्राय ब्रिटिश साम्राज्य से है। इससे एक दिलचस्प सवाल उठता है: 1947 में पीछे छोड़ दिए गए ‘ताज के रत्न’ (भारत) को ब्रिटेन किस नज़रिए से देखता है? क्या ब्रिटेन वाकई अतीत को भूलकर आगे बढ़ गया है? मुझे शक है कि इसका जवाब उससे कहीं ज़्यादा जटिल है, जितना ब्रिटिश या उनकी पूर्व प्रजा स्वीकार करना चाहेगी। भारत से ब्रिटेन की वापसी असाधारण रूप से जल्दबाज़ी में हुई थी। फरवरी 1947 में क्लेमेंट एटली की सरकार ने घोषणा की कि ब्रिटिश शासन जून 1948 तक खत्म हो जाएगा। लॉर्ड माउंटबेटन वायसराय बनकर आए और उन्होंने इस समय-सीमा को सरका कर पहले कर दिया। अगस्त 1947 में आज़ादी मिली। नए देशों की सीमाओं की घोषणा सिर्फ़ दो दिन बाद की गई। लाखों लोगों को अचानक पता चला कि वे एक ब्रिटिश वकील, सर सिरिल रैडक्लिफ द्वारा खींची गई रेखा के गलत तरफ़ रह रहे हैं, जो इससे पहले कभी भारत नहीं आए थे।
इसके नतीजे बहुत भयानक रहे—बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन, सांप्रदायिक नरसंहार और कड़वाहट की ऐसी विरासत, जो पीढ़ियों तक बनी रही। और फिर कश्मीर का मुद्दा था। यह महज़ ज़मीन का कोई टुकड़ा भर नहीं था, जिसे एक नया देश आसानी से दूसरे देश को सौंप दे। जम्मू-कश्मीर एक रियासत थी, जिसके शासक महाराजा हरि सिंह ने काफी हील-हुज्जत के बाद अक्तूबर 1947 में भारत में विलय के दस्तावेज़ (इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर किए थे। इसे गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने स्वीकार कर लिया, जो आज़ादी के बाद भी भारत के गवर्नर-जनरल बने रहे। संलग्न पत्र में उन्होंने लिखा था कि जब कानून-व्यवस्था बहाल हो जाएगी, तो विलय का सवाल लोगों की राय से तय किया जाना चाहिए। वह अनसुलझा इतिहास भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में सबसे बड़ा ज़ख्म बन गया। तीन युद्ध हुए, सशस्त्र विद्रोह, आतंकवाद, सैन्य टकराव और न जाने कितने ही कूटनीतिक संकट आए।
आज 2026 में, हम देख रहे हैं कि परमाणु हथियार संपन्न दो देश एक-दूसरे के राजनयिक मिशनों के बाहर सुरक्षा इंतज़ामों को लेकर जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं, क्योंकि एक अमेरिकी राजदूत ने कश्मीर के बारे में कुछ ऐसा कहा जो पाकिस्तान को नागवार गुजरा। इन सबके लिए ब्रिटेन को दोष देना आसान होगा। लेकिन यह करना कुछ ज़्यादा ही आसान होगा। भारत और पाकिस्तान के पास परिपक्व होने के लिए लगभग आठ दशक थे। उनके नेताओं ने सुलह की बजाय बार-बार राष्ट्रवाद को चुना। दोनों देशों ने घरेलू राजनीतिक मकसदों के लिए कश्मीर का इस्तेमाल किया। दोनों ने बंटवारे और खुद को पीड़ित दिखाने के आधार पर मज़बूत प्रचार कथानक गढ़े हैं। सन 1947 के बाद से दिल्ली या इस्लामाबाद में लिए गए हर फ़ैसले के लिए ब्रिटेन को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन फिर, ब्रिटेन भी इतिहास से पूरी तरह बच नहीं सकता।
निःसंदेह, उसने ऐसे राजनीतिक हालात पैदा किए जिनमें बंटवारा हुआ। इसने तय किया कि मूल समयसीमा से पहले ही यहां से चले जाना है। उसने पंजाब और बंगाल के बंटवारे की निगरानी की। सत्ता हस्तांतरण प्रक्रिया में ब्रिटिश अधिकारी गहराई तक शामिल थे। ब्रिटिश राष्ट्रीय संग्रहालय के रिकॉर्ड से स्थापित होता है कि ब्रिटिश अधिकारियों के पास यह तय करने के लिए सिर्फ़ नौ हफ़्ते थे कि ब्रिटिश भारत का बंटवारा कैसे किया जाए। और फिर ब्रिटेन के सूत्रधार अपने देश लौट गए।
शायद कहानी का सबसे असाधारण हिस्सा यही है। ब्रिटिश साम्राज्य नक्शे से गायब हो गया, लेकिन उसकी सीमाएं नहीं गईं। उसके बनाए संस्थान पूरी तरह खत्म नहीं हुए। उसकी अंग्रेज़ी भाषा नए रसूखदार वर्ग की गर्व योग्य बोली बन गई। उसकी संसदीय प्रणाली को अपनाया गया। उसकी सेना का ढांचा, प्रशासनिक परंपराएं और कानूनी नियम बने रहे। और उसके जाने के दौरान बने ज़ख्म भी बने रहे। तथापि, ब्रिटेन खुद काफी हद तक आगे बढ़ चुका है। आज का ब्रिटेन बिल्कुल अलग सवालों में उलझा हुआ है: ब्रेक्सिट, आप्रवासन, एनएचएस, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, सुधार, पारंपरिक राजनीतिक दलों का पतन और दुनिया में उसकी अनिश्चित स्थिति।
वहीं, भारत और पाकिस्तान इस बीच अभी भी उस इलाके को लेकर झगड़ रहे हैं, जिसका आधुनिक राजनीतिक भविष्य उपमहाद्वीप में ब्रिटेन के आखिरी महीनों के दौरान तय हुआ था। इस पूरे मामले में कुछ-कुछ शेक्सपियर के नाटकों जैसी बात है। ब्रिटेन ने मंच छोड़ दिया, कलाकार बदल गए, वेशभूषा बदल गई, दर्शक बदल गए, लेकिन झगड़ा जारी रहा।
शायद इस बात की असली परीक्षा यह नहीं है कि क्या ब्रिटेन अपने साम्राज्य वाले दिनों को छोड़कर आगे बढ़ चुका है और क्या ब्रिटेन के लोग अब भी ‘राज’ के पुराने वैभव की खुमारी में खोए रहते हैं, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या ब्रिटिश यह समझते हैं कि उनके आखिरी दिनों में लिए गए फैसलों का असर आज भी करोड़ों लोगों की ज़िंदगियों को आकार दे रहा है। दिल्ली-इस्लामाबाद की नवीनतम घटनाओं से तो लगता है कि इतिहास अभी भी अतीत नहीं बना, वहीं का वहीं खड़ा है। ‘ताज का रत्न’ अब दो मज़बूत स्वतंत्र देश बन चुके हैं, दोनों परमाणु शक्ति संपन्न हैं, और भारत अब दुनिया का सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश है। दोनों देशों ने अपना-अपना इतिहास, अपनी महत्वाकांक्षाएं और अपनी-अपनी पहचान विकसित कर ली है। वे अब ब्रिटेन का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन न तो ब्रिटेन और न ही दक्षिण एशिया के ये देश यह दिखावा कर सकते हैं कि जिस तरीके से ब्रिटेन यहाँ से गया, उससे बाद की घटनाओं पर कोई असर नहीं पड़ा। अस्सी साल बाद, शायद अब समय आ गया है कि तीनों देश उस असहज सच को स्वीकार करें।
ब्रिटिश राज 1947 में भारत से चला गया, लेकिन वह गया कैसे, इसका इतिहास कभी भारत से पूरी तरह नहीं गया।
लेखक लंदन स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।

