असुविधाओं के पहाड़

नीति-निर्धारण के केंद्र में लाएं गांव

नीति-निर्धारण के केंद्र में लाएं गांव

उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी

ग्रामीण सभ्यता प्रधान होने के बावजूद स्वतंत्र भारत में गांवों की गंभीर चिंता सिर्फ चुनावी मौसम में ही होती रही है। यह स्थिति कोरोना काल में भी दिख रही है। सब कह रहे थे कि कोरोना का असल संकट शहरों के बाद गांवों में दिखेगा। जहां स्वास्थ्य ढांचा अब भी बहुत कमजोर है। जहां अब भी इलाज के लिए लोग बंगाली डॉक्टर, स्थानीय कंपाउंडर टाइप लोगों और दवा के दुकानदारों पर निर्भर हैं।

गांवों और उसके निवासियों को दोयम मानने की जड़ हमारे संविधान में ही है। संविधान सभा में यह सवाल उठा था कि संविधान में नागरिक को मूल इकाई माना जाए या फिर गांवों को। सभा के गांधीवादी सदस्य गांधी जी की सोच के मुताबिक संविधान में गांवों को इकाई मानने के हिमायती थे। गांधी जी ने 1909 में हिंद स्वराज नामक जो पुस्तिका लिखी थी, उसमें भावी स्वराज का खाका है। गांधी जी हिंद स्वराज में सभ्यता के मुताबिक गांवों को मूल और आत्मनिर्भर इकाई बनाने के पक्षधर थे। लेकिन जब संविधान सभा गठित हुई तो गांधी जी के इस विचार को न सिर्फ अंबेडकर, बल्कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी खारिज कर दिया था। अंबेडकर को यह बात कचोटती थी कि विदेशी आक्रमणों के दौरान भी गांव वाले निरपेक्ष बने रहे। वहीं जवाहर लाल नेहरू ने तो व्यंग्य में यहां तक कह दिया था कि बजबजाते और गंदे गांवों से सुराज की राह निकलेगी।

संविधान सभा की बहसें अब ऑनलाइन उपलब्ध हैं, उसमें अंबेडकर के ये विचार मिल जाएंगे। वहीं जवाहर लाल नेहरू की गांव संबंधी सोच का जिक्र राजमोहन गांधी द्वारा लिखित गांधी जी की जीवनी मोहनदास में तफसील से है। संविधान में गांवों को तरजीह न दिए जाने का असर यह हुआ कि भारत का पूरा नीति निर्धारण शहर केंद्रित होता गया। इसका असर मीडिया पर भी पड़ा। वह भी चुनावों के अलावा गांवों पर गंभीर ध्यान देने से लगातार बचता रहा। हाल के दिनों में ऑक्सीजन और दवाओं की उपलब्धता को लेकर हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट ने जो सुनवाई की, उनमें भी गांवों की भारी जनसंख्या और उसकी चिंता कहीं नहीं दिखी। दुर्भाग्यजनक यह है कि देश की चाहे आंतरिक सुरक्षा हो या बाहरी दुश्मनों से, इन गांवों से ही आए जवान यह भूमिका निभाते हैं।

2011 की जनगणना के मुताबिक करीब 67 प्रतिशत आबादी अब भी गांवों में ही रहती है। कोरोना काल में छोटी और दिहाड़ी वाली नौकरियां-मजदूरी करने वाली बड़ी आबादी गांवों को लौट चुकी है। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि इन दिनों देश की करीब 70 प्रतिशत आबादी गांवों में ही रह रही है। लेकिन कोरोना काल में इतनी बड़ी आबादी की जितनी चिंता दिखनी चाहिए, वह कहीं नजर नहीं आ रही। प्रधानमंत्री ने 15 मई को जिला अधिकारियों के साथ बैठक में गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने और कोविड की रोकथाम के उपाय करने को कहा है। इसके बाद थोड़ी हलचल तो दिखी है। लेकिन क्या इसका गंभीर असर होगा।

भारत में इन दिनों मोटे तौर पर छह महानगर और बड़े राज्यों की राजधानियों और कुछ और बड़े शहरों की जनसंख्या को जोड़ दिया जाए तो यह मोटे तौर पर पैंतीस करोड़ बैठती है। अगर बिना रजिस्ट्रेशन वाले दिहाड़ी मजदूरों, छोटी नौकरियां करने के लिए रोजाना इन शहरों में आने वालों को जोड़ दें तो यह जनसंख्या चालीस करोड़ से ज्यादा नहीं बैठती। लेकिन पूरे तंत्र में सिर्फ इसी जनसंख्या की ही चिंता है।

कोरोना काल में सोच की इस कमी का असर दिखने लगा है। उत्तर प्रदेश हो या बिहार, झारखंड हो या बंगाल, उत्तराखंड हो या राजस्थान, छत्तीसगढ़ हो या मध्य प्रदेश, गांवों में रहने वाले लोगों में कोरोना का संक्रमण तेजी से फैल रहा है और उनके लिए तंत्र, मीडिया और न्यायपालिका में कहीं भी गंभीर चिंता नजर नहीं आ रही। शहरों में बिजली चली जाए, पानी की सप्लाई ठप हो जाए, अस्पताल कर्मियों ने हड़ताल कर दी तो उस पर न्यायपालिका संज्ञान ले लेती है, तंत्र हिलने लगता है और मीडिया इस अंदाज में उसे प्रस्तुत करता है, जैसे भूकंप आ गया। लेकिन असुविधाओं के पहाड़ पर रहने वाले गांव वालों को अपने दैनंदिन जीवन में रोजाना ऐसे भूकंप झेलने पड़ते हैं, लेकिन उस पर ध्यान शहरी समस्याओं के अंदाज में नहीं जाता।

कोरोना में पहली प्राथमिकता अब गांवों को बचाने की है। उत्तर प्रदेश और बिहार से गंगा में लाशें बहाने की जो खबरें सामने आई हैं, वे गांवों की उपेक्षा की जीती-जागती तस्वीर है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी कह चुके हैं कि हर नागरिक तक सरकार स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंचा सकती।

कोरोना से हम रोजाना सबक सीख रहे हैं। इसका एक सबक यह है कि अब हम गांवों को भी नीति निर्धारण के केंद्र में लाएं। नौकरशाही की सोच में भी गांवों को लेकर बदलाव लाने की कोशिश होनी चाहिए। उनके प्रशिक्षण में ही इसे गंभीरता से जोड़ा जाना चाहिए। न्यायपालिका को भी गांवों की ओर अपनी निगाह उठानी होगी।

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

शह-मात का खेल‌‍

शह-मात का खेल‌‍

इंतजार की लहरों पर सवारी

इंतजार की लहरों पर सवारी

पद के जरिये समाज सेवा का सुअवसर

पद के जरिये समाज सेवा का सुअवसर

झाझड़िया के जज्बे से सोने-चांदी की झंकार

झाझड़िया के जज्बे से सोने-चांदी की झंकार

बीत गये अब दिखावे के सम्मोहक दिन

बीत गये अब दिखावे के सम्मोहक दिन

जीवन पर्यंत किसान हितों के लिए संघर्ष

जीवन पर्यंत किसान हितों के लिए संघर्ष

रिश्तों की कुंडली का दशम ग्रह दामाद

रिश्तों की कुंडली का दशम ग्रह दामाद