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ब्रिक्स ने कर दी ग्लोबल साउथ की मजबूत दावेदारी

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन

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दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने बदलती विश्व व्यवस्था की नई तस्वीर पेश की। ग्लोबल साउथ की बढ़ती ताकत, अमेरिकी टैरिफ, युद्ध और डॉलर के वर्चस्व के खिलाफ साझा चिंता ने सम्मेलन को वैश्विक राजनीति के लिहाज से बेहद अहम बना दिया।

भारत की अध्यक्षता में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ग्लोबल साउथ ने विश्व राजनीति में अपनी मजबूत दावेदारी पेश की है। दुनिया के 40 फीसदी से अधिक सकल घरेलू उत्पाद के मजबूत आधार वाले ब्रिक्स के 11 देशों ने सम्मेलन में आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों के साथ युद्ध, युद्ध जैसी स्थिति, टैरिफ वॉर, प्रतिबंधों जैसी चुनौतियों पर बेहतर समझदारी विकसित की। बुनियादी तौर पर सहमति बनी कि ब्रिक्स देशों को एक-दूसरे पर आने वाले संकटों में साथ देना चाहिए। दिल्ली में 12-13 सितंबर को हुए इस शिखर सम्मेलन में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने बड़ी कूटनीतिक जीत हासिल की। छह महीने अमेरिका से जंग लड़ने के बाद भी उनके हौसले बुलंद हैं और वह मजबूती से ट्रंप राज के खिलाफ ताल ठोंकते नजर आए। भारत ने बतौर मेजबान कई देशों के साथ द्विपक्षीय मुलाकातों का भी आयोजन किया, जिसमें ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मुलाकात बहुत अहम रही।

ब्रिक्स 2026 का घोषणापत्र मौजूदा दौर में अंतर्राष्ट्रीय स्थितियों के मद्देनजर युद्ध के खिलाफ है और कहता है कि संघर्ष व जंग से नहीं, बल्कि बातचीत—आपसी सलाह से मसले हल किए जाने चाहिए। आतंकवाद की भर्त्सना के साथ-साथ तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों से बचने का प्रस्ताव लिया गया। टैरिफ वॉर से दुनिया पिछले एक साल से जूझ रही है। ब्रिक्स के देश खासतौर पर अमेरिका के टैरिफ वॉर के निशाने पर रहे हैं—चाहे चीन हो या भारत या फिर रूस और सभी के लिए इस टैरिफ के डंडे से बाहर निकलने का रास्ता खोजना प्राथमिकता थी। इस तरह 11-12-13 को ब्रिक्स के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर खूब चर्चा हुई। हालांकि घोषणापत्र में सीधे-सीधे अमेरिका का नाम नहीं है, लेकिन उसकी नीतियों के खिलाफ कई स्टेटमेंट हैं। मिसाल के तौर पर ईरान, रूस और चीन ने ब्रिक्स देशों के भीतर व्यापार कैसे स्थानीय मुद्रा में किया जा सकता है, इस पर सघन चर्चा की है। घोषणापत्र के निशाने पर इस्राइल है और खुलकर गाजा में हो रही हिंसा-बर्बरता के खिलाफ बोला गया है—जो अपने आप में ऐतिहासिक है। घोषणापत्र में कहा गया है कि ब्रिक्स के देश तमाम पक्षों से यह आग्रह करते हैं कि वे गाजा में युद्धविराम का सम्मान करें। ब्रिक्स फलस्तीनियों को जबरन बाहर धकेलने के खिलाफ है और दो राष्ट्रों के निर्माण की अवधारणा के समर्थन में है। इस तरह से ब्रिक्स के तमाम देशों का फलस्तीन के पक्ष में आना और इस्राइल के खिलाफ बोलना एक मायने में अमेरिका के स्टैंड के खिलाफ बोलना है। सारी दुनिया जानती है कि इस्राइल के फलस्तीन में हमले के पीछे अमेरिका है। ब्रिक्स 2026 का घोषणापत्र इस लिहाज से ट्रंप के खिलाफ है, क्योंकि इसके निशाने पर इस्राइल है और ईरान पर मंडरा रहे अमेरिकी युद्ध की लालसा है।

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अमेरिका का नाम लिए बिना पश्चिमी एशिया में चल रहे तनाव का जिक्र है और पश्चिमी एशिया में लगातार बढ़ते तनाव पर गहरी चिंता जताई गई है और कहा गया है कि ऐसे मामलों में तनाव कम करने के कदम उठाने चाहिए। अमेरिका के टैरिफ यानी तटकर के डंडे से ब्रिक्स के सभी देश परेशान नजर आए। चीन, रूस, ईरान, ब्राजील समेत इंडोनेशिया ने भी एकतरफा-मनमाने, तंग करने की नीयत से लगाए जाने वाले टैरिफ का विरोध किया। भारत ने भी कहा कि इससे विश्व व्यापार प्रभावित होता है और सप्लाई चेन बाधित होती है। ब्रिक्स के 18वें सम्मेलन ने विश्व व्यापार संगठन के बहुपक्षीय व्यापार सिस्टम का समर्थन किया। इसमें तमाम देशों की साझेदारी संभव है। ये तमाम बातें निश्चित तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति को अखरेंगी, क्योंकि हर मोर्चे पर उनके एजेंडे को चुनौती दी जा रही है। दुनिया को यूनिपोलर यानी एकध्रुवीय बनाने के ट्रंप के सपने को इस सम्मेलन में कड़ी चुनौती मिली है।

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इसमें बड़ा गेम चेंजर साबित हुआ ईरान और उसका कूटनीतिक दांव। जिस तरह से ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन में अपने एजेंडे को आगे रखा और अमेरिका के खिलाफ चल रहे अपने छह महीने के संघर्ष को खुलकर रखा और यह ऐलान किया कि ईरान को गुलाम बनाना असंभव है। उनकी बातों ने माहौल बना दिया। अमेरिका ने जैसे ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हमला किया, उसके सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर को ध्वस्त किया—उसे भी राष्ट्रपति मसूद ने एक मुद्दा बनाया और कहा कि दरअसल ब्रिक्स के देशों को इनके खिलाफ बोलना चाहिए, क्योंकि ये अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा के लिए खतरा है। मसूद ने साथ में फलस्तीनियों के आत्मनिर्णय के अधिकार के समर्थन में अहम बिंदु रखा कि इसके पक्ष में बात करके ही दरअसल ग्लोबल गवर्नेंस की साख की परीक्षा हो सकती है।

उधर, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूरोप व अमेरिका के खिलाफ जमकर बैटिंग की। पुतिन ने यह कहकर सनसनी मचा दी कि रूस सबका दोस्त है और वे यूरोप को सस्ते में तेल बेच रहे थे—150 डॉलर प्रति 1,000 क्यूबिक मीटर और अब वे 1,000 डॉलर दे रहे हैं, जो आने वाले दिनों में 1,500 डॉलर हो सकता है। पुतिन ने विकसित देशों के समूह जी-7 की आलोचना करते हुए कहा कि भविष्य ब्रिक्स का है, जीडीपी, आबादी और बाजार के लिहाज से।

अगले साल ब्रिक्स की अध्यक्षता करने वाले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने स्पष्ट रेखा खींचने का काम किया और कहा कि युद्ध बेकार की चीज है, इससे आम नागरिक का भला नहीं होता। हमें युद्ध के नहीं, शांति, सहयोग, वार्ता और व्यापार को बढ़ाने पर ध्यान रखना होगा। ब्रिक्स को इतिहास के सही पक्ष में खड़ा होना है और सारे देश इसके लिए तैयार हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संतुलित रुख अख्तियार करने की कोशिश की गई। दरअसल, ब्रिक्स सम्मेलन के जरिए ग्लोबल साउथ देशों की वर्ल्ड ऑर्डर में हिस्सेदारी तय करने का काम किया गया। ये एक बेहद जरूरी हस्तक्षेप है। इस साल ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन की थीम थी— ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण’, जो युद्ध और बढ़ते तनाव के माहौल में अपने आप में चुनौतीपूर्ण था।

ब्रिक्स के देश 370 करोड़ लोगों की आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनकी मांग को अनसुना करना इस समय संभव नहीं है। ब्रिक्स यानी ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका का एक ऐसा अंतर-सरकारी मंच है, जिसमें लगातार विस्तार हो रहा है। जनवरी, 2024 में इसमें इजि़प्ट, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को शामिल किया गया। फिर जनवरी, 2025 में इसमें इंडोनेशिया भी शामिल हुआ। इस तरह से ब्रिक्स दुनिया के 11 अहम उभरते बाजारों व विकासशील देशों को एकसाथ ला रहा है।

दिल्ली में हुए इस 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में उसके घोषणापत्र में विकास की बहुरंगी छाप की आस दिखी है, बाजार और तकनीक में समन्वय की गुंजाइश दिखती है। सबसे अहम डी-डॉलराइजेशन यानी डॉलर के प्रभुत्व से मुक्त होने का एक तगड़ा अंडरकरंट नजर आता है, जिससे अमेरिका का परेशान होना बहुत स्वाभाविक है।

लेखिका अंतर्राष्ट्रीय मामलों की जानकार हैं।

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