महामारी के खिलाफ बेदम स्वास्थ्य तंत्र

महामारी के खिलाफ बेदम स्वास्थ्य तंत्र

ऑनिन्दयो चक्रवर्ती

ऑनिन्दयो चक्रवर्ती

लगभग 13 महीने हो गए, मैं और मेरा परिवार घर तक सीमित होकर रह गए हैं। हम वही इस्तेमाल कर रहे हैं जो डिलीवरीमैन दरवाजे तक पहुंचा देते हैं और भुगतान ऑनलाइन करते हैं। इस्तेमाल करने से पहले हम प्रत्येक पदार्थ-वस्तु को धोते या सैनिटाइज़ करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह कि अब हमारे पास कोई घरेलू नौकर नहीं है। इसकी बजाय हमने डिशवॉशर, कपड़े धोने-सुखाने की मशीन और फर्श साफ करने वाला रोबो खरीद लिया है, जिसे स्मार्टफोन एप्लीकेशन से चलाया जा सकता है।

इसलिए अब एक साल से ज्यादा समय से हमारा बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग न के बराबर है। यह इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि मेरी पत्नी और मैं अपना सारा काम घर बैठे कर सकते हैं। यह इसलिए भी हो सका है क्योंकि वक्त-बेवक्त की जरूरत के लिए हमारे पास पर्याप्त बचत भी है। इस आर्थिक सुरक्षा के बल पर मैं घर से बाहर जाकर नयी नौकरी करने या पैसे के बदले व्याख्यान देने की पेशकश ठुकराने का साहस कर पाया हूं।

परंतु ऐसी विलासिता देश के 99 प्रतिशत लोगों को नसीब नहीं है, यहां तक कि चोटी के इस 1 फीसदी वर्ग में भी अधिकांश लोग कोरोना वायरस से बचने के लिए घर पर बैठना गवारा नहीं कर सकते। आज यदि उनके दफ्तर-कार्यस्थल खुल जाएं तो वे काम पर जाना ज्यादा पसंद करेंगे। अन्य भी अपने कारखानों, दुकानों, रेस्तरां और डीलरशिप अदारों की ओर दौड़ लगा लेंगे। केवल वही लोग सफलतापूर्वक एकांत में रह सकते हैं जो बहुत ज्यादा अमीर हैं। हमने देखा है कि संक्रमण की गुंजाइश से बचने को कुछ अति धनाढ्य कॉर्पोरेट मालिकों ने मानो अपने परिवार और कर्मचारियों के इर्द-गिर्द ‘सुरक्षा बुलबुला’ बना लिया है ताकि कुछ भी अंदर न आने पाए। कुछ वे हैं जो शहरों से दूर अपने फार्महाउसों में जाकर रहने लगे हैं, तो चंद ऐसे भी हैं जो निजी हवाई जहाजों से विदेश चले गए हैं। इनके अलावा वे लोग जो काफी समृद्ध हैं, उन्हें भी कहीं न कहीं संक्रमण का जोखिम उठाना ही पड़ता है। और यही वह अवस्था है जब सुरक्षा का सारा गणित गड़बड़ा जाता है। हाल तक भारत में समृद्ध वर्ग को यकीन था कि अगर उन्हें कोविड हो भी गया तो उनके पास पर्याप्त पैसा और संपर्क है, जिसके बल पर वे अस्पतालों में नवीनतम उपकरणों से लैस अलग कमरा ले पाएंगे, जहां प्रत्येक मंजिल पर कई नर्सें और विशेषज्ञ चिकित्सक एक पुकार पर दौड़े आने को तत्पर होते हैं। पैसे वालों ने मेडिकल बीमा पैकेज लेने पर काफी खर्च किया होता है, क्योंकि वे जानते हैं कि भारत में अच्छी स्वास्थ्य सेवा कितनी महंगी पड़ती है।

लेकिन बाकी आम जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का क्या पुरसा हाल है, इस पर हमने कभी ध्यान देना गवारा नहीं किया। भले ही कॉकटेल पार्टियों में मंहगी शराब की चुस्कियां लेता आला वर्ग कभी-कभार स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बहुत कम रखे गए सरकारी बजट को लेकर चिंता जताता दिखाई दे, लेकिन वास्तव में वह कभी इस ओर ध्यान नहीं देता कि हर साल कितने लोग उन बीमारियों से मर जाते हैं, जिन्हें पर्याप्त इलाज से पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। वे अभागे इसलिए मरते हैं क्योंकि उन्हें न तो डॉक्टर नसीब होता है, न ही महंगी दवा खरीदने लायक हैसियत होती है या फिर अस्पताल का बिस्तर तक नसीब नहीं हो पाता।

हकीकत इन आंकड़ों से जाहिर होती है। भारत की कुल 138 करोड़ जनसंख्या के पीछे लगभग 12 लाख पंजीकृत डॉक्टर हैं, अर्थात प्रत्येक 1150 लोगों के लिए एक डॉक्टर। यह अनुपात विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुमोदित सोपान के काफी नजदीक है, जिसमें 1000 लोगों पर 1 डॉक्टर होना अच्छा मानक है। तथापि भारत में अधिकांश डॉक्टर निजी अस्पतालों में काम करते हैं, जो अधिकतर शहरों और कस्बों में केंद्रित हैं। जब बात गरीब की आए, जिसे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की जरूरत है, तो हमारा अनुपात प्रति 12500 व्यक्ति पर केवल 1 डॉक्टर वाला है।

अध्ययन बताते हैं कि 39 फीसदी भारतीयों को मृत्यु से पहले किसी तरह की स्वास्थ्य सुविधा नसीब नहीं हो पाती। अधिकांश के घर के पास या तो चिकित्सक नहीं है या फिर उनके पास फीस भरने लायक पैसे नहीं हैं। जब हालात बहुत बिगड़ जाते हैं तब गरीब को इलाज के लिए कर्ज लेना पड़ता है, अपना गांव छोड़कर अस्पताल के बाहर खुले में रहना पड़ता है। वहां दलाल डॉक्टरों से मिलवाने और फॉर्म भरने तक के पैसे झाड़ लेते हैं। अस्पताल की फार्मेसी पर यह दृश्य आम है कि अनपढ़ व्यक्ति दवा का पर्चा पढ़ने को औरों की मदद लेते हैं। ज्यादातर को छोटे निजी अस्पतालों से इलाज पूरा होने से पहले इसलिए निकाल बाहर किया जाता है, क्योंकि पैसा खत्म हो चुका होता है।

तथ्य तो यह है कि उपचार के लिए उठाया ऋण भारत में कर्जई होने की सबसे बड़ी वजहों में से एक है। वर्ष 2019 का एक अध्ययन बताता है कि मेडिकल-ऋण की वजह से 5.5 करोड़ लोग गरीब श्रेणी में धंस गए। यह ऐसा व्यवस्थात्मक विषय है, जिसे एक के बाद एक आई सरकारों ने नज़रअंदाज़ किया है। 1990 के दशक से, हमारी आधिकारिक नीति स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र द्वारा पैसा लगाने को बढ़ावा देने की रही है, जिसका खमियाजा आम जनता को अपनी जेब कटवाकर भरना पड़ रहा है। लगभग सभी निजी अस्पताल बड़े शहरों में केंद्रित हैं।

निजी अस्पतालों के साथ-साथ स्वास्थ्य बीमा उद्योग भी फलाफूला है। तर्क यह दिया जाता है कि बजाय सरकार नागरिक की स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करे, जनता बतौर एक उपभोक्ता वर्ग, वार्षिक प्रीमियम भरकर इसे अपने लिए सुनिश्चित करे। सच्चाई यह है कि मोदी सरकार ने सरकारी धन से स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचा सुधारने की बजाय स्वास्थ्य बीमा उद्योग को बढ़ावा देने पर जोर दिया है।

इसमें कोई शक नहीं कि आज शहरी मध्य वर्ग की स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच 30 साल पहले के मुकाबले कहीं बेहतर है। स्कैन, एमआरआई और अनेकानेक टेस्ट करवाना बेहद आसान बन गया है। पिछले समय की बनिस्पत जटिल चिकित्सा सुविधा अब ज्यादा अस्पतालों में उपलब्ध है। भारत के नामी अस्पताल और सर्जन विश्व के सर्वोत्कृष्ट और नवीनतम उपकरणों से लैस हैं, जिससे वे मरीजों का जीवनदायिनी इलाज करने में सक्षम हैं। लेकिन कोई भी यह मानने को तैयार नहीं है कि कोविड के इलाज के लिए हरेक को महंगे इलाज की जरूरत नहीं है। तमाम चोटी के डॉक्टर सहमत हैं कि कोविड का इलाज केवल कुछेक सस्ते इलाज विकल्पों से घर पर ही किया जा सकता है। पहला है, पैरासिटामोल की गोली से बुखार पर नियंत्रण रखना। दूसरा सबसे महत्वपूर्ण अवयव है ऑक्सीजन। तीसरा, बहुत कम कीमत वाला स्टीरॉयड डेक्सामिथासोन, जो उन लोगों को दिया जाता है जो पहले से ऑक्सीजन पर हैं। चौथा, खून पतला करने वाली गोली, जो भारत में आम उपलब्ध है। अंत में आती है रेमडेसिवीर, कुछ मामलों में यह अस्पताल में भर्ती होने की अवधि घटा सकती है।

कोविड महामारी ने हमें बता दिया है कि देश को जिस चीज़ की जरूरत है, वह है सबके लिए सरकारी पैसे से मिलने वाला सस्ता इलाज। इंतजामों में चाहिए तो ऑक्सीजन सुविधा वाले बड़े अस्पताल और अच्छी तनख्वाह पाने वाले डॉक्टर जो यह बखूबी जानते हों कि किस मरीज को कौन -सी देखभाल की, कब जरूरत है। उक्त स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपस्थिति, हमारे समक्ष बनी मौजूदा त्रासदी का बड़ा कारण है। यह समय भारत की नीति और दिशा को काफी हद तक प्रभावित करने वाले समृद्ध मध्य वर्ग के लिए जाग्रत होने का है कि मेडिकल बीमा कितना भी करवा रखा हो या उच्चस्तरीय उपकरण हों, केवल इनके दम पर संकट से नहीं निपटा जा सकता, जब तक बाकी बहुसंख्यक समाज स्वस्थ न रहे।

लेखक आर्थिक मामलों के वरिष्ठ विश्लेषक हैं।

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