किताबें सचमुच बहुत कुछ कहना चाहती हैं बशर्ते वे काट-छांटवाली क्लिप्स बनकर न रह जाए। नहीं क्या?
वैसे तो जी देखो, यह नया भारत है। इसमें पुराने भारत वाली कोई चीज़ चलती नहीं। लेकिन कुछ कहावतें ऐसी हैं, जो इस नए भारत में भी चल रही हैं। जैसे एक कहावत है कि बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भीख। नहीं भीख, भूख की बात नहीं है। अब तो देश की वित्त मंत्री ही भूख की बात नहीं मान रही, तो हम यह बेकार की बात क्यों करें। हम तो कहावत की बात कर रहे हैं और यह कहावत भी इसलिए याद आ गयी कि पिछले दिनों दिल्ली में जब विश्व पुस्तक मेला चल रहा था तो लोग यह शिकायत करते पाए गए कि किताबों को कोई नहीं पूछ रहा। लेखक, प्रकाशक सब बेचारे परेशान थे। रहे पाठक, तो जी जब दर्शक ही सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच रहे तो पाठक ही किताबों तक कैसे पहुंचेंगे बताओ।
बताते हैं कि दर्शक तो टीवी चैनलों तक को न मिल रहे, तो किताबों को ही पाठक कहां से मिल जाएंगे। लेकिन फिर वही हुआ जी, कहावत वाला मामला कि बिन मांगे मोती मिले और मांगे मिले न भीख। जहां विश्व पुस्तक मेले में किताबों को कोई नहीं पूछ रहा था, वही संसद में उनकी इतनी पूछ हुई कि बस पूछो ही मत। वरना तो जी राज्य विधानसभाओं में तो आमतौर पर हमारे चुने हुए प्रतिनिधि वो वाले आपत्तिजनक वीडियो देखते हुए ही पाए जाते रहे हैं।
लेकिन अच्छी बात यह रही कि देश की संसद में यह भी और वो भी किताबों की बात करते हुए पाए गए। किताब इनके हाथ में भी थी और किताब उनके हाथ में भी थी। यह भी अपने भाषण में किताबों को ही उद्धृत करना चाहते थे और वे भी अपने भाषण में किताबों को ही उद्धृत कर रहे थे। एक जमाने में सफदर की वो कविता बड़ी मकबूल हुई थी जी कि किताबें कुछ कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं। लगता है कि किताबें आज भी बहुत कुछ कहना चाहती हैं। अगर कुछ नई बातें कहना चाहती हैं तो कुछ पुरानी बातों को दोहराना चाहती हैं। वरना तो टीवी एंकरों की चीख-चिल्लाहट ऐसी है कि हमेशा यही शिकायत रहती है कि कायदे की कोई बात होती ही नहीं।
ऐसे में समस्या बस एक ही है कि कहीं किताबों के उद्धरण भी अपनी-अपनी पार्टियों के आईटी सेलों द्वारा संदर्भों से काटकर डाली जाने वाली वो काट-छांटवाली क्लिपें बनकर ही न रह जाए, जिनका किसी तरह के गंभीर विमर्श से कोई लेना-देना नहीं होता है। वे सिर्फ टांग खिंचाई के लिए, एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के लिए और एक-दूसरे की खिल्ली उड़ाने के लिए ही होती हैं। किताबें सचमुच बहुत कुछ कहना चाहती हैं बशर्ते वे काट-छांटवाली क्लिप्स बनकर न रह जाए। नहीं क्या?

