आसान नहीं भाजपा की पंजाब में वर्चस्व की राह
पंजाब के दौरों के दौरान, मोदी-शाह की जोड़ी ने न तो पंजाब के मूल मुद्दों को छुआ और न ही राज्य को मौजूदा मुश्किल हालात से निकालने के लिए कोई सोची-समझी योजना पेश की। क्या भाजपा के पास पंजाब को...
पंजाब के दौरों के दौरान, मोदी-शाह की जोड़ी ने न तो पंजाब के मूल मुद्दों को छुआ और न ही राज्य को मौजूदा मुश्किल हालात से निकालने के लिए कोई सोची-समझी योजना पेश की। क्या भाजपा के पास पंजाब को उस ‘आर्थिक संकट’ से बचाने का वह दृष्टिकोण है, जिसकी कमी के लिए अतीत की सत्ताधारी पार्टियां कुख्यात रही हैं?
गत चौदह मार्च को मोगा में अपनी बहुप्रचारित रैली की शुरुआत करते हुए अमित शाह को पगड़ी पहने और सिखों का लोकप्रिय जयघोष करते देखना एक दिलचस्प नज़ारा था। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अक्सर सिख सभाओं में पगड़ी पहनकर आते हैं। जो कोई भी भाजपा नेताओं को सिखों को लुभाने के वास्ते ऐसे हास्यास्पद सुझाव देता है, उसे पंजाब से जुड़े किसी भी राजनीतिक मामले पर सलाह देने से स्थाई तौर पर रोक देना चाहिए।
यह कोई राज़ नहीं है कि भाजपा में फ़ैसले शीर्ष स्तर पर लिए जाते हैं। यहां तक कि मीडिया को इंटरव्यू देने के लिए भी केंद्रीय नेतृत्व की मंज़ूरी ज़रूरी रहती है। जाहिर है, आने वाले विधानसभा चुनावों में चुनाव अकेले लड़ने के पार्टी के फ़ैसले का ऐलान करने से पहले अमित शाह ने सुनील जाखड़ और कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे स्थानीय पार्टी नेताओं से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया था। जबकि कांग्रेस के ये दोनों पूर्व दिग्गज नेता सार्वजनिक तौर पर शिरोमणि अकाली दल के साथ चुनावी गठबंधन करने की वकालत कर रहे थे। यह रवनीत सिंह बिट्टू ही थे जिन्होंने ऐसे किसी भी गठबंधन का ज़ोरदार विरोध किया है; ऐसे में अगर कल को उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बना दिया जाए, तो कोई हैरत नहीं।
स्थानीय लोगों के साथ सार्थक संवाद के अभाव में, गृह मंत्री ने अपने भाषण में पसंदीदा अलगाव के मुद्दों में से एक का सहारा लिया—धर्मांतरण। भाजपा जिस ‘बदलाव’ का वादा कर रही है, यदि उसमें धर्मांतरण-विरोधी क़ानून भी शामिल है, तो चुनावी लिहाज़ से उसे कोई ख़ास सफलता नहीं मिलेगी। धर्मांतरण कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जो आम पंजाबियों को परेशान कर रहा हो। मामूली आर्थिक फ़ायदों के लिए ईसाई धर्म अपनाने वाले ग़रीब लोगों से समाज या राज्य को कोई ख़तरा नहीं है। सबको अपने साथ लेकर चलने वाला पंजाब, धार्मिक आधार पर समाज में अलगाव से चुनाव जीतने के भाजपा के एजेंडे को आसानी से स्वीकार नहीं करेगा।
आम तौर पर पंजाबी लोग अहंकारी नेताओं को सत्ता से बाहर करने के लिए वोट देते हैं। उनकी कोई पसंदीदा पार्टी शायद ही कभी रही है। पिछले चुनावों में आम आदमी पार्टी को मिली ज़बरदस्त जीत का श्रेय ‘आप’ के नेतृत्व से किसी बड़ी उम्मीद के बजाय, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के कुशासन के लिए उन्हें दी गई सज़ा को ज़्यादा जाता है। हो सकता है कि अब वे ‘आप’ से भी मोहभंग महसूस कर रहे हों, लेकिन वे इतने नाराज़ भी नहीं हैं कि उसे सत्ता से ही बेदख़ल कर दें।
सिख राजनीतिक विचारक और लेखक, अजमेर सिंह के अनुसार ‘भाजपा ने हरियाणा में जाटों को अलग-थलग करके और गैर-जाटों को एकजुट करके चुनाव जीता था। पंजाब में भी वह यही रणनीति अपना सकती है—सिख जाट वोटों को बांटना और हिंदू, अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग वोटों को एकजुट करना’। डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख को पद्मश्री से सम्मानित करना और उसके बाद दलित बहुल इलाके में गुरु रविदास को श्रद्धांजलि देने के लिए पीएम मोदी का डेरा दौरा, ज़ाहिर तौर पर इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
पंजाब के कुल वोटों में दलितों की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत है और जालंधर, कपूरथला, नवांशहर और होशियारपुर—इन चार ज़िलों की 117 विधानसभा सीटों में से 23 सीटों के नतीजों में वे निर्णायक भूमिका निभाते हैं। दलितों के बीच रविदासिया समुदाय एक बड़ा हिस्सा है। भाजपा इसी समुदाय पर दांव लगा रही है। भाजपा की इस चुनावी रणनीति को एक और चीज़ से भी मदद मिल रही है—दोषी डेरा प्रमुख राम रहीम की बार-बार पैरोल पर रिहाई। पंजाब के मालवा इलाके के कुछ हिस्सों में राम रहीम के बहुत सारे अनुयायी हैं और फिलहाल उसका पसंदीदा दल भाजपा है। ब्यास स्थित राधा स्वामी डेरा आमतौर पर राजनीतिक रूप से तटस्थ रहता है।
भाजपा की दलितों तक पहुंच बनाने की कोशिश भी शायद ही कामयाब हो जाए, क्योंकि पंजाब में अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटर बंटे हुए हैं और अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों का समर्थन करते हैं। यही वजह है कि बहुजन समाज पार्टी पंजाब में ज़्यादा कामयाबी हासिल नहीं कर पाई। और इसीलिए भाजपा के लिए हरियाणा वाली सफलता को पंजाब में दोहराना मुश्किल होगा। यहां पर हालात पूरी तरह से उसके अनुकूल नहीं हैं। सिख आमतौर पर भाजपा से दूरी बनाकर रखते हैं, क्योंकि भाजपा की राजनीति भड़काऊ होती है, एजेंडा सांप्रदायिक केंद्रित होता है, और वह डेरों को संरक्षण देती है। सिखों का मुख्य सिद्धांत है ‘सरबत दा भला’ (सबका कल्याण)। पंजाबी स्वभाव से ही धर्मनिरपेक्ष होते हैं। उग्रवाद के चरम पर होने के समय भी, गंभीर उकसावों के बावजूद, कोई बड़ा सांप्रदायिक विभाजन नहीं हुआ था।
सिखों को लुभाने के वास्ते, भाजपा ने पगड़ीधारी कई नेताओं को पार्टी में शामिल किया है। राजनीति को धर्म से जोड़ते हुए, वह अक्सर गुरु तेग बहादुर और साहिबजादों के सर्वोच्च बलिदानों को याद करती है, और करतारपुर साहिब कॉरिडोर खोलने के बारे में दावे करती है; लेकिन इन सब बातों का कोई खास असर नहीं होता। इसके विपरीत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का लगातार दोहराया जाने वाला यह नज़रिया कि सिख भी हिंदुओं का ही हिस्सा हैं, इस समुदाय को विशेष रूप से नाराज़ करता है। पंजाब यूनिवर्सिटी में कैंपस पर ‘भगवा वर्चस्व’ की कोशिशों के खिलाफ प्रदर्शन हुए थे।
भाजपा की सत्ता पाने की कोशिश का समर्थन किसानों और खेतिहर मज़दूरों द्वारा करने की संभावना कम ही है। पहले ही, तीन विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के साल भर चले विरोध प्रदर्शनों ने भाजपा नेतृत्व को बैकफुट पर धकेल रखा है। तिस पर ‘बीज विधेयक’, ‘बिजली विधेयक’ और अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते ने उन्हें फिर से आंदोलन की राह पर ला खड़ा किया है। मोगा में अमित शाह किसानों की चिंताओं को दूर करने के लिए उनसे बात कर सकते थे।
भाजपा की राष्ट्रीय आर्थिक नीतियां भी पंजाब को रास नहीं आती। इन नीतियों से आज़ादी के बाद पहली बार इतनी ज़्यादा आर्थिक असमानता देखने को मिली है, और मुट्ठी भर ‘गोदी सेठों’ के हाथों में अकूत संपत्ति जमा हो गई है। धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना, समाज में भय को हवा देना, और लोगों का ध्यान भटकाने वाली राजनीति करना—ये सब भले ही व्यापक आर्थिक संकट को छिपा लें और चुनावी जीत दिला दें, लेकिन अंत में जीत हमेशा सच्चाई की ही होती है।
पंजाब के दौरों के दौरान, मोदी-शाह की जोड़ी ने न तो पंजाब के मूल मुद्दों को छुआ और न ही राज्य को मौजूदा मुश्किल हालात से निकालने के लिए कोई सोची-समझी योजना पेश की। क्या भाजपा के पास पंजाब को उस ‘आर्थिक संकट’ से बचाने का वह दृष्टिकोण है, जिसकी कमी के लिए अतीत की सत्ताधारी पार्टियां कुख्यात रही हैं? क्या यह राज्य के सिर चढ़े उस कर्ज़ का बोझ हल्का करने में मदद कर सकती है, जो पिछले कई सालों में बेतरह ज्यादा खर्च, सोचे-समझे बिना कर्ज़ लेने और ‘रेवड़ी योजनाओं’ में पैसे की बर्बादी की वजह से जमा हो गया है?
तथापि सूबे में अपने अब तक के निराशाजनक प्रदर्शन और सत्ता तक पहुंचने के रास्ते में आने वाली ढेरों रुकावटों के बावजूद, इस बार भाजपा की पंजाब में पैठ बनाने की कोशिश को हल्के में नहीं लेना चाहिए। भाजपा की ‘वोट जीतने वाली मशीन’ की ताकत और पहुंच को कम करके नहीं आंकना चाहिए। इसके संगठनात्मक कौशल, आर्थिक ताकत, आरएसएस का समर्थन और एक ‘अनुकूल’ चुनाव आयोग, ये ऐसे बेजोड़ फायदे हैं जिनका कोई तोड़ नहीं है। पार्टी नेतृत्व की राजनीतिक रणनीतियां और जातिगत समीकरण अक्सर मनचाहे नतीजे देते हैं।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

