तिरछी नज़र

बिन परीक्षा पास और भविष्य की आस

बिन परीक्षा पास और भविष्य की आस

सौरभ जैन

सौरभ जैन

इस समय हर बरस परीक्षा परिणामों के आने का मौसम होता था। जबकि इस बरस परीक्षा का होना ही नसीब नहीं हुआ है। अब कोरोना की मेहरबानियों की बदौलत बिना परीक्षा के ही परिणाम देखने को मिलेंगे। मार्च-अप्रैल में 12वीं बोर्ड परीक्षा से मुक्त हो जाने वाले बच्चे मई-जून तक परीक्षा होगी या नहीं होगी, की आशंका के साथ पढ़ाई करते रहे और परिणाम परीक्षा रद्द होने के सामने आ गए।

बच्चों के माता-पिता अगले साल स्कूल, कोचिंग की फीस भरें या रहने दें, इस सवाल को लेकर परेशान हो रहे हैं। वही 99.9 प्रतिशत अंक अर्जित करने वाले टॉपर संग इंटरव्यू करने को बेकरार रहने वाले न्यूज एंकर का दिल ही टूट गया है। वैसे भी साल में उन्हें एक ही दिन ऐसा मिलता था जब वे पढ़ाई में अव्वल आने वाले बच्चों से बात कर पाते थे। वरना बाकी दिनों में होने वाली डिबेट में भाग लेने वालों की भाषा सुनकर तो उनकी प्राथमिक शिक्षा पर ही संदेह होने लगता है।

परीक्षा रद्द करने के इस निर्णय से वे बच्चे दुखी हैं, जिनके माता-पिता ने ‘बेटा 12वीं की परीक्षा हो जाए, फिर आईफोन दिला देंगे’ बोला था। छोटू तो इस बात से मायूस है कि वीडियो गेम खेलने के साथ-साथ पढ़ाई करने में उसने वीडियो गेम के साथ कितना अन्याय कर दिया। इतना ही नहीं, प्रिंटिंग प्रेस वाले कोचिंग संस्थानों के साथ मिले सुर मेरा तुम्हारा गाते नजर आ रहे हैं। अबकी बार होर्डिंग्स पर किसकी तस्वीर लगाएंगे, यह संकट आन पड़ा है। टॉपर्स का सैलाब लाने वाले संस्थान परीक्षा रद्द होने से होर्डिंग्स के लिए बंदों को तरस गए हैं। वे चाहें तो नेताओं की तस्वीरों का उपयोग कर इस परंपरा को खंडित होने से बचा ही सकते हैं।

वैसे देखा जाए तो हमसे कुछ समय पहले एक बड़ी चूक हो गई, हम चुनाव का नाम बोर्ड परीक्षा करना भूल गए। यदि हम नाम बदल देते तो एक बड़ी भूल सुधर जाती और एक बड़ी समस्या भी टल जाती। खैर! चुनाव के परिणामों ने तब की भूल को अब सुधारने का मौका दिया है। सरकार चुनाव में फेल हो गई और बच्चे परीक्षा में पास हो गए। अब बच्चे तो मन के सच्चे होते हैं, 11वीं वाले बच्चों ने अब यह दुआ मांग ली कि उनकी 12वीं भी ऐसी ही निकले, तो क्या होगा? इतना तो तय है कि हर साल परीक्षा से पहले बच्चे परीक्षा पर चर्चा की मांग जरूर करेंगे।

यदि हमारे जमाने में भी 12वीं की परीक्षा इसी तरह रद्द हुआ करती तो सिर्फ इतना सा अंतर होता कि आज हम परीक्षा पास करके नौकरी तलाश रहे हैं, तब बिना परीक्षा दिए ही काम के लिए भटक रहे होते। अब माता-पिता को अपने लाल की आगे की पढ़ाई की चिंता सता रही है। उनका लाल अब पढ़ाई का क्या करेगा? पढ़ाई का तो पता नहीं लेकिन यू-ट्यूब पर पीएम के हर वीडियो को लाइक जरूर करेगा। बोर्ड परीक्षाओं को रद्द करके सरकार ने पेड़ों को कटने से भी बचा लिया है। परीक्षाओं के रद्द होने में पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी छिपा हुआ है।

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