राजनीतिक हिंसा से रक्तरंजित भद्रभूमि

राजनीतिक हिंसा से रक्तरंजित भद्रभूमि

उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी

पश्चिम बंगाल में इन दिनों एक शब्द बेहद प्रचलन में है। बांग्ला के इस शब्द को आप हर दूसरे बंगाली के मुंह से सुन सकते हैं। यह शब्द है संत्रास। आमतौर पर हिंदी में इसका प्रयोग उस दुख के लिए होता है, जिसमें घुटन भी हो। लेकिन बांग्ला में इसको एक और अर्थ में भी लिया जाता है, जिसका मतलब होता है आतंक।

हिमालय की तलहटी से लेकर पद्मा, भागीरथी और गंगा नदियों के मैदान से होते हुए बंगाल की खाड़ी तक फैले इस अनूठे राज्य और यहां के लोगों की ख्याति इसकी अनूठी सभ्यता के लिए रही है। लेकिन अब यह राज्य संत्रास के लिए कुख्यात हो रहा है। राज्य में शायद ही कोई दिन हो, जब इस शब्द का इस्तेमाल सार्वजनिक तौर पर ना होता हो। इसकी वजह है यहां लगातार जारी राजनीतिक हिंसा। पश्चिम बंगाल की लोकतांत्रिक रणभूमि पर ममता बनर्जी को चुनौती दे रही भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस शब्द का प्रयोग कुछ ज्यादा ही हो रहा है। और हो भी क्यों नहीं? इसी राज्य में पिछले साल दस दिसंबर को भाजपाध्यक्ष नड्डा पर जिस डायमंड हार्बर इलाके में हमला हुआ था, वह ममता बनर्जी के भतीजे और तृणमूल कांग्रेस के नंबर दो अभिषेक बनर्जी का चुनाव क्षेत्र है।

इसके बाद भाजपा जहां पश्चिम बंगाल की सरकार को कठघरे में खड़ा करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही, वहीं तृणमूल कांग्रेस इसे नौटंकी बता रही है। दिलचस्प यह है कि इस पूरे खेल में पश्चिम बंगाल में जहां तक इस हिंसा को रोकने की कवायद होनी चाहिए थी, वह होती हुई नहीं दिख रही है। इसलिए जब भी मौका मिलता है, भाजपा ममता बनर्जी के राज में संत्रास यानी आतंक बढ़ने का दावा करती है। पार्टी यह भी जताने की कोशिश करती है कि वही अकेली पार्टी है, जो सत्ता में आई तो इस राजनीतिक हिंसा पर लगाम कसेगी और पश्चिम बंगाल में जमीनी बदलाव लाएगी।

पश्चिम बंगाल में संत्रास का आरोप लगाने के लिए भाजपा के पास ठोस आधार हैं। वैसे उसके सारे नेता आए दिन सभाओं में पश्चिम बंगाल में अपने कार्यकर्ताओं की हत्या किए जाने, उन पर हमला करने का आरोप लगाते रहते हैं। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ तक खुलेआम राज्य की प्रशासनिक मशीनरी के राजनीतिकरण और उसके चलते राज्य में हो रही हिंसा के लिए तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। पश्चिम बंगाल के भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष दिलीप घोष तो केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर दिसंबर में ही अपने कार्यकर्ताओं पर बढ़ने वाली हिंसा की आशंका जता चुके हैं।

लेकिन हिंसा है कि रुकने का नाम नहीं ले रही। पश्चिम बंगाल के चुनावी दौरे पर आने वाले भाजपा के केंद्रीय नेता हों या फिर राज्य के नेता, सब इन दिनों एक आंकड़ा जरूर दोहराते हैं। उनका कहना है कि साल 2016 से जारी हिंसा में अब तक उसके 130 कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की तस्दीक राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी करते हैं। साल 2019 की रिपोर्ट में इस रिकॉर्ड के मुताबिक पूरे देश में 61 राजनीतिक हत्याएं हुईं। लेकिन इनमें सबसे ज्यादा लोग पश्चिम बंगाल में मारे गए। ब्यूरो के मुताबिक यह संख्या 12 है। ब्यूरो का यह भी कहना है कि बंगाल सरकार द्वारा 30 सितंबर 2018 तक के उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के आधार पर उसने यह रिपोर्ट तैयार की है। ब्यूरो का यह भी कहना है कि अगर राज्य सरकार और भी आंकड़े दे तो इसमें और बढ़ोतरी हो सकती है।

ब्यूरो के मुताबिक, राजनीतिक हत्याओं की उसकी सूची में पश्चिम बंगाल के बाद बिहार और झारखंड का नंबर दूसरा रहा, जहां छह-छह मामले सामने आए। पांच राजनीतिक हत्याओं के साथ आंध्र प्रदेश इस सूची में तीसरे नंबर पर रहा। ब्यूरो के मुताबिक साल 2018 की रिपोर्ट में पूरे देश में 54 राजनीतिक हत्याएं हुईं, जिनमें से सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल में हुईं, जो 12 थीं।

जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल में चुनाव नजदीक आ रहे हैं, यहां राजनीतिक हमलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जनवरी आखिर तक तो 13 हत्याओं की रिपोर्ट सामने आ चुकी है। इस बीच भाजपा का दावा है कि पिछले साल उसके 54 कार्यकर्ताओं के परिवारों को निशाना बनाया गया। हालांकि ममता बनर्जी और उनकी सरकार इससे इनकार करती है। भाजपा के पास तृणमूल सरकार पर आरोप लगाने का ठोस आधार वहां घट रही घटनाएं दे रही हैं। पार्टी अध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा पर हुए हमले को छोड़ दें तो साल 2002 में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिनमें उसके प्रमुख कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया। ज्यादातर मामलों में असली अपराधी या तो पकड़े नहीं गए या फिर उन पर राजनीतिक हमले की बात साबित नहीं हुई। भाजपा इसके लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराती है।

दरअसल, पिछले साल 13 जुलाई, 2020 को उत्तर दिनाजपुर ज़िले में हेमताबाद क्षेत्र के विधायक देवेंद्र नाथ रॉय की लाश बाज़ार में फांसी के फंदे से लटकी मिली थी। रॉय यूं तो 2016 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम के टिकट पर चुने गए थे। हालांकि मौत से कुछ ही महीने पहले उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था। बीजेपी का आरोप है कि उनकी हत्या की गई, जबकि प्रशासन और तृणमूल कांग्रेस इसे आत्महत्या का मामला बताती रही है।

वैसे निशाने पर तृणमूल कांग्रेस के नेता भी रहे। हालांकि इसकी संख्या बेहद कम है। नौ फ़रवरी 2019 को नदिया ज़िले की कृष्णागंज विधानसभा सीट से तृणमूल कांग्रेस के विधायक सत्यजीत बिस्वास पर सरस्वती पूजा के कार्यक्रम में खुलेआम गोलियां चलाई गईं। इसी तरह 4 अक्तूबर, 2020 को कोलकाता के पास उत्तर 24 परगना ज़िले के टीटागढ़ में बीजेपी के स्थानीय युवा नेता मनीष शुक्ला को सरेआम गोली मार दी गई। माना गया कि उनकी हत्या के पीछे तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व का हाथ रहा।

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हत्या को राष्ट्रीय सुर्खी 2018 में मिली, जब मई महीने में पुरुलिया ज़िले के भाजपा कार्यकर्ता त्रिलोचन महतो की लाश सरेआम पेड़ से लटकी मिली। उनके कपड़े पर अपराधियों ने एक संदेश लिख छोड़ा था, जिसका मतलब साफ था कि जो भी भाजपा के साथ जाएगा, उसका यही हश्र होगा।

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की संस्कृति की शुरुआत पिछली सदी के सत्तर के दशक में हुई। जब नक्सलबाड़ी आंदोलन अपने पूरे उफान पर था। हिंसा पर काबू पाने में तत्कालीन राज्यपाल धर्मवीर और कांग्रेस मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे कामयाब तो रहे, लेकिन इसके बाद कांग्रेस जो सत्ता से गई तो फिर वापस ही नहीं लौटी। वाममोर्चे के 34 साल के शासन में भी संगठित रूप से राजनीतिक हिंसा का आरोप लगा और इसी आधार पर ममता बनर्जी ने अपना आधार राज्य में मजबूत किया। सिंगूर और नंदीग्राम के संघर्ष ने उन्हें बढ़त दी और 34 साल तक अजेय गढ़ रहे पश्चिम बंगाल से लाल झंडे को उन्होंने उखाड़ फेंका।

जानकार मानते हैं कि जैसे-जैसे राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक आएंगे, राज्य में राजनीतिक हिंसा और बढ़ेगी। अलबत्ता राज्य में राजनीतिक हिंसा रोकने की दिशा में चुनाव आयोग ने कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। राज्य में भारी संख्या में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती इसकी शुरुआत है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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