गृह मंत्रालय का परामर्श

जमीनी हकीकत बदलने में बरतें ईमानदारी

जमीनी हकीकत बदलने में बरतें ईमानदारी

अनूप भटनागर

अनूप भटनागर

हाथरस में दलित लड़की से कथित सामूहिक बलात्कार और उसकी हत्या की घटना से देश भर में उभरे आक्रोश के बाद एक बार फिर औपचारिकता निभाते हुए मामले की जांच दो महीने के भीतर पूरी करने का परामर्श जारी किया गया है। सरकार ने पिछले साल दिसंबर में हैदराबाद व उन्नाव में बलात्कार पीड़ित को जिन्दा जलाये जाने की घटना के बाद भी इसी तरह का सख्त रुख अपनाया था। इस बार गृह मंत्रालय ने राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों के लिये परामर्श जारी किया है जबकि पिछले साल दिसंबर में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी ऐसे मामलों की जांच दो महीने के भीतर पूरी करने पर जोर देते हुए सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखे थे।

अब हाथरस कांड के बाद गृह मंत्रालय ने राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में अनिवार्य कार्रवाई करने और ऐसे मामलों की जांच दो महीने में पूरी करने तथा मृत्यु के समय दिये गये बयान को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं करने के लिये कहा है कि वह मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज नहीं किया गया है।

इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि 2018 में कानून में संशोधन के माध्यम से पहले ही यह प्रावधान किया जा चुका है कि बलात्कार की घटनाओं की जांच का काम दो महीने के भीतर पूरा करना होगा लेकिन अक्सर देखा गया है कि जांच अधिकारी या जांच एजेन्सियां इस अवधि में अपनी जांच पूरी नहीं कर पाते हैं। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन हकीकत यही है। दरअसल यौन हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर कारगर तरीके से अंकुश लगाने के लिये जनता और राजनीतिक दलों के दबाव में कानून तो बन गया लेकिन कानून में इस प्रावधान से जुड़ी महत्वपूर्ण जरूरतों की ओर गंभीरता से ध्यान ही नहीं दिया गया।

यही वजह है कि आज भी देश में इस तरह के अपराधों की जांच के लिये पर्याप्त संख्या में अपराध विज्ञान प्रयोगशालायें नहीं हैं। जो प्रयोगशालायें हैं, उनमें पर्याप्त संख्या में चिकित्सक और प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं। ऐसी स्थिति में दो महीने के भीतर जांच पूरी करने के कानूनी प्रावधान और गृह मंत्रालय के परामर्श की गंभीरता की सहज ही कल्पना की जा सकती है।

वर्ष 2012 के निर्भया कांड के बाद 2013 में कानून में प्रावधान किया गया कि ऐसे मामलों में आरोप पत्र दाखिल होने के बाद दो महीने में ऐसे मुकदमों की सुनवाई पूरी करनी होगी और इसके लिये त्वरित अदालतें गठित की जायेंगी। लेकिन क्या आरोप पत्र दाखिल होने के बाद दो महीने में मुकदमे की सुनवाई पूरी हो रही है। कानून में कठोर सजा और शीघ्र न्याय का प्रावधान करने के बाद सरकार यह मान लेती है कि उसकी जिम्मेदारी पूरी हो गयी। लेकिन कानूनी प्रावधानों के अमल के मामले में अक्सर ढुलमुल रवैया अपनाया जाता रहा है और अंत में न्यायपालिका को ही इसमें हस्तक्षेप करना पड़ता है।

इसी कानून में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की सुनवाई के लिये विशष अदालतें गठित करने का प्रावधान किया गया लेकिन छह साल बाद 2019 में गांधी जयंती के अवसर पर 1023 विशेष त्वरित अदालतें स्थापित करने का काम शुरू किया गया। यह भी केंद्र-राज्यों की उदासीनता के बाद शीर्ष न्यायालय की सख्ती की वजह से संभव हो पाया। न्यायालय की बदौलत ही यह भी संभव हुआ कि इन 1023 त्वरित अदालतों में से 389 अदालतें सिर्फ बच्चों के यौन शोषण के अपराध से संबंधित मुकदमों की सुनवाई करेंगी।

किशोरियों के साथ यौन हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर उच्चतम न्यायालय ने कई बार सरकार को आड़े हाथ लिया और जानना चाहा कि पोक्सो कानून के तहत मुकदमों की सुनवाई के लिये पर्याप्त संख्या में त्वरित अदालतें क्यों नहीं हैं? देश में पर्याप्त संख्या में अपराध विज्ञान प्रयोगशालायें क्यों नहीं हैं? न्यायालय अपराध विज्ञान प्रयोगशालाओं में बड़ी संख्या में पद रिक्त होने के मामले में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक सहित कुछ राज्यों पर जुर्माना भी कर चुका है। इस समय हैदराबाद, कोलकाता, चंडीगढ़, नयी दिल्ली, गुवाहाटी, भोपाल और पुणे में केन्द्रीय फारेंसिक साइंस प्रयोगशालायें हैं जबकि राज्य सरकारों के अंतर्गत भी करीब 30 फारेंसिक साइंस प्रयोगशालायें है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इन प्रयोगशालाओं की कम संख्या पर चिंता व्यक्त कर चुका है, जिसकी वजह से सामूहिक बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों की वैज्ञानिक जांच की रिपोर्ट समय पर नहीं मिलती है जो मुकदमों की सुनवाई में विलंब का एक बड़ा कारण बन जाती है। यदि सरकार मामले में गंभीर है तो उसे त्वरित अदालतों की संख्या बढ़ाने के साथ ही इसमें महिला न्यायाधीशों की संख्या बढ़ानी होगी। इससे पहले, सरकार को जांच व्यवस्था को दुरुस्त करने के साथ ही फारेंसिक साइंस प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ानी होगी तथा यह सुनिश्चित करना होगा कि मौजूदा प्रयोगशालाओं में चिकित्सकों और दूसरे कर्मचारियों का कोई भी पद रिक्त नहीं रहे।

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