एक ज़माना था जब बाराती राजा हुआ करते थे। लड़की वाले यूं खातिर करते थे जैसे कोई समधी नहीं, सम्राट आ गया हो।
हाल ही में मैंने एक ऐसी शादी देखी, जिसमें लड़के वालों ने दूल्हा पक्ष के रिश्तेदारों की छाती पर बिल्ला टांग दिया- जिस पर मोटे अक्षरों में लिखा था- दूल्हे वाले। वाह! क्या इनोवेशन है। अब बाराती की पहचान बिल्ले से हो रही है। यह बिल्ला देखकर पास खड़ा एक ताऊ बोला- बेट्टा आगले ब्याह म्ह तो गले में पट्टा डालना पड़ैगा दीखै, मखां बाराती दूर तै ए दिख ज्यै।
एक ज़माना था जब बाराती राजा हुआ करते थे। लड़की वाले यूं खातिर करते थे जैसे कोई समधी नहीं, सम्राट आ गया हो। लड़की वाले उन्हें सिर पर बैठाते थे। पानी पूछने से पहले कुर्सी पूछी जाती थी और कुर्सी से पहले झुकझुक कर इज्जत दी जाती थी। बाराती होना कोई पहचानपत्र नहीं बल्कि सम्मान का पासपोर्ट हुआ करता था।
विवाह में सबसे ज्यादा खोया हुआ आदमी अगर कोई है तो वह बाराती है जिसे खुद नहीं पता कि वह किस हैसियत से पंडाल में भटक रहा है। न पहचान, न इज्ज़त, न ठिकाना। बिल्ला न लगा हो तो आदमी शादी में ऐसे घूमता है जैसे वोटर लिस्ट में नाम कट गया हो।
पहले लड़की वाले डरते थे कि कहीं किसी बात पर बारात रूठ न जाए। अब लड़के वालों के पसीने छूटते हैं कहीं बाराती भूखे न रह जाएं। पहले ब्याह में बारात की पूछ थी, अब पूछताछ है। आज का बाराती खुद बताता फिरता है कि मैं दूल्हे का फूफा हूं सगे वाला। ये आजकल के ब्याह सच में ब्याह कम और पहचान परेड ज्यादा लगते हैं। कुल मिलाकर साफ है कि आजकल शादी में अगर किसी की सबसे ज्यादा दुर्दशा है तो वह है बेचारा बाराती जो राजा से सीधा रजिस्टर नंबर बन गया।
शादी में खाना है, लाइट है, डीजे है पर बाराती का कोई अता-पता नहीं। कभी वह रिश्तेदार समझ लिया जाता है, कभी इधर-उधर खड़ा कैटरर का व्यक्ति समझ लिया जाता है। सच यह है कि विवाह की पूरी व्यवस्था बदल गई है। बाराती और घराती गड्मड हो गये हैं। शायद आने वाले समय में बारातियों के लिए अलग से रजिस्ट्रेशन काउंटर बनेंगे। नाम, रिश्ता, प्लेट नंबर और जीमने का अधिकार। राजा से राहगीर बनने का यह सफर इतिहास में ‘बाराती युगांत’ के नाम से दर्ज होगा।
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एक बर की बात है अक नत्थू अपणे ढब्बी की बरात म्ह गया। जीम्मण बैठ्या तो माल चेपता गया। छोरी का भाई सुरजा लाड़ म्ह बोल्या अक एक लाड्डू तो और लेओ जी। नत्थू हाथ आग्गै सी करकै बोल्या- ना भाई मन्नै तो पूरे पांच लाड्डू खा लिये। सुरजा बोल्या- थम लेओ अर चाहे ना लेओ पर खाये थमनैं सात हैं।

