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भारतीय भूमि अतिक्रमण मुद्दे पर घिरे बालेन्द्र

नेपाल

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अब तक नेपाल के किसी भी प्रधानमंत्री ने ऐसा बयान संसद में नहीं दिया था कि भारतीय भूमि को उनके देश ने भी क़ब्ज़ा कर रखा है। बालेन्द्र शाह को अब बताना है, कि नेपाल ने किन-किन जगहों पर भारतीय भूमि का हरण किया है।

गत 27 मार्च को पद संभालने के बाद से प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने एक बार भी संघीय संसद को संबोधित नहीं किया था—यहां तक कि अनिवार्य साप्ताहिक प्रश्न-उत्तर सत्रों के दौरान भी नहीं। उनकी चुप्पी तोड़ने और विधायिका के प्रति जवाबदेही दिखाने का दबाव उन पर लगातार बढ़ रहा था। और फिर रविवार को जब बालेन्द्र शाह संसद में बोले, सभी सन्नाटे में आ चुके थे। उन्होंने अपने आलोचकों को शांत करने के बजाय, मानो डंक मारने वाली मधुमक्खियों का एक झुंड ही छोड़ दिया। जिसे अंग्रेजी में ‘पैंडोरा बॉक्स खोलना’ कहते हैं।

संसद में दो अलग-अलग सवालों का जवाब देते हुए, शाह ने सबसे पहले कहा कि कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख विवाद को सुलझाने के लिए भारत के साथ प्रयास जारी हैं। लेकिन, फिर उन्होंने यह भी जोड़ा कि न केवल भारत ने नेपाली क्षेत्रों पर अतिक्रमण किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की ज़मीन पर अतिक्रमण किया है। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि भारत के साथ मौजूदा सीमा विवादों में से कई की जड़ें 1816 में ब्रिटिश भारत के साथ हुई सुगौली संधि में हैं, इसलिए उनकी सरकार भारत-नेपाल सीमा चर्चाओं में ब्रिटिश पक्ष को शामिल करने की कोशिश कर रही है।

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काठमांडू पोस्ट जैसा अखबार भी इस बयान से हैरान था। अगले दिन के सम्पादकीय में अखबार लिखता है— ‘सीमा विशेषज्ञों के साथ-साथ उन वरिष्ठ पूर्व सरकारी अधिकारियों के अनुसार, जिन्होंने अपने भारतीय समकक्षों के साथ बातचीत की है, ऐसा कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, जिसमें भारत ने कभी ‘नेपाली अतिक्रमण’ का मुद्दा उठाया हो। इसलिए, प्रधानमंत्री का यह बयान भविष्य की सीमा वार्ता में भारत के पक्ष को मज़बूत करता है।’

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कोई राष्ट्रीय अख़बार तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करे, तो यह उभयपक्षीय हितों के लिए अच्छा नहीं है। भारत से यदि भूमि विवाद नहीं होता, तो ‘बाउंडरी वर्किंग ग्रुप’ का गठन क्यों किया गया? संयुक्त तकनीकी समिति ने लगभग 26 वर्षों तक कार्य किया। यह दावा किया गया कि सीमा संबंधी 97 प्रतिशत समस्याओं का समाधान कर लिया गया। शेष तीन प्रतिशत का समाधान करना उनकी क्षमता से परे था। उसमें कालापानी-लिम्पियाधुरा शामिल है—जो 370 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल के साथ सबसे बड़ा अतिक्रमण है; इसके अलावा 24 किलोमीटर का सुस्ता क्षेत्र और लगभग 15 किलोमीटर क्षेत्रफल वाले अन्य स्थान भी इसमें हैं। कुल मिलाकर, ऐसे लगभग 71 स्थान हैं जो 606 वर्ग किलोमीटर का कुल क्षेत्रफल घेरते हैं। इस स्थिति के बने रहने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक, सीमांकन के लिए पुराने मानचित्रों और दस्तावेजों की अनुपलब्धता है।

काश! काठमांडू पोस्ट ने बुद्धि नारायण श्रेष्ठ की पुस्तक ‘द नेचुरल एनवायरनमेंट्स एंड द शिफ्टिंग बॉर्डर्स ऑफ नेपाल’ में बर्नार्डो माइकल द्वारा की गई टिप्पणी पर ग़ौर किया होता, ‘आज भी, भारत और नेपाल के बीच सीमा विवादों की उपस्थिति यह स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि आधुनिक सीमाओं के निर्धारण की यह परियोजना सदैव एक ‘अधूरी परियोजना’ ही बनी रहेगी।’

नेपाल के लिए मुश्किल यह है कि लिपुलेख के मुद्दे पर चीन उसके साथ नहीं खड़ा है। लिपुलेख-लिम्पियाधुरा ट्राइजंक्शन भारत का है, उसकी पुष्टि 15 मई, 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन की राजकीय यात्रा के दौरान हुआ व्यापार समझौता है। यह भारत और चीन के बीच एक द्विपक्षीय समझौता था, जिस पर चीनी प्रधानमंत्री ली कछियांग के साथ पीएम मोदी ने हस्ताक्षर किए थे, जिसमें औपचारिक रूप से लिपुलेख दर्रे के माध्यम से सीमा व्यापार पर सहमति बनी थी। 41-सूत्री संयुक्त बयान के बिंदु 28 में लिपुलेख दर्रे (कियांगला) को औपचारिक रूप से एक द्विपक्षीय सीमा व्यापार और तीर्थयात्रा मार्ग के रूप में मान्यता दी गई थी।

तब नेपाली कांग्रेस के तत्कालीन प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा, कि भारत और चीन ने उसकी सहमति के बिना, उसके दावे वाले क्षेत्र से होकर व्यापार करने पर बातचीत की है। बाद के दिनों में नेपाल के तीन प्रधानमंत्रियों केपी शर्मा ओली, प्रचंड और शेर बहादुर देउबा ने लिपुलेख-लिम्पियाधुरा के बॉल को जमकर खेला। बालेन्द्र शाह से पहले पीएम ओली इस मुद्दे को उठाने 3 सितम्बर, 2025 को पेइचिंग में आहूत थिएनमान चौक विजय दिवस समारोह तक गए लेकिन, चीनी सत्ता प्रतिष्ठान ने उसे अनसुना कर दिया। चीन और भारत तय कर चुके थे कि लिपुलेख-लिम्पियाधुरा ट्राइजंक्शन के बरास्ते जून, 2026 में उभयपक्षीय व्यापार होना है।

बहरहाल, प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। अब तक नेपाल के किसी भी प्रधानमंत्री ने ऐसा बयान संसद में नहीं दिया था कि भारतीय भूमि को उनके देश ने भी क़ब्ज़ा कर रखा है। बालेन्द्र शाह को अब बताना है, कि नेपाल ने किन-किन जगहों पर भारतीय भूमि का हरण किया है। कई सांसद यह चाह रहे हैं कि संसद के रिकार्ड से यह बयान स्पन्ज़ किया जाये। लेकिन, ज़ुबान से निकली बात और कमान से छूटे तीर की वापसी नहीं हो सकती।

नेपाली मीडिया भी हतप्रभ है। नेपाली अखबार काठमांडू पोस्ट प्रधानमंत्री शाह के बयान को अपरिपक्व मानते हुए लिखता है, ‘अगर उन्होंने ‘अतिक्रमण’ शब्द के बजाय ‘सीमा-पार के कब्ज़े’ शब्द का इस्तेमाल किया होता, तो कोई विवाद नहीं होता। दूसरा, नेपाल और भारत के बीच उभयपक्षीय मामले में ब्रिटेन को शामिल करने की इच्छा भी गलत है। भारत ने बार-बार कहा है कि वह बाउंडरी बातचीत में किसी तीसरे पक्ष को कभी नहीं कबूल करेगा, चाहे वह पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश या नेपाल के साथ हो।’

जो भी हो, बालेन्द्र शाह का यह बयान भारत-नेपाल संबंधों का कड़वा सच है, जिसे वहां के तथाकथित राष्ट्रवादी नेता और प्रतिक्रियावादी पचा नहीं पा रहे हैं। काठमांडू स्थित सिंह दरबार के गर्भ में वो तमाम दस्तावेज़ ग़र्क़ हैं, जिसमें भूमिहरण संबंधी नक्शा और दस्तावेज़ों की हेराफेरी नेपाली नौकरशाहों ने समय-समय पर की है। नेपाली नेताओं की बौखलाहट की वजहें हैं। नेपाली संसद के निचले सदन में 13 जून, 2020 को लिपुलेख ट्राइजैक्शन की दावेदारी को सही ठहराने के लिए एक फ़र्जी चूचे नक्शा पास किया गया था। उसके सोर्स पर तत्कालीन सांसद सरिता गिरि ने सवाल किया, तो उनकी सदस्यता बर्खास्त कर दी गई।

नेपाल की लीडरशिप जिस 10 सूत्री सुगौली संधि को जपती रहती है, कम से कम उसके तीसरे और पांचवें बिंदु को ध्यान से पढ़ना चाहिए। पांचवें बिंदू में लिखा है— ‘नेपाल के राजा, उनके वारिस और उत्तराधिकारी काली नदी के पश्चिम में स्थित सभी दावों का परित्याग करेंगे।’ भूलवश या अपरिपक्वता कहें, बालेन्द्र शाह ने जिस विवादित जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है, उसे वापस बोतल में डालना अब मुश्किल होगा।

लेखक भू-राजनीतिक मामलों के पत्रकार हैं।

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