तिरछी नज़र

प्रजातंत्र की बस के आगे-पीछे

प्रजातंत्र की बस के आगे-पीछे

धर्मपाल महेंद्र जैन

प्रजातंत्र की बस तैयार खड़ी है। सरकारी गाड़ी है इसलिए ‘धक्का परेड’ है। धक्का लगाने में लोग जोर-शोर से जुटे हैं। एक बार गाड़ी रोल हो जाए तो ड्राइवर फर्स्ट गियर में उठाकर स्टार्ट कर ले।

बस को धक्का लगाने के लिए सरकार ने बड़ा अमला रखा है। दायीं तरफ से आईएएस धक्का लगा रहे हैं। बायीं तरफ मंत्रीगण लगे हैं। पीछे से न्यायपालिका दम लगा के हाइशा बोल रही है और आगे से असामाजिक तत्व बस को पीछे ठेल रहे हैं। लोग सात दशकों से पुरजोर धक्का लगा रहे हैं पर गाड़ी साम्य अवस्था में है। गति में नहीं आती। प्रजातंत्र की बस सिर्फ चर्र-चूं कर रही है। आईएएस धकियारे सहानुभूति के पात्र हैं। बस धकाने में बहुत श्रम लगता है। वे थक गए हैं। वे सीनियर हैं, गाड़ी को छोड़ नहीं सकते, खड़े-खड़े खर्राटे भर सकते हैं।

कुछ वरिष्ठ मंत्री धकियारे हैं। वे किस्मत को कोसते हैं, वे ड्राइवर बनने के योग्य थे पर भारी बस को सही धक्का लगाने वाले लोग भी चाहिए। उनका रोना इस बात का है कि वे अकेले हैं जो बस के नीचे घुस कर धक्का लगा रहे हैं। कई ड्राइवर आए और गए पर बस की गति वहीं है। नया ड्राइवर परेशान है, वह देश भर से छांट-छांट कर धकियारों को दिल्ली बुलाता है। उन्हें निर्देश देता है कि तुम आगे से लगाओ, तुम पीछे से लगाओ, तुम साइड से लगाओ। ये लोग निर्देश लेकर लौट जाते हैं पर कभी धक्का नहीं लगाते। धक्का लगाने से कपड़े और हाथ खराब होने का डर है। ये लोग बार-बार ड्राइवर के पास जाते हैं और धक्के की रिपोर्ट देते हैं। ये धकियारे ड्राइवर को ऐसी झूठी-सच्ची भिड़ाते हैं ताकि उसे लगे कि बस के न चलने का जिम्मेदार वे नहीं हैं।

बस का ड्राइवर गुमराह हो जाए तो प्रजातंत्र गुमराह हो सकता है। इसलिए कुछ धकियारे ड्राइवर को भटकने से बचाते हैं। ये ड्राइवर को सच बताते हैं और पैसेंजरों को सांत्वना देते हैं कि थोड़ी देर और बैठो। ड्राइवर ऐसे धकियारों को मुंह नहीं लगाता। उनको डांट-फटकार कर भगा देता है और गाड़ी के आसपास लगाए रखता है ताकि पैसेंजरों में उम्मीद बनी रहे। पुराने धकियारे बस के कंडक्टर हो गए हैं। जनता को बस में बैठा कर टिकट बना रहे हैं और पैसा वसूल रहे हैं। ये ड्राइवर और धकियारों को समय-समय पर नाश्ता-पानी भी करा रहे हैं और चिल्ला रहे हैं, प्रजातंत्र की बस अब दौड़ने वाली है।

धकियारे बड़े चालाक हैं। वे प्रजातंत्र का अर्थ समझ गए हैं और दोनों हाथों से बटोर रहे हैं। दोनों हाथ व्यस्त हैं तो धक्का कैसे लगाएं? ड्राइवर का मन बहुत करता है कि वह धकियारों को साफ-साफ कह दे कि सब एक दिशा में धक्का लगाओ। धकियारे उसकी नहीं सुनते, वे कहते हैं-तुम्हारा काम आगे देखना है, तुम आगे देखो, पीछे हम अपना-अपना देख लेंगे।

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