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अज्ञानता को हथियार बनाने के प्रयासों का हो विरोध

शिक्षक इस तरह से शिक्षा दें कि शिक्षार्थी में रचनात्मकता बढ़े। उसकी आकांक्षाएं एक न्यायपूर्ण, समानता युक्त, मानवीय और पारिस्थितिकी के प्रति संवेदनशील मूल्यों के प्रति विकसित हों। आशा के शिक्षाशास्त्र के जरिये ही नई पीढ़ी अपनी सोच व प्रयासों...

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शिक्षक इस तरह से शिक्षा दें कि शिक्षार्थी में रचनात्मकता बढ़े। उसकी आकांक्षाएं एक न्यायपूर्ण, समानता युक्त, मानवीय और पारिस्थितिकी के प्रति संवेदनशील मूल्यों के प्रति विकसित हों। आशा के शिक्षाशास्त्र के जरिये ही नई पीढ़ी अपनी सोच व प्रयासों से बेहतर दुनिया बनाने की दिशा में प्रेरित होगी। शिक्षा मूलत: जाग्रत बुद्धि के बारे में है।

इस भयानक रूप से विषैली, हिंसक और ध्रुवीकृत दुनिया में, किसी के लिए हमारे मौजूदा समय का चरित्र बन चुकी सर्वव्यापी नकारात्मकता से बहक जाना आसान है। फिर भी, एक शिक्षक के रूप में, मुझे लगता है कि हमें हार नहीं माननी चाहिए, और हमें आशा के बीज बोने चाहिए और नई पीढ़ी को एक बेहतर दुनिया की कल्पना करने और उसके लिए प्रयास करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

मैं शिक्षण समुदाय से हार्दिक प्रार्थना के साथ नए साल की शुरुआत में अपील करता हूं : आशा के शिक्षाशास्त्र को कक्षा की गतिशीलता में बदलने दें, शिक्षा के उद्देश्य को फिर से परिभाषित करें और आलोचनात्मक सोच, रचनात्मक कल्पना, सहानुभूति और प्रेम की शक्ति को सक्रिय करें। हालांकि, यह स्वीकार करना जरूरी है कि समकालीन छात्रों और शिक्षकों में जो निराशा हम देख रहे हैं, वह अक्सर किसी न किसी प्रकार की सनकी व्यावहारिकता के रूप में प्रकट होती है। जैसे-जैसे नवउदारवाद का बाजार-संचालित/ उपकरणवादी तर्क शिक्षा को एक उच्च और महान उद्देश्य से वंचित कर रहा है, और इसे आर्थिक उत्पादकता के लिए मात्र एक तकनीकी कौशल में बदल रहा है, कई युवा सामाजिक डार्विनवाद या अत्यधिक प्रतिस्पर्धा को एक नए गुण के रूप में, पैसे को नए भगवान के रूप में, और अहंकारी गर्व को रुतबे के प्रतीक के तौर पर देखने लगे हैं। उनके आंतरिक जगत में कोई फूल नहीं खिलता;वे शायद ही कभी गांधी और मार्क्स से संवाद करते हैं; और उनके पास समानता, पारिस्थितिकी, शांति एवं न्याय के लिए संघर्ष करने के वास्ते कोई ‘फालतू’ समय नहीं। इस प्रकार की व्यावहारिकता का मतलब है एक नई दुनिया में आशा की अनुपस्थिति।

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इसी तरह, अति-राष्ट्रवाद की संस्कृति कई शिक्षकों के बीच ऐसी व्यावहारिकता को और तेज करती है। जैसे-जैसे डिजिटल निगरानी सामान्य होती जाती है, हमारे कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में कई शिक्षकों को लगता है कि उन पर लगातार नज़र रखी जा रही है और निगरानी में हैं। और संभवतः, ऐसा डर उन्हें इसके प्रति बेहद सतर्क कर देता है कि वे क्या पढ़ा सकते हैं, क्या बोल सकते हैं और क्या लिख सकते हैं। जैसे-जैसे अति-राष्ट्रवाद के विमर्श द्वारा शैक्षणिक क्षेत्र का उपनिवेशीकरण शिक्षा को उसकी स्वतंत्रतावादी क्षमता से वंचित कर रहा है, शिक्षकों का एक ऐसा बड़ा वर्ग पैदा होना असंभव नहीं है जो चुप रहना पसंद करे, या व्यवस्था के प्रति वफादारी दिखाने के लिए अति उत्साही हो जाए। इसलिए, यह हैरानी की बात नहीं है कि ऐसे ‘व्यावहारिक’ शिक्षक अपने छात्रों में एक नई कल्पना, या प्रतिरोध की भाषा जगाने में विफल रहते हैं। यहां पर, एक ऐसी दुनिया है जो युद्ध, अधिनायकवाद और जलवायु आपातकाल से त्रस्त है। फिर भी, हमारे कॉलेज और विश्वविद्यालय ‘रैंकिंग’ की आकांक्षा, और ‘प्लेसमेंट और सैलरी पैकेज’ की बातों से परे कुछ भी देखने से इनकार करते हैं।

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इसलिए, सवाल उठता है : मैं जिस उम्मीद के शिक्षाशास्त्र की बात कर रहा हूं, वह क्या है? और क्या यह सच में मुमकिन है? यहां साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि यह कोई खोखला आदर्श या काल्पनिक खुशफहमी नहीं । आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के बिना इसे बढ़ावा देना नामुमकिन है : यह उस तरह की शिक्षा है जो युवा शिक्षार्थी को अपना रचनात्मक गुण वापस पाने और उन चीज़ों पर सवाल उठाने के लिए प्रोत्साहित करती है जो एक न्यायपूर्ण, समानता युक्त, मानवीय और पारिस्थितिकी के प्रति संवेदनशील दुनिया की संभावना को नुकसान पहुंचाती हों। यह समझने और गहराई से सिद्धांत बनाने जैसा है, मसलन, चरम-राष्ट्रवाद की आक्रामकता जो युद्ध, नरसंहार, सशस्त्र विद्रोह, आतंकवाद और धार्मिक कट्टरपंथ का कारण बनती है; आधुनिक तकनीक चालित पूंजीवाद के तर्क में छिपा लालच जो हर चीज़ को -चाहे वह पेड़, नदी, जंगल हो या पहाड़- उसे निरंतर ‘संवृद्धि’ और ‘विकास’ की खातिर सिर्फ एक ‘संसाधन’ में बदल देता है, और जलवायु आपदा की भयानक स्थितियों की ओर ले जाता है; और सबसे बढ़कर है, अरबपति प्रौद्योगिकीवादी और नव-फासीवादियों का अपवित्र गठबंधन जो लोकतंत्र की भावना खत्म कर रहा है। इसके अलावा, उम्मीद के शिक्षाशास्त्र का अर्थ है कि शिक्षा को सिर्फ एक तकनीकी कौशल तक सीमित नहीं किया जा सकता; इसकी बजाय यह जाग्रत समझ के बारे में है, या वह, जिसे हेनरी गिरौक्स –जो बेहतरीन शिक्षाविदों में से एक हैं - ने जानकारी से युक्त एवं राजनीतिक रूप से जागरूक लोकतांत्रिक नागरिकों को तैयार करने हेतु एक परिवर्तनकारी औजार के रूप में बताया है। अज्ञानता को हथियार बनाने का विरोध करने का यही एकमात्र तरीका है।

आलोचनात्मक चिंतन के अलावा, उम्मीद के शिक्षाशास्त्र को कुछ और भी चाहिए। वो है सीखने का ऐसा तरीका जो सीखने वाले हर युवा की छिपी हुई क्षमता को जगाए - यानी एक नई दुनिया का सपना देखने की हिम्मत; ज्ञान और आचार को जोड़ने, सोच और भावना, और विज्ञान और सौंदर्यशास्त्र को एक साथ लाने की इच्छा। एक तरह से, यह आलोचना की शक्ति और प्यार एवं दयालुता से सुनने की संभावना को एक साथ लाने की कोशिश करता है। असल में, उम्मीद के शिक्षाशास्त्र के हर गंभीर समर्थक को पाउलो फ्रेयरे और बेल हुक्स, रवींद्रनाथ टैगोर और जिद्दू कृष्णमूर्ति, या मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) और थिच न्हाट हान के साथ लगातार संवाद में शामिल होने की ज़रूरत है।

एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर होने के बावजूद, मैं युवाओं से वार्तालाप करता हूं, और उनकी दुविधाओं, चिंताओं और उलझनों को समझता हूं। और मुझे उनके साथ दूसरी कहानियां साझा करना पसंद है- बेशक, तय पाठ्यक्रम से इतर। सांप्रदायिक रूप से बंटी हुई दुनिया में, मैं उन्हें महात्मा गांधी के नोआखली के दिनों (1946-47) की कहानियां सुनाता हूं, और लोगों के दिलों में अच्छाई जगाने, सांप्रदायिक हिंसा से लड़ने, और प्यार, सहानुभूति और अलग-अलग धर्मों में परस्पर संवाद का संदेश फैलाने के उनके अथक प्रयास के बारे में बताता हूं। ऐसी दुनिया में जो इंसान की क्रूर प्रवृत्ति का जश्न मनाती हो, मैं उनके साथ बैठता हूं, और जॉन लेनन का यह ज्ञानवर्धक गाना सुनता हूं : ‘आप कह सकते हैं कि मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूं/लेकिन मैं अकेला नहीं हूं/मुझे उम्मीद है कि किसी दिन आप हमसे जुड़ेंगे/और दुनिया एक बनकर साथ रहेगी’।

और ऐसी दुनिया में जहां उपभोगवाद सबसे पसंदीदा सिद्धांत है, और ‘विकास’ सबसे ज़्यादा नशा करने वाली चीज़ है, मुझे उनके साथ हेनरी डेविड थोरो की उत्कृष्ट रचना ‘वाल्डेन’ पढ़ना पसंद है, और प्रकृति के प्रति उनकी संवेदनशीलता, सादगी और काव्यात्मक विस्मय का अनुभव करना पसंद है।

आज जबकि इस तकनीक-परक दुनिया में, सोशल मीडिया का नशा एक व्याकुल पीढ़ी को जन्म दे रहा है, और यहां तक कि हमारे नीति निर्माता भी तीसरी कक्षा से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की पढ़ाई शुरू करने की योजना बना रहे हैं, तो मैं जिद्दू कृष्णमूर्ति का आह्वान करना चाहता हूं, और उनसे आग्रह करता हूं कि वे बारिश की बूंदों को या सूर्यास्त के अद्भुत नज़ारे को निहारें, और महसूस करें कि संवेदनशीलता ही बुद्धि का उच्चतम स्वरूप है।

शिक्षण समुदाय उम्मीद के शिक्षाशास्त्र को न भूले।

लेखक समाजशास्त्री हैं।

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