तिरछी नज़र

हींग लगे न फिटकरी, चोरी का रंग चोखा

हींग लगे न फिटकरी, चोरी का रंग चोखा

सहीराम

कल्पना कीजिए कि जमाने के साथ चलने की सीख अगर चोर मान लें तो वे क्या करेंगे? जाहिर है वे डाटा चुराएंगे या फिर टीआरपी चुराएंगे। पहले चोर, चोरी करने के लिए ढ़ाठा का इस्तेमाल करते थे अर्थात मुंह पर कपड़ा लपेट लेते थे, अब खुद डाटा ही चोरी होने लगा है। खैर, नये जमाने का हाॅट माल यही है-डाटा, टीआरपी वगैरह। नये जमाने के चोरों की पसंदीदा चीजें यही हैं। पुराने जमाने के पहुंचे हुए चोरों की नजर या तो रुपये-पैसे पर होती थी या फिर सोने-चांदी के गहनों पर होती थी। तब चोरी भी सोने की होती थी और इनाम भी सोने का ही होता था। तब खुश होकर इनाम में सोने की गिन्नियां दी जाती थी।

बाद में सोने-चांदी पर नजर तस्करों की पड़ी और वे किंवदंतियां बन गए। इधर जो किंवदंती बने हुए हैं, वे सोने-चांदी के गहनों की एड करते हैं। खैर, कोई चोर ज्यादा ही टुच्चा निकला तो वह कपड़े-लत्ते भी चुरा लेता था। यूं तो पुराने जमाने में पशु चोर भी बहुत होते थे। लेकिन साहित्य में कुछ बहुत ही भावुक कहानियां रोटी चोरों की भी मिलती हैं। ये वो कहानियां थी जो लोगों का दिल बदल देती थी, उनकी सोच बदल देती थी, कई बार उनका जीवन भी बदल देती थी। लेकिन यह जमाना दिल और सोच बदलने का नहीं है और जीवन बदलने का तो बिल्कुल भी नहीं है। फिर समाज बदलने की बात तो बहुत दूर की है।

अब डाटा या टीआरपी का यह जो नया हाॅट माल है, इसकी चोरी पर किसी को कोई एतराज भी नहीं है। सोच वही है जो सरकारी माल की चोरी को लेकर रहती है। पहले राशन का माल चुराया जाता था, सीमेंट और लोहा चुराया जाता था, अस्पताल से दवाइयां चुराई जाती थीं, तो सोच यही होती थी कि मेरे बाप का क्या जाता है। इसी सोच के चक्कर में बाद में बड़े-बड़े घोटाले होने लगे। रुपये-पैसे या सोने-चांदी की चोरी तो माल के मालिक को ही हिलाती थी, पर सरकारी माल की चोरी सरकारों को हिलाने लगी। सरकारें अस्थिर होने लगीं और चोर स्थायी हो गए। उसी तरह डाटा या टीआरपी की चोरी पर भी किसी को कोई एतराज नहीं।

सोच वही है कि मेरे बाप का क्या जाता है। हालांकि डाटा की चोरी का माल इतने इफरात में इकठ्ठा हो गया है कि महंगाई के इस जमाने उसे सबसे सस्ता कहा जा सकता है। हजार, दो हजार में लाखों का डाटा मिल जाता है। कई बार तो सौ-दो सौ में भी मिल जाता है। एक चाय की कीमत में हजारों लोगों का डाटा आपको मिल सकता है। टीआरपी की चोरी में चोर आपको पांच सौ-सात सौ ऊपर से और दे देता है और फिर उससे करोड़ों के विज्ञापन कमाता है। कमाल का वक्त है साहब, लोगों को लगता है कि इसमें क्या है, न हींग लग रही है, न फिटकरी, पर चोरों का रंग चोखा जम रहा है।

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