सवाल है कि क्या आर्थिक मुआवजा किसी जीवन की क्षति की पूर्ति कर सकता है? स्पष्ट है कि सड़क सुरक्षा के साथ-साथ दंड प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता भी उतनी ही आवश्यक है, ताकि कानून का भय और न्याय का विश्वास दोनों कायम रह सकें।
देश के सड़क ढांचे का व्यापक विस्तार हुआ है और राजमार्गों का जाल तेजी से फैला है। संकरी और जर्जर सड़कों की जगह अब आधुनिक एवं चौड़ी सड़कों ने ले ली है, जिससे सड़क परिवहन व्यवसायियों और आम नागरिकों के लिए अधिक सुविधाजनक और आकर्षक बन गया है। किन्तु इस विकास के साथ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। शहरों की भीड़भाड़ से दूर बाइपास और खुली सड़कों पर वाहन चालक प्रायः लापरवाही से तेज गति में वाहन चलाते हैं। पर्याप्त निगरानी और यातायात नियंत्रण के अभाव में दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है।
स्थिति और गंभीर तब हो जाती है जब चालक नशे की अवस्था में वाहन चलाते हैं। ऐसे में तेज रफ्तार वाहन यात्रियों और राहगीरों के लिए जानलेवा साबित होते हैं। हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार एशिया में सपाट और चौड़ी सड़कों पर दुर्घटनाओं की दर चिंताजनक रूप से बढ़ी है। भले ही सड़क सुरक्षा बल की तैनानी और दुर्घटना में घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाने वालों के लिए प्रोत्साहन योजना शुरू की हो, लेकिन सड़क दुर्घटनाओं में अपेक्षित कमी नहीं आई है।
यदि किसी एक चालक की लापरवाही से दूसरे चालक या राहगीर की मृत्यु हो जाती है, तो यह केवल दुर्घटना नहीं, बल्कि लापरवाही से हुई मृत्यु का मामला है। ऐसे मामलों में दोषियों को कठोर दंड मिलना चाहिए। लेकिन अक्सर आर्थिक रूप से संपन्न लोग कई बार कानूनी प्रक्रियाओं में दखल या धनबल के सहारे राहत पा लेते हैं। भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 2(एक्स) में ‘पीड़ित’ की परिभाषा में कानूनी वारिसों को भी शामिल किया गया है। पूर्व में प्रायः ऐसा होता था कि मृतक के वारिस समझौते के तहत मुआवजा स्वीकार कर लेते थे और मामला आगे नहीं बढ़ता था।
फलस्वरूप, आर्थिक क्षतिपूर्ति को ही न्याय का विकल्प मान लिया जाता था। जिस व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है, उसे प्रत्यक्ष न्याय तो नहीं मिल सकता; अतः उसके परिजनों को धनराशि देकर मामले का पटाक्षेप कर दिया जाता था। क्या केवल आर्थिक मुआवजा किसी जीवन की क्षति की पूर्ति कर सकता है? स्पष्ट है कि सड़क सुरक्षा के साथ-साथ दंड प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता भी उतनी ही आवश्यक है, ताकि कानून का भय और न्याय का विश्वास दोनों कायम रह सकें।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक याचिका पर फैसला दिया है कि सड़कों पर लापरवाही से वाहन चला कर दुर्घटना करने वाले माफी के हकदार नहीं। निस्संदेह, मृतक के आश्रितों को कुछ क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए लेकिन यहां तो मौत के जिम्मेदार को ही माफ होने लगी। अदालत ने इस अधिकार रद्द कर दिया है। कुछ अभियुक्तों ने तर्क दिया कि वे केवल अनुबंध पर वाहन चला रहे थे, इसलिए सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी नहीं बल्कि वाहन स्वामी की है। इस पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दोष तय करना अदालत का कार्य है; यह साक्ष्यों के आधार पर ही निर्धारित होगा कि जिम्मेदार कौन है। यदि किसी वाहन स्वामी ने जर्जर वाहन सड़क पर उतारे हों और उनसे दुर्घटना हुई हो, तो जांच उसी अनुरूप की जाएगी।
स्पष्ट है कि अधिकांश दुर्घटनाएं मानवीय लापरवाही और तेज गति के कारण होती हैं। ऐसी मौतों की आपराधिक जवाबदेही केवल धन-लेनदेन के समझौते के आधार पर समाप्त नहीं की जा सकती। समझौते से एफआईआर रद्द करना तभी संभव है जब वास्तविक पीड़ित की शिकायत शेष न हो। पीड़ित के परिजनों के लिए न्याय सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है।
वर्तमान परिस्थितियों में कठोर दंड की संभावना प्रायः क्षीण प्रतीत होती है। दंड विधान में भी कानूनी छिद्र खोज लेने वाले सामने आ जाते हैं। ‘तारीख पर तारीख’ की प्रक्रिया लंबी होती रहती है और अभियुक्त जमानत पर बाहर आकर स्वयं को अपराध मुक्त समझने लगते हैं।
इसी व्यवस्था में आर्थिक रूप से संपन्न लोगों ने दुर्घटनाओं में अपनी लापरवाही से हुई मौतों के मामलों का समाधान भी अपने तरीके से निकाल लिया—मुआवजे और समझौतों के माध्यम से। न्याय का सिद्धांत यह है कि अपराधी को दंड मिले और पीड़ित परिवार को न्याय। किसी की मृत्यु के बदले केवल धनबल के आधार पर, वारिसों के हस्ताक्षरों से ‘माफी’ स्वीकार करवा लेना न्याय की भावना के विपरीत है। यह निर्णय न केवल विधि के शासन को सुदृढ़ करता है, बल्कि लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभ—न्यायपालिका—की गरिमा और प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है। इसे स्वीकार और लागू करना ही न्यायपूर्ण समाज की दिशा में एक आवश्यक कदम होगा।
इसके अतिरिक्त, प्रशासन की भी जिम्मेदारी है कि सड़कें वर्षों तक मरम्मत की प्रतीक्षा में जर्जर न पड़ी रहें। दुर्घटना-प्रवण ब्लैक स्पॉट्स को शीघ्र सुधारा जाए, चेतावनी संकेत स्पष्ट और बड़े अक्षरों में लगाए जाएँ तथा रात्रि में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि दुर्घटनाओं की संभावना न्यूनतम हो।
लेखक साहित्यकार हैं।

