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समतामूलक समाज लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त

कानून का स्वरूप प्राकृतिक न्याय वाला होना चाहिए। उसे जाति, लिंग, धर्म के आधार पर न्याय नहीं करना चाहिए। लेकिन सरकारें चूंकि वोट के बहुसंख्यक वाद से चलती हैं, इसलिए हर नीति और कानून वह बनाती हैं, जिससे उन्हें अधिक...

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कानून का स्वरूप प्राकृतिक न्याय वाला होना चाहिए। उसे जाति, लिंग, धर्म के आधार पर न्याय नहीं करना चाहिए। लेकिन सरकारें चूंकि वोट के बहुसंख्यक वाद से चलती हैं, इसलिए हर नीति और कानून वह बनाती हैं, जिससे उन्हें अधिक से अधिक वोट मिलें।

यूजीसी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस बारे में ऑनलाइन न जाने कितना कुछ पढ़ा, कितने वीडियो और रील्स देख चुकी। सब लोग अपनी-अपनी तरह से बातें कह रहे हैं।

बचपन से घर में सुनती आई हूं कि जातिवाद बहुत खराब चीज है। इससे हर हालत में मुक्ति पाई जानी चाहिए। ऐसे बहुत से बच्चों को अपने ही घर में पढ़ते-लिखते देखा, अच्छी नौकरियों पर जाते देखा है, जिन्हें तथाकथित निचली जाति कहा जाता है। इन्हें यहां तक पहुंचाने में बड़े भाई की बहुत भूमिका थी, क्योंकि वह दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। उस समय जाति तोड़क आंदोलन भी चलते थे, लेकिन आज इनका कहीं नाम भी सुनाई नहीं देता। यद्यपि पढ़े-लिखे तबके में इस बात पर आम सहमति है कि जाति को खत्म होना चाहिए। सभी को समान अवसर और सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन जातिगत विमर्श नहीं चाहते कि जाति खत्म हो। क्योंकि उन्हें लगता है कि इसी के आधार पर वे सरकार की नीतियों में अपनी जगह बना सकते हैं। अधिक से अधिक हिस्सेदारी पा सकते हैं।

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नब्बे के दशक में जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गई थीं, तब भी ऐसा आंदोलन हुआ था, लेकिन वह बहुत दिनों तक नहीं चला। सामान्य वर्ग ने इसे स्वीकार कर लिया।

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तब देश ने भूमंडलीकरण की तरफ अपने कदम बढ़ाए। तमाम बड़ी कम्पनियां आईं। जिन लोगों के लिए सरकारी नौकरियां नहीं थीं, वे उधर चले गए और अवसरों की जो कमी कही जा रही थी, वह उतनी नहीं रही। बड़ी संख्या में लोग विदेश चले गए। बताया जाता है कि भारतीय सबसे अधिक पैसा अपने देश में भेजते हैं। देश की आर्थिकी को बढ़ाने में विदेशों में रहने वाले इन भारतीयों का बड़ा योगदान है, जिसका सेहरा अधिकांश राजनेता अपने सिर बांधते हैं।

एक तरफ तो अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण लाखों की नौकरियां जा चुकीं या जाने वाली हैं। अब नौकरी जाने का आधार यह भी नहीं रहा कि आप कितने मेहनती हैं। किसी कम्पनी की ग्रोथ में आपका कितना योगदान रहा। कम्पनियों को बढ़ाने में आपने चौबीस सात के हिसाब से काम किया। बल्कि रोबोट ही लाटरी के आधार पर फैसला कर रहे हैं कि किसे ऱखना है, किसे निकालना है। एआई के जन्मदाता ज्योफ्री हिंटन बार-बार कह रहे हैं कि इससे नब्बे प्रतिशत नौकरियां चली जाएंगी। दुनिया की किसी सरकार के पास बेरोजगारों की इतनी बड़ी फौज से निपटने की कोई योजना नहीं है।

टेस्ला के मालिक एलन मस्क ने ही कुछ दिन पहले कहा था कि बीस साल बाद लोगों के पास करने के लिए कुछ नहीं बचेगा। लोग सिर्फ शौकिया ही काम करेंगे। ऐसे में यदि विकास के लिए आप पुराने औजारों को ही धार दे रहे हैं तो वे नहीं चलने वाले।

अपने देश में नौकरियों में लगातार आरक्षणवाद का बढ़ना लोगों को शंकित करता है। लोग खुद कितनी भी तकलीफ झेल लें, लेकिन यदि उनके बच्चों पर कोई बात आती है तो वे इसे नहीं सह सकते। यूजीसी गाइडलाइंस ने यही किया। लोगों को लगा कि अब तक तो नौकरियों पर ही खतरे थे, अब उनके बच्चे पढ़ भी नहीं सकते। वैसे भी दशकों से सामान्य वर्ग कहे जाने वाले लोगों के लिए सरकारों के पास कोई योजना नहीं है। दस प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण से भी कितने लोगों को नौकरियां मिली हैं। भारत सरकार की ही रिपोर्ट कहती है कि सामान्य वर्ग कहे जाने वाले लोगों में बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा है। लेकिन अपनी ही रिपोर्ट से शायद सरकारों ने आंखें मूंद रखी हैं।

जिस लोकतंत्र की दुहाई हम हर रोज देते हैं, वह दरअसल संख्या का खेल है, जिसका जितना वोट, उसे पाने के लिए उतनी ही सरकारी योजनाएं। जितनी जिसकी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी। किसी विदेशी विद्वान ने कहा था कि लोकतंत्र एक सतत युद्ध है, जो दिखाई भी देता है।

आम शहरी मध्यवर्ग ने सरकार के नारे कि हम दो हमारे दो को अपना लिया। आज तो यह और बढ़कर, हम दो हमारा एक हो गया है। ऐसे में सामान्य वर्ग की आबादी कम भी होती गई है। बढ़ता शहरीकरण भी इसका एक कारण है। कई वीडियो और रील्स ऐसी देखीं, जिसमें लोग यही कह रहे हैं कि सारी जिम्मेदारी हमारी ही क्यों है। हम ही टैक्स दें। हम ही कम से कम बच्चे पैदा करें और हमारी कम आबादी के कारण केंद्र और राज्य की सरकारें हम से मुंह मोड़ लें। ऐसे में एक वर्ग छला हुआ महसूस कर रहा है।

देश में चालू विमर्शों, जैसे स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, ओबीसी विमर्श आदि के कारण बहुत से ऐसे कानून बने हैं, जहां एक बार शिकायत करते ही आरोपी को अपराधी बना दिया जाता है। उसे जेल भेज दिया जाता है। सुनवाई भी कहीं नहीं होती। कुछ साल पहले उच्चतम न्यायालय ने यही तो कहा था कि दलित एट्रोसिटीज एक्ट के अंतर्गत शिकायत हो, तो किसी को तुरंत न पकड़ा जाए, पहले जांच की जाए। इस बात पर बहुत से संगठनों ने हल्ला मचाया और न्यायालय के इस निर्णय को सरकार ने पलट दिया। आखिर बिना जांच के कि किसी ने अपराध किया है या नहीं, किसी को जेल भेज देना किस कानून में लिखा है। किस लोकतांत्रिक मूल्य को पुख्ता करता है। दहेज निरोधी कानून के अंतर्गत भी आरोप लगाते ही पकड़ लिया जाता है। दुनिया में कहीं भी इस तरह के एकपक्षीय कानून नहीं हैं।

कानून का स्वरूप प्राकृतिक न्याय वाला होना चाहिए। उसे जाति, लिंग, धर्म के आधार पर न्याय नहीं करना चाहिए। लेकिन सरकारें चूंकि वोट के बहुसंख्यक वाद से चलती हैं, इसलिए हर नीति और कानून वह बनाती हैं, जिससे उन्हें अधिक से अधिक वोट मिलें।

यूजीसी मामले में भूमिका निभाने वाली मशहूर वकील इंदिरा जयसिंह ने एक सवाल के जवाब में कहा कि सामान्य वर्ग को किसी स्कालरशिप की क्या जरूरत। वे सब तो बहुत पैसे वाले हैं। मैडम एक बार गांवों में जाकर ही देख आतीं। गांवों में न सही, तो दिल्ली शहर में ही एक सर्वे कर लेतीं कि तमाम सोसायटियों के चौकीदार, मेहनत-मजदूरी करने वाले, ई-रिक्शा चलाने वाले किस वर्ग से आते हैं। कई वीडियोज ऐसे भी देखे, जिसमें यूजीसी मामले पर दलित कह रहे हैं कि ओबीसी और हमें एक साथ क्यों रखा। ऐसे ही ओबीसी कह रहे हैं कि हमें दलितों के साथ क्यों रखा। दलित एट्रोसिटीज के अधिकांश मामले हमारे ही खिलाफ हैं। अखिलेश यादव लाख पीडीए बनाते रहे, उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने प्रमोशन में दलितों के आरक्षण का विरोध किया था।

कुल मिलाकर सरकार ने सोचा कि वह कुछ भी करती रहे, कोई उसका विरोध नहीं करेगा। अपने कोर वोटर को उसने ग्रांटेड लिया और उसका नतीजा देखा।

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।

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