कश्मीर के पूर्व राज्यपाल और द ट्रिब्यून ट्रस्ट के अध्यक्ष एन.एन. वोहरा के अनुसार ’कॉलेज का नाम बदलने का कोई भी कदम ‘अत्यंत अनुचित और अविवेकपूर्ण होगा’।
महान स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, दूरदृष्टा, राष्ट्रवादी नेता सरदार दयाल सिंह मजीठिया द्वारा शिक्षा प्रसार के लिए दिए योगदान को कृतज्ञ राष्ट्र भुला नहीं सकता। उनके सपनों को साकार करने हेतु दिल्ली में स्थापित दयाल सिंह इवनिंग कॉलेज का नाम बदलने की अप्रिय कोशिश फिर हुई है। ‘वीर बाल दिवस’ के मौके पर, दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर ने एक बार फिर दयाल सिंह इवनिंग कॉलेज का नाम बदलने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा, हम कॉलेज का नाम बंदा सिंह बहादुर के नाम पर रखना चाहते हैं। दलील दी गई कि दयाल सिंह नाम के मॉर्निंग व इवनिंग कॉलेज होने से छात्रों को भ्रम होता है।
दयाल सिंह कॉलेज का एकेडमिक सेशन 1959 में शुरू हुआ और यह कन्फ्यूजन 67 साल बाद, 2026 में पैदा हुआ। कथित भ्रम के बावजूद शैक्षणिक सत्र 2025-2026 में मॉर्निंग और इवनिंग कॉलेजों में 9300 से अधिक छात्र पढ़ रहे हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, विद्वान और प्रतिभाशाली शिक्षकों के कारण कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के 10 शीर्ष कॉलेजों में आता है। सरदार दयाल सिंह मजीठिया (1848-1898), पंजाब के मजीठा गांव के एक महान सपूत थे, जो एक महान परोपकारी, राष्ट्रीय नायक और समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा, उदारवाद और मानवता के प्रेमी थे। समाज में अज्ञानता के अंधकार को दूर करने के लिए, दयाल सिंह मजीठिया ने तीन ट्रस्टों की स्थापना की- द ट्रिब्यून ट्रस्ट, कॉलेज ट्रस्ट और लाइब्रेरी ट्रस्ट। उनके अथक प्रयासों के कारण, पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर की स्थापना 1882 में हुई। दयाल सिंह मजीठिया ‘द ट्रिब्यून’ (2 फरवरी, 1881) और ‘पंजाब नेशनल बैंक’ (मई 1894) के संस्थापक भी थे।
दयाल सिंह कॉलेज, लाहौर की स्थापना 1910 में दयाल सिंह कॉलेज ट्रस्ट सोसायटी द्वारा, मजीठिया जी की वसीयत के अनुच्छेद 8 में दिए गए निर्देशों के अनुसार की गई थी। विभाजन के कारण दयाल सिंह कॉलेज ट्रस्ट सोसायटी की अधिकांश संपत्ति लाहौर में ही रह गई। ट्रस्ट ने ईमानदारी से दयाल सिंह की विरासत और विचारधारा को आगे बढ़ाया। दयाल सिंह कॉलेज, करनाल (9 सितंबर, 1949), दयाल सिंह पब्लिक लाइब्रेरी, दिल्ली (1954-55), और दयाल सिंह इवनिंग कॉलेज, दिल्ली (1958) की स्थापना की। पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के संस्थापक वाइस-चांसलर दीवान आनंद कुमार ने इन एजुकेशनल संस्थानों को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।
दयाल सिंह कॉलेज, दिल्ली की स्थापना करने और फाइनेंशियल संकट से उबरने के लिए, ट्रस्ट को दयाल सिंह कॉलेज, करनाल की ज़मीन बेचनी पड़ी। 1978 में, फाइनेंशियल संकट के कारण, दयाल सिंह कॉलेज (मॉर्निंग और इवनिंग) को एक एग्रीमेंट के ज़रिए दिल्ली यूनिवर्सिटी को ट्रांसफर किया गया। ट्रस्ट सोसाइटी को बदले में कोई मुआवज़ा नहीं मिला। लेकिन एग्रीमेंट के क्लॉज़ 12 के अनुसार, ‘संस्थान को दयाल सिंह कॉलेज के नाम से ही जाना जाता रहेगा।’ फलतः व्यक्ति या सरकार को एग्रीमेंट की शर्तों का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं है।
नवंबर 2017 में भी दयाल सिंह कॉलेज गवर्निंग बॉडी के तत्कालीन चेयरमैन अमिताभ सिन्हा इसका नाम बदलने के लिए दृढ़ थे। उन्होंने कहा कि इवनिंग कॉलेज का नाम बदलकर ‘पंडित मदन मोहन मालवीय कॉलेज’ कर दिया जाएगा। 17 नवंबर, 2017 को, वे कॉलेज गवर्निंग बॉडी से दयाल सिंह कॉलेज का नाम बदलकर ‘वंदे मातरम कॉलेज’ करने और उसे मॉर्निंग शिफ्ट में शिफ्ट करने का प्रस्ताव पास करवाने में सफल रहे, जिसकी फाइनल मंज़ूरी यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर को देनी थी। इस कदम की सोशल मीडिया, अखबारों और टेलीविज़न चैनलों पर कड़ी आलोचना हुई। इसे शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता पर एक खतरनाक हमला भी माना गया। भाजपा की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल व कांग्रेस नेताओं ने भी इस फैसले की आलोचना की। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के महासचिव मनजीत सिंह सिरसा और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष त्रिलोचन सिंह ने प्रस्ताव वापस लेने की मांग की। एसजीपीसी के अध्यक्ष सरदार अवतार सिंह मक्कड़ ने भी इसका विरोध किया।
27 नवंबर, 2017 को दिल्ली के रकाबगंज गुरुद्वारे में आयोजित शिक्षाविदों और विद्वानों की बैठक की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने की। बैठक का मुख्य उद्देश्य दिल्ली में दयाल सिंह इवनिंग कॉलेज का नाम बदलने से रोकने के लिए भारत सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति बनाना था।
19 दिसंबर, 2017 को राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान, कांग्रेस सांसदों आनंद शर्मा, अंबिका सोनी, ऑस्कर फर्नांडीस, एस.एस. ढींडसा और बी.के. हरिप्रसाद सहित कई सांसदों ने नरेश कुमार गुजराल के प्रस्ताव का समर्थन किया। तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सांसदों से कहा कि दयाल सिंह इवनिंग कॉलेज का नाम बदलने का फैसला केंद्र सरकार का फैसला नहीं था। उन्होंने गवर्निंग बॉडी के फैसले पर रोक लगाने की घोषणा की।
वहीं दूसरी ओर, दयाल सिंह इवनिंग कॉलेज स्टाफ एसोसिएशन ने कुलपति के प्रस्ताव का सर्वसम्मति से विरोध करते हुए प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव के अनुसार ‘यह कॉलेज प्रतिष्ठित सरदार दयाल सिंह मजीठिया की स्मृति से जुड़ा हुआ है। सभी शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारी और छात्र इस नाम से गहराई से जुड़े हैं। इतना महत्वपूर्ण फैसला हित धारकों से पूर्व परामर्श के बिना लिया गया। इस विषय पर न तो स्टाफ काउंसिल में चर्चा हुई और न ही इसे स्टाफ एसोसिएशन के साथ साझा किया गया।’
जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल और द ट्रिब्यून ट्रस्ट के अध्यक्ष एन.एन. वोहरा के अनुसार ‘कॉलेज का नाम बदलने का कोई भी कदम अत्यंत अनुचित और अविवेकपूर्ण होगा’। निस्संदेह, भारत सरकार को बंदा सिंह बहादुर के नाम पर एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनानी चाहिए, लेकिन दयाल सिंह कॉलेज का नाम बदलना उनकी विरासत का अपमान होगा।
लेखक दयाल सिंह कॉलेज, करनाल के प्राचार्य रहे हैं।

