लेखक अमिताव घोष की नवीनतम पुस्तक ‘घोस्ट आई’ दिखावे से परे असीम प्रेम की गाथा है। वे ब्रह्मांड को समेटने की कोशिश करते हैं, पूर्व जन्मों को, इंसानों और गैर-इंसानों को भी। उनके लेखन की खासियत है कि वे सच और परिकल्पना को एक जादुई मिश्रण में ढाल देते हैं और उसे अपना बना लेते हैं।
मेधावी लेखक अमिताव घोष इन दिनों अपनी नई किताब ‘घोस्ट आई’ के प्रचार लिए अपनी मातृभूमि में यात्रा कर रहे हैं, जी बिल्कुल, वे पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश या जम्मू-कश्मीर के आस-पास भी कहीं नहीं आ रहे, क्योंकि ऐसा लगता है कि इस क्षेत्र में साहित्य-सम्मेलनों की भरमार के बावजूद -जिसमें चंडीगढ़ में होने वाले दो सम्मेलन भी शामिल हैं, और दोनों में ध्यान ज़्यादातर इस बात पर केंद्रित रहता है कि वहां आपने किस-किस हस्ती को देखा बजाय इसके कि आपने यह वाली किताब पढ़ी है या नहीं – देश के इन हिस्सों में पाठकों का बाज़ार ज़्यादा बड़ा नहीं है। (किताबों से जुड़े लोग भी इस बारे में जानते हैं)।
तो यहां अमिताव घोष के बारे में पहलू यह है - शायद वे उन सबसे ज्यादा गैर-मिलनसार लोगों में एक हैं जिनसे आपकी भेंट हुई होगी। वह रूखे हैं, यहां तक कि चिड़चिड़े भी। पिछली एक किताब की बाबत एक इंटरव्यू में, उन्होंने पुस्तक के बारे में बात ही करने से मना कर दिया था। दशकों पहले मैं उनके पूर्व प्रकाशक रवि दयाल की ओर से उन्हें भेजी गईं कुछ किताबों का बंडल, जो सिर्फ़ दक्षिण एशिया में छपी थीं, नई दिल्ली से न्यूयॉर्क ले कर गई थी - कई ईमेल के बाद हम एक कॉफ़ी शॉप में मिले और मैंने सोचा, वाह, यहां मुझे इस मूर्धन्यता के पीछे के इंसान को जानने का मौका मिलेगा। लेकिन वह शख्स अंदर आये, मुझसे किताबें लीं, हल्की सी मुस्कान के साथ धन्यवाद कहा, मुड़े और चला गये। मुझे लगा कि मैं एक ऐसी कॉफ़ी के लिए कई डॉलर ज़्यादा ही खर्च कर डाले, जो पीने में न तो गर्म थी और न ही स्वादिष्ट।
बहरहाल, अगर आप जब उनका काम पढ़ना शुरू कर रहे हैं तो शुरुआत आपको ‘द ग्लास पैलेस’ से करनी चाहिए, एक ऐसी कहानी जो ताउम्र आपके याद रहेगी, कथानक भारत और बर्मा के बारे में है, मुश्किलों और यातनाओं का एक ऐसा सिलसिला जो महान राजा थिबाव की मुसीबतों से संबंधित है, जिन्हें अंग्रेजों ने उनके प्यारे मांडले से निकालकर महाराष्ट्र के तट पर रत्नागिरी में नज़रबंद कर दिया था, जहां पर 1916 में उनकी मृत्यु एकाकीपन में हुई – सनद रहे, अंग्रेजों ने 1857 के असफल विद्रोह के बाद बहादुर शाह ज़फ़र को भी रंगून निर्वासित कर दिया था, जहां पर 1862 में वे अपने अंतिम समय तक रहे। इन दिनों, जब चीज़ें बिखर रही हैं, तब हम भारत और उसके पूर्वी पड़ोसी म्यांमार के बीच रहे गहरे रिश्तों को भुला देते हैं। 2000 में जब अमिताव ने ‘ग्लास पैलेस’ लिखी और इतिहास की किताबों से इतिहास के नाटकीय पन्नों को फिर से सामने लाये, तब आप साफ तौर पर देखते कि भारत और बर्मा, दोनों देश जब ब्रिटिश राज का हिस्सा बने, अंग्रेजों ने किस प्रकार दो राजवंशों का निष्ठुरता से विनाश किया, 1935 में बर्मा के एक आज़ाद देश बनने तक, भारतीय रेलवे कोलकाता को रंगून-यांगून से जोड़ती थी और लोग बिना किसी भय या सीमा, पासपोर्ट या वीज़ा जैसी चीज़ों की अनिवार्यता बगैर एक से दूसरी जगह आते-जाते थे, काम करते थे, शादी करते थे, संतान पैदा करते थे, ठीक वैसे ही जैसा हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक फैले विशाल भारतीय उपमहाद्वीप में कहीं और होता था; कि दूसरे विश्व युद्ध का एक बड़ा हिस्सा न केवल यूरोप और अफ्रीका के युद्ध क्षेत्रों में लड़ा गया बल्कि बर्मा और मलाया भी रणक्षेत्र रहा, जिसको अब दक्षिण-पूर्व एशिया कहते हैं; और यह कि भारतीय सैनिक हर जगह लड़े, पूर्व व पश्चिम में, करीब 25 लाख सैनिक, जिनमें आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 87,000 योद्धा मारे गए- एक ऐसे देश या गठबंधन की ओर से लड़ते हुए जो उनका अपना था भी नहीं।
अमिताव घोष की यही खासियत है कि वे सच और परिकल्पना को एक जादुई मिश्रण में ढाल देते हैं और उसे अपना बना लेते हैं। इसलिए जब बीते हफ़्ते यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर चीन गए और आपने उनकी शी जिनपिंग के साथ हाथ मिलाते हुए तस्वीरें देखीं, तो आपका दिमाग ज़रूर अमिताव की ‘इबिस ट्रिलॉजी’ की तरफ गया होगा। बेशक, प्यार तो उन अनजानी जगहों पर भी पनप सकता है जिसके बारे में कभी सोचा न हो, क्योंकि लोगों की जीवनधारा रूपी नाटक का भव्य मंचन महाद्वीपीय सीमाओं से परे भी होता रहता है, जिसमें युद्ध, व्यापार और वह अंतिम चीज़, अफीम भी शामिल है।
‘रिवर ऑफ़ स्मोक’ बताती है कि क्यों कई चीनी इतिहासकारों का मानना है कि वर्ष 1839 ने ‘अपमान की सदी’ की शुरुआत की, जो अफीम युद्धों से शुरू हुई और 1949 में खत्म हुई जब माओ ने अपने असंगठित योद्धाओं के समूह का नेतृत्व करते हुए बीजिंग के बीचों-बीच स्थित ‘मध्य राजशाही’ (चीन का एक अन्य नाम) का तख्तापलट कर दिया था। एक कहानी जो ‘सी ऑफ़ पॉपीज़’ नामक शीर्षक से शुरू होती है, उसका संबंध पूर्वांचल में गंगा के किनारे गाजीपुर में बनी अफीम फैक्ट्री और दुनिया भर में भारतीयों के बंधुआ मज़दूर के रूप में प्रवास से जोड़कर देखें। अफीम, इसका लाभदायक व्यापार, साम्राज्य बनाने और राष्ट्रवाद को कुचलने, दोनों में इसकी भूमिका, ‘रिवर ऑफ़ स्मोक’ और ‘फ्लड ऑफ़ फायर’ में कहानी का विषय हैं।
‘द शैडो लाइन्स’ के नए संस्करण शायद आजकल छप नहीं रहे – हालांकि, जिस गति से आज की तारीख में बांग्लादेश की राजनीति बदल रही है, उसे देखते हुए आप शायद नजदीकी लाइब्रेरी में वापस जाकर इसे ढूंढ़ना चाहें। अब बात करते हैं। अब सीधे ‘गन आइलैंड’ पर आते हैं, जो मकड़ियों, आप्रवासन और पर्यावरण आपदाओं को लेकर बुनी एक शानदार फंतासी है, जोकि वेनिस, कोलकाता और सुंदरबन के बीच घूमती रहती है। नागों की देवी, मनसा देवी की गाथा सबसे पहले यहीं प्रकट होती है। ‘द हंग्री टाइड’ कहानी कुछ ज़्यादा ही भाषणबाजी किस्म की लगी, जो पर्यावरणीय बदलावों से बने संकटों को लेकर ज्यादा प्रयास न करने पर हमें डांटती है। ‘घोस्ट आई’ की कहानी वहां से शुरू होती है जहां पर ‘गन आइलैंड’ खत्म हुई थी। यहां तक कि कई किरदारों के नाम भी एक जैसे हैं। मनसा देवी कहानी के केंद्र में बनी रहती हैं। जैसे-जैसे सच गल्प से टकराता है, अमिताव घोष ब्रह्मांड को समेटने की कोशिश करते हैं, पूर्व जन्मों को, इंसानों और गैर-इंसानों, और सब कुछ विज्ञान और पौराणिक कथाओं की हांडी में डाल कर पकाते हैं। कहानियों के संग्रह ‘कथासरितसागर’ के सागर मंथन में कहानी ‘घोस्ट आई’ सबसे ऊपर उभरती है, जो असीम, दिखावा रहित प्यार की कहानी है।
चंडीगढ़ से सटे, पंचकूला में भी, माता मनसा देवी का एक मंदिर है, जिन्हें शक्ति स्वरूप में पूजा जाता है। यह साफ नहीं है कि क्या ये वही मनसा देवी हैं जो ‘घोस्ट आई’ के केंद्र में नागों की देवी हैं, लेकिन अगर वही हैं, तो शायद घोष के बताए जीवन के नुस्खे पर पुनर्विचार का समय आ गया है, जब वे कार्ल जंग से सहमति जताते हुए उद्धृत करते हैं ः ‘कुछ भी संयोगवश नहीं होता, महज समकालिकता होती है’। कहने का अभिप्राय है कि जब आप सप्ताहांत में इस उस्ताद लेखक को पढ़ते हैं, तो यह महज पढ़ना भर नहीं रहता, बल्कि यह किताबों, पठन, शिक्षा और सीखने के बीच के संबंध को फिर से जोड़ने का भी समय भी बन जाता है।
यह वह समय भी है जब आप आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाते हैं। यही वह समय होता है।
लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।

