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बाहरी चमक-दमक में सिसकता अमेरिकी समाज

अमेरिका ने चतुराई से अपनी कैसी छवि बनाई है कि हम उसे इस धरती का स्वर्ग मानने लगे हैं, जबकि यदि नर्क जैसी कोई जगह होती हो, तो यह देश उससे भी बड़ा है। दुनियाभर में दरोगाई करके अमेरिका ने...

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अमेरिका ने चतुराई से अपनी कैसी छवि बनाई है कि हम उसे इस धरती का स्वर्ग मानने लगे हैं, जबकि यदि नर्क जैसी कोई जगह होती हो, तो यह देश उससे भी बड़ा है। दुनियाभर में दरोगाई करके अमेरिका ने जितने अत्याचार किए हैं और कर रहा है, उसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है।

हाल ही में अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने ट्रंप के मनमाने तरीके से टैरिफ लगाने के फैसले को पलटा। बदले में वहां के न्यायाधीशों को लेकर ट्रंप ने गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया, उससे यही पता चलता है कि उनकी आस्था लोकतांत्रिक मूल्यों में कतई नहीं है। बल्कि जिस तरह के बयान वे लगातार दे रहे हैं, वे भी बताते हैं कि उन्हें किसी की परवाह नहीं है। उनकी ऐसी बातें सुनकर अनेक ऐसी कहानियां याद आती हैं, जहां कोई राजा-महाराजा अपने को अमर समझता था और दुर्दिनों को प्राप्त होता था।

अमेरिका में इन दिनों उन लोगों की बाढ़ आई हुई है, जो सड़कों पर उतरे हुए हैं। वे भारतीयों को तरह-तरह से प्रताड़ित कर रहे हैं। नफरती बयान दे रहे हैं। उनके पूजा स्थलों को निशाना बना रहे हैं। जिस तरह से वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठाया और दुनिया के अधिकांश देशों ने चुप्पी साध ली, वह तुलसीदास जी की सैकड़ों वर्ष पहले लिखी बात को सच साबित करता है ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं’। लेकिन कोई भी सामर्थ्यवान हमेशा समर्थ नहीं रहता। यह भी याद रखना चाहिए।

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पूरी दुनिया के युवा जिन्हें जेनरेशन जी के नाम से पुकारा जाता है, वे अमेरिका को किसी ड्रीम कंट्री की तरह देखते रहे हैं। भारत में भी बच्चे की सफलता इस बात से तय मानी जाती है कि वह अमेरिका गया कि नहीं। लेकिन अब ये सपने टूट रहे हैं। वहां के विश्वविद्यालयों में भारतीय छात्रों का एनरोलमेंट लगातार गिर रहा है। अमेरिका बस श्वेत अमेरिकियों के लिए है, ये भावना वहां सिर उठा रही है। इसलिए बाहर के बच्चे वहां जाने से बच रहे हैं।

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अमेरिका की आबादी मात्र चौंतीस-पैंतीस करोड़ है। लेकिन अपराधों का आंकड़ा बहुत बड़ा है। स्त्रियों के प्रति अपराध बड़ी संख्या में होते हैं। आबादी के मुकाबले दुगुने हथियार हैं। ये सरे बाजार मिलते हैं। बच्चे ड्रग्स की चपेट में हैं। ड्रग्स खुले बाजार में मिलती हैं और बच्चे भी इन्हें खरीद सकते हैं। उन्हें कोई रोक भी नहीं सकता। यदि कोई रोके, तो इसे बच्चों के अधिकारों के खिलाफ माना जाता है।

हाल ही में पेंग्विन में छपे तीन उपन्यासों को पढ़ा था। ये हैं—ब्वॉयफ्रेंड, झूठ मत बोलो और हादसा। इसकी लेखिका फ्रीडा मैकफेडन हैं। फ्रीडा पेशे से दिमाग की चोटों की एक्सपर्ट डाक्टर हैं। लेकिन क्राइम थ्रिलर और कामेडी भी लिखती हैं। अब तक उनकी रचनाओं के विश्व की चालीस भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं।

इन उपन्यासों को पढ़ते हुए लगा कि वे अमेरिका के जीवन को कितनी नजदीक से जानती हैं। तीनों के तीनों उपन्यास ऐसे हैं, जिनसे पता लगता है कि वहां के समाज में आप किसी पर विश्वास नहीं कर सकते। भाई-बहन पर नहीं, बहन भाई पर नहीं। पति-पत्नी पर नहीं, पत्नी पति पर नहीं। मरीज डाक्टर पर नहीं, और डाक्टर मरीज पर नहीं। इनमें से अधिकतर अपने आसपास वालों की हत्या कर देते हैं। गाड़ी के ब्रेक खराब कर देते हैं। इनकी लाशों को घरों के तहखानों में डाल दिया जाता है। वे वहां सड़ जाती हैं। या किसी जंगल में जाकर गाड़ दिया जाता है।

बच्चे की चाह में किसी महिला को मदद के बहाने अपने घर के तहखाने में रख दिया जाता है। एक लड़की का एक्सीडेंट होता है। गाड़ी बर्फ में फंस जाती है। उसे एक आदमी अपने घर लाता है। लड़की गर्भवती है। घर की निःसंतान महिला को लगता है कि यदि यह लड़की बच्चे को यहां जन्म दे दे, तो वह बच्चे को हड़प लेगी और इस लड़की को ठिकाने लगा देगी। मगर उसका पति एक दिन उसकी अनुपस्थिति में उस लड़की को अस्पताल में छोड़ आता है। वहां लड़की का सगा भाई उसे मारने की कोशिश करता है। पहले भी वह लड़की के कार के ब्रेक खराब कर चुका है, क्योंकि वह उस आदमी से मिला हुआ है, जो लड़की का दुष्कर्मी है।

ये पढ़ते-पढ़ते आप थरथराने लगते हैं कि ये कैसा समाज है। जहां हर कोई बस दूसरे की जान लेने की कोशिश में है। रिश्तों की कोई मर्यादा भी नहीं। अपने देश में होने वाली ऐसी बहुत-सी घटनाएं याद आने लगती हैं। अमेरिका तो कहता है कि वह पूरे विश्व का ठेकेदार है, लेकिन अपने यहां के अपराध नहीं रोके जाते। इन उपन्यासों में पुलिस बुलाते ही आ भी जाती है, लेकिन अधिकांश बार वह न तो अपराधी को पकड़ पाती है, न ही लाश को ढ़ूंढ़ पाती है। और सबसे बड़ी बात ये कि अपराधी खूब मजे से, सारी सुविधाओं का लाभ उठाते हुए जीवन जीते हैं। पार्टी करते हैं। एक घर में रहते हुए भी वे एक-दूसरे को धोखा देते रहते हैं। उन्हें कोई पछतावा भी नहीं होता।

यहां घर बहुत बड़े-बड़े हैं। दूर-दूर तक कोई अड़ोसी-पड़ोसी भी नजर नहीं आता। ऐसे में लगता है कि कोई अपराध हो तो उसकी सूचना भी कैसे दी जाए। इसीलिए लोग अपने घरों में अलार्म सिस्टम लगवाते हैं। न्यूयार्क जिसे अमेरिका की आर्थिक राजधानी कहा जाता है, वहां एक नहीं कई-कई ताले लगाए जाते हैं, लेकिन ताले या अलार्म सिस्टम अपराधों को नहीं रोक पाते। फिर वे अपराध रुकें भी कैसे, जिन्हें अपने ही अंजाम दे रहे हैं।

इन्हें पढ़ते हुए सोचती रही कि बाहरी देशों में अमेरिका ने चतुराई से अपनी कैसी छवि बनाई है कि हम उसे इस धरती का स्वर्ग मानने लगे हैं, जबकि यदि नर्क जैसी कोई जगह होती हो, तो यह देश उससे भी बड़ा है। दुनियाभर में दरोगाई करके अमेरिका ने जितने अत्याचार किए हैं और कर रहा है, उसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है।

उपन्यास या कहानियों के बारे में कहा जाता है कि वे काल्पनिक होती हैं, लेकिन वे पूरी तरह से काल्पनिक भी नहीं होतीं। वे अपने देशकाल को बताती हैं और इस तरह इतिहास का हिस्सा भी बनती हैं। वे अपने समकालीन समाज को दिखाने वाले बेजोड़ दस्तावेज भी होते हैं।

यों तो फिल्मों के बारे में भी यह कह सकते हैं। फिल्में भी अपने समय की साक्षी होती हैं। अमेरिकी जीवन में कितनी मारामारी है, इसे हॉलीवुड की फिल्में खूब दिखाती हैं। लेकिन फिल्म के मुकाबले किताब का असर ज्यादा होता है। किताबों से जो दृश्य लगातार आपके मन में बनते हैं, वे गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। इसीलिए दृश्य माध्यम चाहे भुला दिए जाएं, किताबों का असर बहुत दिनों तक रहता है। इन दिनों सोशल मीडिया के जमाने में बहुत सी स्त्रियां-पुरुष, अपने अनुभव लिखते हैं, जिन्हें दुनियाभर में कोई भी पढ़ सकता है।

एक अमेरिकी महिला ने कुछ दिन पहले अपनी आपबीती लिखी थी कि किस तरह से जिस मकान को उसने अपनी मेहनत की कमाई से बनाया था, वहां अपनी पसंद के गुलाब और अन्य पौधे लगाए थे। उसकी साथ न रहने वाली बहू, रोज उससे कहने लगी कि आप इस घर को छोड़कर वृद्धाश्रम चली जाएं। अब इस घर में आप जैसी वृद्धा का नहीं, हमारे रहने का अधिकार है। और तो और बहू ने अपने दोस्तों के लिए सास के वृद्धाश्रम जाने के उपलक्ष्य में एक विदाई पार्टी भी आयोजित की। तब महिला को अपने बहू-बेटे को घर से निकलवाने के लिए पुलिस की मदद लेनी पड़ी।

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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