मोहक अभिनय से सदा रही दिल जीत : The Dainik Tribune

मोहक अभिनय से सदा रही दिल जीत

स्मृति शेष : दिलजीत कौर

मोहक अभिनय से सदा रही दिल जीत

भीम राज गर्ग

भीम राज गर्ग

तैराकी और हॉकी जैसे खेलों में निपुण, सोहणी पंजाबण मुटियार दिलजीत कौर, भारतीय प्रशासनिक सेवा में अपना करिअर बनाने की इच्छुक थी। कॉलेज में सहपाठियों ने उसकी सुंदरता के बड़े-बड़े बखान किये तो उसकी रुचि अभिनय में हो गई। फिर क्या था, पुणे फिल्म संस्थान से एक्टिंग का कोर्स किया और बन गई पंजाबी फिल्मों की ‘हेमामालिनी’।

दिलजीत कौर ने विधु विनोद चोपड़ा द्वारा निर्देशित लघु फिल्म ‘बोंगा’ में मुख्य रोल निभाते हुए अपनी विशिष्ट अभिनय प्रतिभा का परिचय दिया। उन दिनों हिंदी फिल्म निर्माता और निर्देशक अक्सर नये चेहरों की तलाश में संस्थान आते थे। कमाल अमरोही ने अपनी आगामी फिल्म ‘आखिरी मुगल’ के लिए सैकड़ों लड़कियों में से दिलजीत कौर को नायिका के रूप में चुना। जबकि राज कपूर ने उसे ‘हिना’ फिल्म का ऑफर दे दिया। इस बीच, निर्माता-निर्देशक इंद्रजीत हसनपुरी ने दिलजीत के दादा जी के सौजन्य से उन्हें पंजाबी फिल्म ‘दाज’ और ‘दहेज़’ (हिंदी) में अभिनय करने के लिए सहमति ले ली। ‘दाज’ (1976) फिल्म के रिलीज़ होते ही दिलजीत के अच्छे लुक ने पूरे पंजाबी फिल्म उद्योग में तूफान ला दिया और उसके घर के आगे फिल्म निर्माताओं की कतार लग गई।

पंजाबी फिल्मों के स्टारडम ने उन्हें हिंदी फिल्मों से लगभग दूर ही कर दिया। ‘रजिया सुल्ताना’ बनाने में व्यस्त कमाल अमरोही ‘आखिरी मुगल’ बनाना भूल गए जबकि राज कपूर ने भी ‘हिना’ पर फोकस नहीं दिया। सांत्वना स्वरूप उसे सोम दत्त प्रोडक्शंस की फिल्म ‘यारी दुश्मनी’ में सुनील दत्त के साथ काम करने का मौका मिला। अंततः दिलजीत कौर ने पंजाबी फिल्मों पर अपना ध्यान केंद्रित किया और वह वीरेंद्र के साथ मुख्य अभिनेत्री के रूप में उभरीं।

पंजाबी फिल्म ‘सैदां जोगन’ (1979) में दिलजीत कौर ने एक ग्रामीण और एक शहर की लड़की की दोहरी भूमिकाओं में दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं। निर्देशक जगजीत ने फिल्म ‘पुत्त जट्टां दे’ (1983) में इस चुलबुली, सोनपरी के सौंदर्य को बड़े ही सहज और अनोखे ढंग से चित्रित किया था। यह फिल्म वर्ष 1983 की सबसे बड़ी ब्लॉक-बस्टर साबित हुई और दिलजीत कौर को पंजाबी सिनेमा की ‘हेमामालिनी’ कहा जाने लगा। दिलजीत स्वयं भी इस फिल्म को अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंस मानती थी।

पंजाबी सिनेमा में उनका एक अग्रणी अभिनेत्री के रूप में स्टारडम दिन-ब-दिन बढ़ता गया। पुरुष-प्रधान फिल्म उद्योग में उनका नाम फिल्मों की नामावली में सबसे ऊपर आता था। गिद्दा, मामला गड़बड़ है, लाजो, बटवारा, सोहनी महिवाल, इश्क निमाना, निम्मो, वैरी जट्ट, जट्ट ते ज़मीन जैसी अनेक हिट फिल्मों में दिलजीत के अभिनय की बहुत सराहना हुई। इन फिल्मों में उन्होंने वीरेंद्र, गुरदास मान, सतीश कौल और बलदेव खोसा आदि शीर्ष अभिनेताओं के साथ काम किया था। फिर वह गुग्गु गिल और योगराज सिंह जैसे नए अभिनेताओं के समक्ष अनख जट्टां दी, जट दा गंडासा, उड़िकां सौण दियां इत्यादि फिल्मों में नायिका के रोल करने लगी थी।

सन‍् 2000 के आसपास, वह फिर सिनेमा की दुनिया में लौटी और उन्होंने माहौल ठीक है (1998) और जी आईंयां नूं (2002) फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। हाल के वर्षों में वह हीर रांझा, सिंह वर्सेज कौर, मोगा टू मेलबर्न वाया चंडीगढ़, जट्ट बॉयज और देसी मुंडे जैसी फिल्मों में चरित्र भूमिकाओं में नज़र आई थीं। अंतिम बार उन्होंने फिल्म ‘रब्ब दा रेडियो-2’ (2019) में एक कैमियो किया।

परी समान चेहरा एवं बेहद खूबसूरत छरहरा दीर्घवृत्त बदन, उनकी एक ‘ठेठ पंजाबन’ होने की छवि को परिभाषित करता था। युवा-दिलों की धड़कन, दिलजीत को महिला-प्रधान फिल्मों के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। दिलजीत ने अन्य पंजाबी कलाकारों की तुलना में अधिक सिल्वर जुबली हिट्स दी हैं। उसने फासले, अमृत, विदेश, जीने नहीं दूंगा जैसी एक दर्जन हिंदी फिल्मों में समानांतर मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। परन्तु उन्हें जो स्नेह और सम्मान पंजाबी सिनेमा से मिला, वह हिंदी फिल्मों में कोसों दूर था। पंजाबी और हिंदी फिल्मों के अतिरिक्त उन्होंने बंगला, तेलुगु, मलयालम और सुपरहिट हरियाणवी फिल्म ‘म्हारा पीहर सासरा’ में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं।

दिलजीत कौर का जन्म सिलीगुड़ी (पश्चिमी बंगाल) में एक धनाढ्य ट्रांसपोर्टर मोहिंद्र सिंह खंगूड़ा के घर 24 मार्च, 1954 को हुआ था। उनका पैतृक गांव अटियाना (लुधियाना) है। प्रारम्भिक शिक्षा दार्जीलिंग के सेंट हेलेंस कान्वेंट स्कूल से पूरी करने के पश्चात‍् उसने दिल्ली के प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज से बी.ए. (ऑनर्स) की डिग्री ली। उसके पिता उसे डॉक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन उसने फिल्म क्षेत्र में प्रवेश किया।

उनकी शादी तलाक़शुदा फिल्ममेकर गज (हरप्रीत) देओल से हुई थी। उसने दिलजीत कौर के पैसे से ‘बाग़ी’ फिल्म का निर्माण किया लेकिन उसे एक्टिंग नहीं करने दी। धीरे-धीरे दिलजीत की सभी निवेश-पूंजियां सिमट गईं, यहां तक कि उसका बांद्रा का आलिशान बंगला भी बिक गया।

जीवन में त्रासदियों को अकेले झेलते-झेलते यह खूबसूरत अभिनेत्री डिप्रेशन में डूबती चली गई। पिछले तीन वर्षों से वह ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित थीं। आख़िरकार, ‘स्वर्ण-सुंदरी’ दिलजीत कौर 17 नवंबर, 2022 को इस फ़ानी दुनिया से रुख़सत हो गईं।

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